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गैस सिलेंडरों की कीमतों में वृद्धि : इस 7 लाख करोड़ रूपये का हिसाब कौन देगा?

नागरिक परिक्रमा(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां) मोदी सरकार ने घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में भारी वृद्धि की है। अब 924 रूपये वाला गैर सब्सिडी घरेलू सिलेंडर 924 रूपये की
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नेतन्याहू से नाता : आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है?

(आलेख : बादल सरोज) यह समय बहुत ही असामान्य और अभूतपूर्व समय है। राजेश जोशी एक छोटी सी कविता ‘शांति की अपील’ में कहते हैं कि “जब तक मैं एक अपील लिखता
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गलगोटिया कांड : बीजेपी-मोदी के भारत में झूठ का पर्दाफाश

(आलेख : अपूर्वानंद) दिल्ली में लगे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मेले में गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा एक चीनी रोबोट को अपना ‘आविष्कार’ बतलाकर प्रदर्शित किए जाने के बाद से देश और विदेश में गलगोटिया यूनिवर्सिटी
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भारत में कमजोर हो रहे लोकतंत्र पर चिंताएं

हाल के वर्षों में भारत में लोकतंत्र के स्वास्थ्य को लेकर बहस तेज़ हुई है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के क्षरण संबंधी चिंताएँ न तो हाशिए की हैं और न ही केवल दलगत
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समानता बनाम मनुवाद : यूजीसी नियमावली और जाति वर्चस्व का प्रतिरोध

(आलेख : विक्रम सिंह) जाति प्रथा कितनी घृणित और अमानवीय है, यह हमारे देश में बताने की ज़रूरत नहीं है। दलितों पर रोज़ होने वाले अमानवीय अत्याचार और उनके साथ पशुओं से
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प. बंगाल : सवाल उनके, जवाब हमारे

(आलेख : शमिक लाहिड़ी, अनुवाद : संजय पराते) पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पास आ रहे हैं। वामपंथी पार्टियों, खासकर सीपीआई(एम) पर मीडिया की कड़ी नज़र है, जिससे उनकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति के
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संविधान की छाती पर पाइंट ब्लैंक फायर!

(आलेख : राजेंद्र शर्मा) आखिरकार, हिमांत बिश्वशर्मा ने और अकेेले विश्व शर्मा ने ही नहीं, उनके नेतृत्व में भाजपा की असम इकाई ने भी, भारतीय संविधान को खुली चुनौती दे ही दी।
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अंधेरे अतीत की ओर बुलेट ट्रेन पर सवार

(आलेख : राजेन्द्र शर्मा) अगर यह संयोग था, तब भी बहुत-बहुत कुछ उजागर करने वाला संयोग था। 26 जनवरी को, जब देश एक गणतंत्र के रूप में अपने रूपांतरण के 76 साल
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फिर फंस गया बेचारा गरीब का बेटा

विष्णु नागर फंस गया बेचारा, गरीब का बेटा, चारों तरफ से बल्कि ऊपर और नीचे से भी! जब भी संकट आता है, गरीब के इस बेटे पर ही आता है, जो बेचारा
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व्यवस्था जातिगत भेदभाव का बचाव कैसे करती है?

(आलेख : सवेरा, अनुवाद : संजय पराते) एक पुरानी बुराई, जो भारतीय समाज को परेशान कर रही है, उच्च शिक्षा में इसके कुछ प्रभावों को कम करने के लिए एक दशक लंबा