हम सिर्फ वोट बैंक नहीं , नाराज़ पूर्व सैनिकों की भूख हड़ताल शुरू

हम सिर्फ वोट बैंक नहीं , नाराज़ पूर्व सैनिकों की भूख हड़ताल शुरू

नयी दिल्ली: 'वन रैंक, वन पेंशन' नीति को लागू करने में देरी से नाराज पूर्व सैनिक आज से अपनी मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। पूर्व सैनिकों ने रविवार को राष्ट्रीय राजधानी समेत देश के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन किया था। उनकी मांग है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साल पहले किये गये वादे को तत्काल पूरा करें। उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी हस्तक्षेप की मांग की है।

पूर्व सैनिकों ने रविवार को विरोध प्रदर्शन तब शुरू किया जब सरकार के साथ उनकी औपचारिक और पर्दे के पीछे जारी वार्ता विफल हो गईं। पूर्व सैनिकों को 'वन रैंक, वन पेंशन' लागू करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी गई।

सूबेदार मेजर के पद से सेवानिवृत हुए बलदेव सिंह का कहना है  'वन रैंक वन पेंशन' के लागू नहीं होने से हम बेइज्जत महसूस हो रहे हैं। सभी सरकारों ने पूर्व सैनिकों को सिर्फ वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया। वो कहते हैं कि हम सभी सैनिकों ने देश की सेना जी-जान से की। मैं खुद 4 बार 26 जनवरी की परेड में लालकिले पर सलामी दे चुका हूं। लेकिन हमारे साथ नाइंसाफी हो रही है। हम कहते हैं कि पुरानी सरकारों ने जो किया, सो किया। पर नरेंद्र मोदी सरकार लगातार वादों के बावजूद हमें हमारा हक नहीं दे रही है। बलदेव सिंह सिख लाइट इंफेंट्री में सेवा दे चुके हैं।

इस योजना से करीब 22 लाख पूर्व सैनिक और छह लाख से अधिक सैनिकों की विधवाओं को लाभ होगा। इस योजना में समान दर्जे में सेवानिवृत्त होने वाले रक्षाकर्मियों को एक समान पेंशन मिलेगी, चाहे वे कभी भी सेवानिवृत्त हों। फिलहाल सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों की पेंशन उनके सेवानिवृत्त होते समय की वेतन आयोग की सिफारिशों पर आधारित होती है। इस तरह यदि कोई मेजर जनरल 1996 में सेवानिवृत्त होता है तो उसकी पेंशन 1996 के बाद सेवानिवृत्त हुए किसी लेफ्टिनेंट कर्नल से कम होगी।

पूर्व सैनिकों का कहना है कि यह नीति असंतुलित है और इसमें संशोधन की जरूरत है। इंडियन एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट (आईईएसएम) के मीडिया सलाहकार कर्नल (सेवानिवृत्त) अनिल कौल ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर एक रैली में कहा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमें आश्वासन दिया था कि इसे लागू किया जाएगा लेकिन एक वर्ष में ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि पंजाब, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के 50 से अधिक शहरों में भी विरोध प्रदर्शन हुए।

आईईएसएम के उपाध्यक्ष मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) सतबीर सिंह ने मीडिया से कहा कि जब तक 'वन रैंक, वन पेंशन' को लागू नहीं किया जाता, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। पूर्व सैनिकों का कहना है कि वे किसी सरकार के खिलाफ नहीं है लेकिन अपनी लम्बे समय से लंबित मांग के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस बारे में उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी समय मांगा है ताकि उनके समक्ष इस विषय को उठाया जा सके।

पूर्व सैनिकों ने कहा कि मोदी सरकार ने कहा है कि वह 'वन रैंक, वन पेंशन' के अपने वादे को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन अभी तक इसे पूरा नहीं कर पायी है। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो पर अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में पूर्व सैनिकों को आश्वासन दिया था कि उनकी सरकार जल्द इस मुद्दे का समाधान निकालेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आईईएसएम द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री की आवाज हमारे दिमाग में अभी भी गूंज रही है जब वह 15 सितंबर, 2013 को रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों की रैली में गरजे थे और तब की यूपीए सरकार से ओआरओपी पर उन्होंने श्वेतपत्र जारी करने की मांग की थी। वह यहीं नहीं रके थे, बल्कि यह भी कहा था कि अगर 2004 में भाजपा की सरकार होती तो अब तक ओआरओपी हकीकत में तब्दील हो चुका होता। संगठन ने कहा कि पूर्व सैनिकों ने मोदी पर भरोसा किया क्योंकि उन्हें उनमें ओआरओपी की लंबित मांग को पूरा करने की दृढ़ इच्छाशक्ति रखने वाला नेता दिखाई दिया।

दिलचस्प बात यह है कि रविवार को पूर्व सैनिकों के विरोध प्रदर्शन में दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र और कुछ किसान समूह भी शामिल हुए। जंतर मंतर पर पूर्व सैनिकों के समर्थन में शामिल होते हुए किसानों के समूहों ने 'जय जवान, जय किसान' के नारे भी लगाए। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि ओआरओपी की फाइल अंतिम बजट मंजूरी के लिए वित्त मंत्रालय के पास है।

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