यूपी में दलित राजनीति की तैयारी में भाजपा

यूपी में दलित राजनीति की तैयारी में भाजपा

नई दिल्ली: बीजेपी दलित राजनीति को लेकर नई पहल की तैयारी कर रही है। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने राज्य में दलितों को अपने साथ जोड़ने की कवायद शुरू कर दी है। इसकी कमान खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह संभालने जा रहे हैं।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अमित शाह 24 फरवरी को यूपी का दौरा करेंगे। इसी दिन बलरामपुर में पार्टी के जिला कार्यालय की इमारत का भूमि पूजन करेंगे और बहराइच में राजा सुहेल देव की स्मृति में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। ये दोनों ही कार्यक्रम सांकेतिक होने के साथ बेहद महत्वपूर्ण भी हैं। अध्यक्ष की कमान दोबारा संभालने के बाद शाह ने पूरे देश में हर जिले में पार्टी कार्यालय की इमारत बनाने का काम शुरू किया है। बलरामपुर का कार्यक्रम इसी का हिस्सा है, जबकि बहराइच के कार्यक्रम से उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति में बीजेपी के एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।

दरअसल, 11वीं शताब्दी के राजा सुहेल देव पासी और भर समाज के प्रमुख प्रतीकों में से एक हैं। राज्य की करीब बीस फीसदी दलित आबादी में 16 फीसदी संख्या के साथ पासी दूसरी सबसे बड़ी उपजाति है। उत्तर प्रदेश में पासी समाज के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दल राजा सुहेल देव के नाम का प्रयोग करते रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी ने सरकार बनने पर राज्य भर में कई जगह राजा सुहेल देव की प्रतिमाओं की स्थापना की थी। बीजेपी और उसके सहयोगी हिंदूवादी संगठन भी राजा सुहेल देव को इतिहास में जगह दिलाने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। उनकी दलील है कि इस्लामी आक्रमणकारियों को खदेड़ने में राजा सुहेल देव की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है।

 माना जाता है कि महमूद गजनवी के भांजे सैय्यद सालार मसूद गाजी ने उसकी मौत के बाद एक लाख सैनिकों के साथ हमला बोला। इस सेना ने दिल्ली, मेरठ, कन्नौज और मलिहाबाद का रास्ता तय किया मगर बाद में बहराइच के नजदीक राजा सुहेल देव ने इसका रास्ता रोका। एक विशाल सेना का मुकाबला छोटी सेना ने किया और उसे परास्त कर दिया।

राजा सुहेल देव की इसी विरासत को लेकर दलित सियासत भी अलग-अलग रूप में आती रही है। खासतौर से तब जबकि उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं, प्रतीकों को लेकर राजनीति तेज हो रही है। मायावती की बीएसपी के लिए ये चुनाव बेहद अहम हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव में बीस फीसदी वोट हासिल करने के बावजूद वो एक भी सीट नहीं जीत सकी थीं। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित राज्य की सभी 17 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की और इस तरह उसने मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध भी लगाई। 24 फरवरी का कार्यक्रम बीजेपी का दलितों में अपना जनाधार मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा ही माना जा रहा है।