व्यवस्था जातिगत भेदभाव का बचाव कैसे करती है?
(आलेख : सवेरा, अनुवाद : संजय पराते)
एक पुरानी बुराई, जो भारतीय समाज को परेशान कर रही है, उच्च शिक्षा में इसके कुछ प्रभावों को कम करने के लिए एक दशक लंबा और अधूरा कदम, नए नियमों का एक सेट, एक ज़बरदस्त, लगभग सोची-समझी प्रतिक्रिया, जिसे मीडिया द्वारा और बढ़ाया गया – और बस! – इस कदम को नाकाम कर दिया गया और इसके बारे में कोई भी सोच पटरी से उतार दी गई। यह नए यूजीसी नियमों की दो हफ़्ते की यात्रा का सारांश है, जिनका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव से निपटना था।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को नए नियमों पर रोक लगा दी और सुनवाई की अगली तारीख तय की, साथ ही यह भी निर्देश दिया कि इस बीच 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। नए नियमों में कई कमियां होने के बावजूद, यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऊंची जाति के छात्रों, सत्ताधारी भाजपा के कुछ हिस्सों सहित कुछ राजनीतिक पार्टियों के विरोध और मीडिया के उन्मादपूर्ण अभियान के बाद यह कदम उठाया है। जिस तेज़ी से प्रतिक्रिया सामने आई, और जिस तरह से घटनाएँ हुईं, उससे कई लोगों को लगा कि यह सब योजनाबद्ध ढंग से किया गया था। भाजपा से लेकर बसपा तक, राजनीतिक पार्टियाँ अपनी बात से पलट रही थीं, पहले तो उन्होंने हिचकिचाते हुए नए नियमों का स्वागत किया और फिर कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने का स्वागत किया! पढ़े-लिखे लोगों की घबराहट शांत हो गई और सब कुछ सामान्य हो गया।
जातिगत भेदभाव
13 जनवरी, 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उन नियमों को अधिसूचित किया, जो एक लंबी प्रक्रिया के बाद बने थे और जिसमें सुप्रीम कोर्ट की निगरानी भी शामिल है। इन्हें 2012 के उन नियमों की जगह लेना था, जो उच्च शिक्षा संस्थानों में होने वाले बड़े पैमाने पर जाति-आधारित भेदभाव को रोकने में नाकाम रहे थे। याद दिला दें कि इस तरह के भेदभाव में रोज़ाना के ताने और अपमान से लेकर शारीरिक उत्पीड़न, और – इससे भी बुरा – संस्थागत भेदभाव तक शामिल है। 2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या और 2019 में पायल तडवी की आत्महत्या इस गहरी और घिनौनी समस्या का प्रतीक बन गईं। असल में, 2021 में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया था कि केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे उच्च शिक्षा संस्थानों में 2014 और 2021 के बीच अनुसूचित जाति समुदाय के 24, अनुसूचित जनजाति समुदाय के तीन और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय के 41 छात्रों ने आत्महत्या की। इन संस्थानों में केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईएम, आईआईटी, एनआईआईटी और विभिन्न मेडिकल कॉलेज शामिल हैं। राज्यों के विश्वविद्यालयों और अन्य राज्य-संचालित संस्थानों के आंकड़े उपलब्ध नहीं है, और शायद वे भी उतने ही चौंकाने वाले होंगे।
2012 के नियम कितने निष्प्रभावी थे, इसका अंदाज़ा यूजीसी की सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में दी गई इस जानकारी से लगाया जा सकता है कि पिछले पाँच सालों में विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118.4 प्रतिशत बढ़ गई हैं। इन शिकायतों की संख्या सालाना 200 से कम थी, जो अब बढ़कर लगभग 400 हो गई हैं।
कई विश्लेषकों ने उच्च शिक्षा संस्थानों, खासकर आईआईटी, आईआईएम जैसे कुलीन संस्थानों में मौजूद गहरे संस्थागत भेदभाव की ओर इशारा किया है। इसका एक उदाहरण दिसंबर 2020 में शिक्षा मंत्रालय द्वारा बनाए गए आईआईटी निदेशकों के आठ-सदस्यीय पैनल की एक सिफारिश थी कि आईआईटी से आरक्षण खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि वे “राष्ट्रीय महत्व के संस्थान हैं और शोध में शामिल हैं।” अगर निदेशक खुद मानते हैं कि अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़े वर्ग के छात्र शोध करने में सक्षम नहीं हैं, तो कोई सोच सकता है कि नौकरशाही और छात्र/विभाग क्या सोचते होंगे?
संस्थागत भेदभाव का एक और उदाहरण यहाँ दिया जा रहा है : 2021 में, शिक्षा मंत्रालय ने लोकसभा को बताया कि 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, अनुसूचित जाति समुदाय से सिर्फ़ एक और अनुसूचित जनजाति समुदाय से भी सिर्फ़ एक व्यक्ति को ही कुलपति नियुक्त किया गया था। याद रहे कि केंद्रीय संस्थानों में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना संवैधानिक दायित्व है।
शिक्षा परिसरों में हमारे शैक्षणिक वातावरण को असल में आज़ाद और तरक्कीपसंद होना चाहिए, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लगातार भेदभाव के साथ-साथ, अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के समुदायों के साथ-साथ बढ़ते पैमाने पर मुसलमानों जैसे हाशिए पर पड़े दूसरे तबकों के छात्रों को अपने परिसर के शैक्षणिक वातावरण में बहुत मुश्किल हालात का सामना करना पड़ रहा है। इसी स्थिति को प्रशासनिक कार्रवाई के ज़रिए ठीक करने की कोशिश की गई थी।
2012 और 2026 के बीच बदलाव
यूजीसी के नए नियमों का मकसद “खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर तबकों, विकलांग व्यक्तियों, या इनमें से किसी भी समुदाय के सदस्यों के खिलाफ, सिर्फ़ धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान, जाति, या विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना था और उच्च शिक्षा संस्थानों में सभी हितधारकों के बीच पूरी समानता और समावेश को बढ़ावा देना था।” इन्हें 2012 के नियमों की जगह लेना था। ये यूजीसी के तहत आने वाले सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होते थे, इसलिए आईआईटी, आईआईएम आदि इसमें शामिल नहीं थे। इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए, हर संस्थान को एक समान अवसर केंद्र, एक समानता समिति और समानता दस्ते बनाने थे।
2012 और 2026 के नियमों के बीच सबसे बड़ा अंतर यह था कि 2026 के नियमों में ओबीसी को शामिल किया गया था। यही मुख्य कारण था, जिससे ऊंची जातियों में विरोध हुआ। इसके अलावा, कुछ अन्य खास अंतर इस तरह थे : 2012 के नियम ज़्यादातर सलाह देने वाले थे, नियमों का पालन न करने पर संस्थान के खिलाफ किसी कार्रवाई की सिफारिश नहीं की गई थी, जबकि 2026 वाले नियमों में यूजीसी द्वारा निगरानी और भारी जुर्माने का प्रावधान था, जिसमें उसे यूजीसी की योजनाओं से बाहर करना या अनुदान न देना भी शामिल था। 2012 के नियमों में एक भेदभाव-विरोधी अफसर की नियुक्ति का प्रावधान था और भेदभाव-विरोधी अफसर के किसी भी फैसले के खिलाफ संस्थान के प्रमुख के सामने अपील करने का भी प्रावधान था। नए नियमों में शिकायतें करने और उनके निपटारे की प्रक्रिया के लिए ज़्यादा विस्तृत में प्रावधान थे। झूठी शिकायतों से निपटने का कोई प्रावधान नहीं है, जो पहले के नियमों में मौजूद था।
नए नियमों को लेकर हुए हंगामे का फोकस ऊंची जाति के छात्रों के लिए कई संभावित खतरों पर था, जिसमें उनके खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज करना, उल्टा (रिवर्स) भेदभाव, जातिगत बंटवारा भड़काना और कड़े दंड शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट, जो पिछले साल तक इन नियमों को बनाने की प्रक्रिया की खुद निगरानी कर रहा था तथा इसे दिशा-निर्देशित कर रहा था और जिसने यूजीसी को नियमों को अंतिम रूप देने की हरी झंडी दी थी, वह ऊंची जाति के छात्रों द्वारा जताई गई चिंताओं से सहमत होता दिखा और उसने नियमों पर रोक लगा दी है।
दो नावों पर सवार भाजपा/आरएसएस
उंची जाति के लोगों का उल्टा (रिवर्स) भेदभाव या जातिगत बंटवारे के गहराने का डर बेबुनियाद है। जातिगत भेदभाव पहले से ही समाज और उच्च शिक्षा संस्थानों में फैला हुआ है। ऐसी बर्बर प्रथाओं को रोकने के लिए कदम उठाने से बंटवारा गहरा नहीं हो सकता। यह वही उलटा तर्क है, जो आरएसएस/भाजपा और उनके जैसे चतुर्वर्ण व्यवस्था के समर्थकों ने दशकों से दिया है। आरएसएस ने लगातार हिंदू समाज के अलग-अलग तबकों के बीच ‘समरसता’ (शाब्दिक अर्थ, समान भावना — यानी सद्भाव) की सलाह दी है और भेदभाव के व्यवहार के लिए सज़ा देने वाले किसी भी कदम का ज़ोरदार विरोध किया है। उनका तर्क है कि दिल बदलने की ज़रूरत है, जो सज़ा के डर से नहीं, बल्कि समझाने-बुझाने से आता है।
ये साफ़ तौर पर गलत तर्क हैं और इनका मकसद सिर्फ़ जातिगत भेदभाव और ऊँच-नीच को बनाए रखना है। वे एक सदी से ऐसा कर रहे हैं, लेकिन जाति व्यवस्था में कोई बदलाव लाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इसका कारण यह है कि जातिगत भेदभाव को छिपाना और दिल बदलने की अपील करना बेकार है, क्योंकि चतुर्वर्ण व्यवस्था की जड़ें परंपरा और यहाँ तक कि आध्यात्मिक ग्रंथों में भी बहुत गहरी हैं। यह हर पल, परिवारों, स्कूलों और आम सामाजिक जीवन में आगे बढ़ता रहता है।
लेकिन आरएसएस/भाजपा का एक और मकसद है – चुनावी दबदबा। उन्हें एहसास हो गया है कि दलितों, आदिवासियों और बड़े ओबीसी समुदाय के सदस्यों के समर्थन के बिना चुनाव जीतने की उनकी संभावना बहुत कम है। और, इन तबकों को लुभाने के लिए भाजपा तरह-तरह के दिखावटी काम, आधे-अधूरे कदम और ढोल-नगाड़े बजाने में लगी रहती है। यूजीसी के नियम भी इसी श्रेणी में आते हैं – वे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ रुख लेते हुए दिखते हैं और कमेटियों और जुर्माने जैसे आम प्रशासनिक उपाय बताते हैं। पिछला संस्करण असफल हो गया था, इसलिए मज़बूत उपायों का एक नया संस्करण भाजपा के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी – या कम-से-कम वे ऐसा ही सोचते थे।
इन दोनों विरोधी लक्ष्यों – ‘समरसता’ और जातिगत भेदभाव के खिलाफ सक्रिय प्रशासनिक लड़ाई – को एक साथ लाने के लिए पहले नियमों को अधिसूचित करना पड़ा और फिर उनके खिलाफ आम जनता में हंगामा खड़ा किया गया – जिसका नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने काफी कमजोर आधारों पर रोक लगा दी। सवाल यह नहीं है कि यह सब किसी गुट या वरिष्ठ नेताओं ने योजनाबद्ध तरीके से किया था। घटनाओं का यह सिलसिला वस्तुगत रूप से आरएसएस/भाजपा के उन उद्देश्यों को पूरा कर रहा है, जिसमें वे सबको खुश करने और हिंदू समाज में फैले जातिगत उत्पीड़न को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)










