सीएएल कार्यकारिणी असंवैधानिकः समीर मिश्रा

सीएएल कार्यकारिणी असंवैधानिकः समीर मिश्रा

संघ को कम्पनी लिमिटेड बनाना चाहते हैं सचिव महोदय, लगाया मनमानी का आरोप

लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी में देश के सर्वप्रिय खेल क्रिकेट को सीएएल (क्रिकेट एसोसिएशन लखनऊ) द्वारा मनमाने ढंग से चलाने की बातें तो काफी दिनों से सामने आ रही थीं मगर लगता है पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा है। तभी तो सीएएल के मुख्य पदाधिकारियों में से एक पदाधिकारी ने आज खुले आम सीएएल के सचिव पर मनमाने ढंग से कार्य करने का आरोप लगाया है।

सीएएल के कोषाध्यक्ष समीर मिश्रा ने आज एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सचिव पर एसोसिएशन को कम्पनी लिमिटेड मंे बदलने के प्रयास का आरोप लगाया है। उन्होने वर्तमान कार्यकारिणी को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि सचिव महोदय को ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। समीर मिश्रा के अनुसार संघ के चुनाव 2005 में हुए थे, संघ के संविधान के अनुसार 2008 में चुनाव हो जाना चाहिये थे लेकिन 10 वर्ष बीत जाने के बाद भी चुनाव नहीं हुए।

कोषाध्यक्ष ने बताया कि इतना महत्वपूर्ण निर्णय सभी क्लबों की सार्वजनिक बैठक बुलाकर किया जाना चाहिये लेकिन अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते संध के सचिव एक रजिस्टर में क्लबों के पदाधिकारियों के पास जाकर हस्ताक्षर करवा रहे हैं जो पूरी तरह गलत है। समीर मिश्रा ने आरोप लगाया कि संघ को कम्पनी लिमिटेड में बदलने का निर्णय कार्यकारिणी की किसी भी बैठक में नहीं लिया गया, अगर लिया गया हो तो उसका विवरण किसी भी सदस्य को क्यों नहीं उपलब्ध कराया गया।

उन्होने कहा कि यदि किसी अपरिहार्य कारण से अतिविषेश बैठक का आयोजन करके संध द्वारा कम्पनी लिमिटेड में परिवर्तन करने का निर्णय लिया जा चुका है तो अब तक इसकी सूचना समाचार माध्यमों को क्यों नहीं दी गयी। उन्होने सचिव पर संध को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति बनाने को प्रयास करने को आरोप लगाते हुए मांग की कम्पनी लिमिटेड बनाने के लिये एक सामूहिक बैठक बुलाकर जिसमें मीडिया भी शामिल हो प्रस्ताव पर चर्चा कराई जाये और वोटिंग के आधार पर निर्णय कराया जाय।

समीर मिश्रा ने सीएएल सचिव पर चुनाव न कराने के लिये बहाने बनाने का भी आरोप लगाते हुए कहा कि सचिव महोदय के द्वारा कार्यकारिणी के निर्णय के अनुसार न तो कार्य किया जाता है और न ही संघ के वरिष्ठ सदस्यों ( गोपाल सिहं, समीर मिश्रा) द्वारा धनराशि लिये बगैर कार्य करने की सहमति देने के पश्चात भी अपने स्वार्थहित में कतिपय लोगों को संध से धनराशि की स्वीकृति प्रदान करते हुए कार्य कराया जाता है।