(आलेख : राजेंद्र शर्मा) स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के वी-डेम इंस्टीट्यूट की डेमोक्रेसी रिपोर्टों में 2018 से यानी मोदीशाही के पहले कार्यकाल के आखिरी वर्ष से ही भारत को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ या
(आलेख : बादल सरोज) भारत के दार्शनिक वृतांत में एक रोचक कथा है, अद्वैतवादी आदि शंकराचार्य की कथनी और करनी के द्वैत की कथा। जगत को सच्चा और गतिशील मानने और सवाल
(आलेख : राजेंद्र शर्मा) सड़कें अगर खामोश हो जाती हैं, तो संसद आवारा हो जाती है! जनतंत्र के भारतीय अभ्यास से निकली इस जानी-मानी कहावत के हिसाब से संसद के मानसून सत्र
(आलेख : राम पुनियानी, अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत हिन्दू राष्ट्र के विचार को सही ठहराने के लिए तरह-तरह की वैचारिक कलाबाजियां खाते रहते हैं। वे कई
(आलेख : नीलोत्पल बसु) उत्तर-सत्य या पोस्ट ट्रुथवाली दुनिया की समस्या यह है कि इसकी एक एक्सपायरी डेट जरूर होती है। एक लंबे समय के लिए तो सच्चाई पर मुलमा चढ़ाकर उसे
एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.) प्रस्तावना वर्तमान समय में भारत को विश्व की सबसे तेज़ी से विकसित होती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सरकारी वक्तव्यों, कॉरपोरेट रिपोर्टों तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय
(आलेख : अपूर्वानंद) 2026 में नई विधानसभाओं के लिए 5 राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों की सबसे बड़ी खबर यह है कि सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विचार को गहरे कब्र में
(आलेख : राजेंद्र शर्मा) विधानसभा चुनाव के मौजूदा चक्र के संबंध में और खासतौर पर प. बंगाल के संबंध में जो बदतरीन आशंकाएं जतायी जा रही थीं, सच साबित हुई है। भाजपा