गीता एक शास्वत सत्य पुजं है: डा0 साधना मिश्रा

गीता एक शास्वत सत्य पुजं है: डा0 साधना मिश्रा

हेल्प यू एजुकेशनल एवं चैरिटेबल ट्रस्ट आयोजित किया गीता पर परिसंवाद कार्क्रम 

लखनऊ: हेल्प यू एजुकेशनल एवं चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा श्रीमद्भगवद गीता के ज्ञान को लोगों तक पहुॅंचाने के लिए उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, लखनऊ में परिसंवाद, 'वर्तमान  परिपेक्ष्य में गीता ज्ञान की प्रासांगिकता' का आयोजन किया गया।कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रगान से हुआ। हेल्प यू एजुकेशनल एवं चैरिटेबल ट्रस्ट के फाउण्डर ट्रस्टी हर्षवर्धन अग्रवाल ने सभी वक्ताओं का प्रतीक चिन्ह द्वारा स्वागत किया। 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुये डा0 साधना मिश्रा ने कहा कि श्निष्काम कर्म की जो व्याख्या गीता में दी गयी है  वह अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं है। यह ग्रन्थ मात्र धार्मिक ग्रन्थ ही नही बल्कि संपूर्ण मानव जाति से जुडा हुआ ग्रन्थ है।'गीता एक शास्वत सत्य पुजं है और सत्य की प्रासंगिकता देश और काल से ऊपर होती है। गीता भूत वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में प्रासगिक है। गीता हमारी जीवनशैली और जीवन कला से जुड़ी एक ऐसी संहिता है जो सम्पूर्ण जीव तत्व को निर्देशित करती है।

महंत दिव्यागिरी ने कहा 'मनुष्य  को जन्म लेते ही कष्टों का सामना करना पड़ता है। भगवान विष्णु ने भी जब कृष्ण रूप में धरती पर अवतार लिया तब उन्हें भी बहुत कष्टों का सामना करना पडा़। लेकिन भगवान कृष्ण तब भी प्रसन्नचित्त व रसमय थे। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य को अनेक कष्टों के होते हुए भी प्रसन्नचित्त रहने की शिक्षा दी है। 

विनोद शंकर मिश्र ने कहा कि 'गीता  में कर्म की प्रधानता है और कहा गया है कि कर्म मे ही अधिकार है फल में नही। कर्म में बुद्वि और बुद्वि में विवेक जरूरी है।'कथाकार  महेन्द्र भीष्म ने कहा कि गीता में कर्म को धर्म बताया गया है गीता में कर्म की प्रधानता पर बल दिया गया है अपने वक्तव्य में उन्होनें कहा कि परहित से बड़ा कोई पुण्य और पर पीड़ा से बड़ा कोई पाप नही होता है।

सुश्री मरयम आसिफ सिद्दीकी ने वर्तमान परिपेक्ष्य में गीता ज्ञान की प्रांसगिकता पर कहा कि गीता निष्काम कर्मयोग सिखाती है। मैंने गीता के साथ-साथ कुरान, बाइबिल व गुरू ग्रन्थ साहब का अध्ययन भी किया है। इन सभी ग्रन्थों से मैने एक ही बात जानी है और वह है मानवता। सभी धर्मग्रन्थ इंसानियत की बात करते हैं  फिर क्यों धर्म के नाम पर परस्पर उन्माद फैलाया जाता है। ये उन्माद फैलाने वाले मुट्ठी भर लोग ही होते है पर धीरे-धीरे इनका दायरा फैलता जाता है और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ता चला जाता है। जिसे रोकने की भरपूर कोशिश होनी चाहिए। हम सभी में प्रेम और सौहार्द की भावना होनी चाहिए। यही गीता ज्ञान है और वर्तमान समय में इसकी प्रासांगिकता इंसानियत के अस्तित्व का मूल मंत्र है। 

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में गदाधर नारायण सिन्हा ने कहा कि जब तक धरा में मानव प्रजाति है तब तक गीता ज्ञान की प्रासांगिकता बनी रहेगी।संगोष्ठी के बाद श्रोताओं ने वक्तागणों से प्रश्न पूछ संगोष्ठी को रोचक बना दिया श्री एस.के. वर्मा ज्वाइंट रजिस्ट्रार हाई कोर्ट लखनऊ पीठ, श्री अरूण कुमार पूर्व मुख्य अभिंयता, डाॅ0 दिनश कुमार ज्योर्तिविद, डा0 किरन मराली ने पूर्व विभागाध्यक्ष गोरखपुर विश्वविद्यालय ने भी गीता ज्ञान पर अपने प्रश्न रखते हुए विचार प्रकट किए। कार्यक्रम का संचालन नवल शुक्ला ने किया।

Lucknow, Uttar Pradesh, India