धर्म मानव कल्याण के लिए है और कल्याण ही धर्म की आत्मा है

 लखनऊ । धर्म मानव कल्याण के लिए है और कल्याण ही धर्म की आत्मा है यही कल्याण का कार्य निःस्वार्थ भाव से जब होगा तब ही धर्म के लक्ष्य की पूर्ति होगी। आज पूरी दुनिया में मानवता सिसक रही है उसके जख़्मों पर मरहम लगाने के लिए सभी धर्मों के धर्म गुरूओं को आगे आकर मानवता के लिए कार्य करना होगा तब ही मानव कल्याण होगा एवं धर्म का लक्ष्य पूरा होगा।

‘मानव कल्याण सेवा धर्म’ के संस्थापक एम.इकबाल ने सभी सम्मानित धर्मों के सम्मानित धर्म गुरूओं को मीडिया के माध्यम से जारी पत्र में लिखा है कि आज विश्व की स्थित आपके सामने है केवल भारत में ही सामाजिक, आर्थिक व जातिगत जनगणना रिपोर्ट-2011 के अनुसार देश में कुल 24.39 करोड़ परिवार हैं जिसमें से ग्रामीण भारत में 17.91 परिवार आते हैं। इसमें से तीन- चैथाई ग्रामीण परिवार आज भी 5000 रूपये प्रति महीना से भी कम पर गुज़ारा करने को मजबूर हैं। गरीबी की सबसे अधिक मार पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले झेल रहे हैं। यहां 78 फीसद परिवारों की मासिक आमदनी 5000 रूपये से कम है। खनिज संपदा से सम्पन्न छत्तीसगढ़ में केवल छह फीसदी ग्रामीण परिवारों की आमदनी 5000 से 10000 रूपये प्रति महीना के बीच है। वहीं 10000 रूपये महीना वाले परिवार तीन फीसद से थोड़ा ही ज़्यादा हैं। इसी तरह सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में आने वाले दिल्ली, चंडीगढ़, अंडमान, पुड्डूचेरी, लक्षदीप और दादर नगर हवेली में भी 35 फीसदी परिवार ऐसे हैं जो 5000 रूपये से कम की मासिक आमदनी पर गुज़ारा करते हैं। छत्तीसगढ़ 91 प्रतिशत, मध्यप्रदेश 84 प्रतिशत, ओडिशा 88 प्रतिशत, उत्तराखंड 60 प्रतिशत, प. बंगाल 82 प्रतिशत, पंजाब 58 प्रतिशत, झारखंड 77 प्रतिशत, हरियाण 59 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश 72 प्रतिशत, जम्मू कश्मीर 67 प्रतिशत, बिहार 70 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश 53 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 16.25 करोड़ लोगों में से मात्र 3.57 फीसद स्नातक या इससे उच्च स्तर तक शिक्षित हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उ0प्र0 के बारे में यह रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 15.31 फीसद आबादी प्राइमरी स्तर से कम शिक्षित है, जबकि 16.71 प्रतिशत जनसंख्या पांचवी कक्षा तक शिक्षित है। गांवों में रहने वाले 12.8 प्रतिशत लोग उच्च प्राइमरी यानी आठवीं तक शिक्षित हैं। साक्षरों की जमात में महज 7.89 प्रतिशत को ही हाईस्कूल दर्जे की शिक्षा हासिल है जबकि सिर्फ 5.19 फीसद ही इंटरमीडिएट स्तर तक शिक्षित की श्रेणी में आते हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 35.73 प्रतिशत आबादी निरक्षर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में आयकर देने वाले अनुसूचित जाति (एससी) के परिवारों की संख्या मात्र 3.49 फीसद है, जबकि आयकर देने वाले अनुसूचित जनजाति (एसटी) परिवार 3.34 फीसद ही हंै। करीब दस फीसद ग्रामीण परिवार वेतनभोगी या नौकरीपेशा वर्ग से आते हैं। इनमें पांच फीसद सरकारी नौकरी में हैं जबकि 3.57 फीसद परिवार निजी नौकरियों में हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी करने वालों का फीसद केवल 1.11 है। अनुसूचित जाति के परिवारों में 3.96 फीसद सरकारी नौकरी और 2.42 फीसद निजी क्षेत्र की नौकरी से जुड़े हैं इसके मुकाबले सरकारी नौकरी करने वाले अनुसूचित जनजाति के परिवारों का फीसद अधिक 4.38 फीसद है। जबकि 4.66 फीसद महिला मुखिया वाले परिवार सरकारी नौकरी से जुड़े हैं। हैरानी की बात है कि क्षेत्र की नौकरी से जुड़े परिवारों में महिला मुखिया वाले परिवार 3.43 फीसद के बाद शारीरिक रूप  से अशक्त लोगों वाले परिवारों का फीसद 2.43 सबसे अधिक है। 

देश के कुल 17 करोड़ 91 लाख 64 हजार 759 ग्रामीण घरों में से 2 करोड़ 59 लाख 75 हजार 460 ग्रामीण घर उत्तर प्रदेश में है। इनमें से महज़ 68.13 प्रतिशत (1 करोड़ 76 लाख 96 हजार 167) लोगों के घर पक्के बने हैं। शेष 82 लाख 65 हजार 49 यानी 31.82 प्रतिशत लोग आज भी कच्चे घरों में रहने को मजबूर हैं। कच्चे घरों में भी हर किसी को मजबूत व महफूज घर मुहैया नहीं है। 21 लाख 33 हजार 711 लोग घासफूस व बांस से बने घरों में रह रहे हैं तो एक लाख 45 हजार 577 लोग प्लास्टिक और पाॅलीथिन के बने घरों में रहने को विवश हैं। सर्वाधिक 54 लाख 85 हजार 216 लोग मिट्टी व कच्ची ईंट के बने घरों में रहते हैं तो 1 लाख 62 हजार 140 लोगों का आशियाना लकड़ी का बना है। पक्के घरों में रहने वाले में से भी आलीशान घर महज 3 लाख 68 हजार 194 लोगों को नसीब हैं जबकि पक्की दीवारों पर टीन शेड डालकर बने घरों की संख्या एक लाख 24 हजार 485 है। सर्वाधिक एक करोड़ 68 लाख 92 घर पक्की ईंटों के बने हैं, तो दो लाख 98 हजार 22 परिवार कंक्रीट के घरों में रहते हैं। इसे ग्रामीण भारत की विडंबना ही कहेंगे कि 65 लाख 88 हजार 500 लोग आज भी एक कमरे के घर में रहने को विवश हैं। सामान्यतः माना जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में टूटी फूटी ही सही, अपनी छत होती है किन्तु उत्तर प्रदेश में आज भी दो लाख 35 हजार 50 ग्रामीण परिवार किराये के घर में रह रहे हैं लोगों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार दिलाने के सरकारी दावे के विपरीत एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि प्रदेश के 2.59 करोड़ ग्रामीण परिवारों में महज 8.65 फीसद ही नौकरीपेशा हैं। सिर्फ 4.03 प्रतिशत परिवारों को सरकारी और 1.54 फीसद को सार्वजनिक क्षेत्रों में नौकरियां हासिल हैं। 3.11 ग्रामीण परिवारों का निजी क्षेत्र की नौकरियों से ताल्लुक है। राष्ट्रीय स्तर पर पांच फीसद ग्रामीण परिवारों को सरकारी जबकि 1.12 फीसद को सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियां हासिल हैं। निजी क्षेत्र में नौकरियां पाने वाले ग्रामीण परिवारों का राष्ट्रीय औसत 3.58 फीसद है। 71.54 फीसद ग्रामीण परिवारों के कमाऊ सदस्य की मासिक आय 5 हजार रूपये से कम है।

उत्तर प्रदेश राज्य के 45 प्रतिशत ग्रामीणों के पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर 56 प्रतिशत ग्रामीण भूमिहीन हैं। ऐसे 10 करोड़ 7 लाख 77 हजार 240 परिवारों के पास बिल्कुल जमीन नहीं है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में भूमिहीन परिवारों की संख्या 45 प्रतिशत है। यहां के कुल 2 करोड़ 59 लाख 75 हजार 460 ग्रामीण परिवारों में से एक करोड़ 15 लाख 83 हजार 569 परिवारों के पास बिल्कुल जमीन नहीं है। उत्तर प्रदेश के 55 प्रतिशत ग्रामीणों के पास जमीन है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर महज 44 प्रतिशत परिवारों के पास ही जमीन है। 

राष्ट्रीय स्तर पर जहां कुल असिंचित भूूमि 40 प्रतिशत है, वहीं उत्तर प्रदेश की 55 प्रतिशत जमीन पर आज भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है। उत्तर प्रदेश में महज़ 31 प्रतिशत जमीन ऐसी है जहां दो फसलों के लिए सिंचाई की पर्याप्त और सुनिश्चित सुविधा उपलब्ध है। केवल महाराष्ट्र मंे 6 माह में 1300 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। महाराष्ट्र सरकार के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार 2015 में जनवरी से जून के दरमियान 1300 किसानों नेे आत्महत्या की। 2014 में 1981 किसानों ने आत्महत्या की। 2013 में 1296 किसानों ने हत्या की। इस प्रकार किसानों की आत्महत्या का प्रतिशत 66 फीसद तक पहुंच चुका है। उल्लेखनीय है कि 55 फीसद किसान ही मुआवज़े के हकदार हैं। विदर्भ में किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्याएं कीं हैं। यहाँ 671 किसानों ने आत्महत्या की। जून तक मराठवाड़ा इलाके के 438 किसानों ने आत्महत्या की जो कुल तादाद का 34 फीसद है’’। 

‘धर्म के कल्याण के मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम सभी धर्मों के धर्मगुरू एक प्लेट फार्म पर आकर इस संकल्प को वास्तव में क्रियान्वित करेंगे कि हम भारत के लोग भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, नंगे बदन को कपड़ा, बीमार को दवा, अशिक्षित को शिक्षा, पीडि़त को न्याय व कमजोर को सुरक्षा दिलायेंगे और स्वर्णिम भारत के निर्माण एवं भारत को विश्व शक्ति बनाने के लिए इस लक्ष्य को प्राप्त करेंगे कि हम भारत के लोग एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहां समता, समानता तथा विश्व बन्धुत्व होगा सभी को विकास के समान अवसर तथा त्वरित न्याय मिलेगा। भय, भूख, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण, साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, अन्याय से मुक्त भारत होगा। अंध विश्वास के विरूद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर विज्ञान एवं टेक्नाॅलोजी को राष्ट्रीय विकास का आधार बनायेंगे।’’

मानव कल्याण सेवा धर्म ने संसार के आठ धर्मों के पवित्र, शक्तिमाॅन एवं कल्याणकारी धर्म चिह्नों पर आधारित सर्वधर्म पवित्र शक्तिमाॅन माॅनेस्ट्री के सानिध्य में मानव कल्याण सेवा धर्म के संस्थापक एम. इकबाल ने सम्पूर्ण विश्व के सभी सम्मानित धर्मों के माननीय धर्म गुरूओं से हार्दिक आदर व सम्मान के साथ यह अपील की है। 

श्री एम. इक़बाल ने अपनी दर्द भरी अपील में विनती की है कि यदि मानव भूख, प्यास अथवा बिना दवा के मरता है और गरीबी के कारण नंगे बदन भी रहता है तथा महिलाएं एक वक्त की रोटी और अपने अबोध बालक के जीवन बचाने के लिए केवल दूध उपलब्ध कराने के लिए अपना शरीर बेचकर अपना व अपने बच्चे का पेट पालती है तो यह सभी धर्मों के मानने वालों के लिए विचारणीय मुद्दा है। मानव के दुखी होने से धर्म का कल्याणकारी लक्ष्य पूर्ण नहीं होता है इसलिए धर्मगुरूओं को एक प्लेटफार्म पर आना होगा तबही मानवता बचेगी एवं वास्तविक मानव कल्याण होगा।