राजन के दृष्टिकोण को आईएमएफ ने दी चुनौती

राजन के दृष्टिकोण को आईएमएफ ने दी चुनौती

वाशिंगटन : आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने महामंदी जैसे खतरे की चेतावनी देकर ही लोगों को चौकन्ना किया हो पर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसंधान पत्र में राजन के इस दृष्टिकोण को चुनौती दी गयी है कि अकेले सस्ते कर्ज वाली मौद्रिक नीति ही दुनिया के लिए वित्तीय संकट का कारण बन सकती है।

राजन स्वयं आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री रहे हैं। वह उन कुछ विशेषज्ञों में है जिन्होंने अमेरिका के 2007 के वित्तीय संकट की भविष्यवाणी की थी। उन्होंने वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों को बीच ‘मौद्रिक नीति उदार बनाने की होड़’ करने के दबाव प्रति आगाह करते हुए नीतिनिर्माताओं के बीच ‘खेल के नये नियम’ बनाने के बारे में विश्वस्तर पर बहस छेड़ दी है।

लंदन बिजनेस स्कूल में पिछले दिनों एक कार्यक्रम में राजन ने चेतावनी दी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे 1930 के दशक की महामंदी जैसी समस्याओं की ओर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंकों को साथ मिलकर खेल के नये नियम तय करने की जरूरत पर बल दिया ताकि बेहतर समाधान ढूंढा जा सके।

राजन ने यह भी कहा कि यह केवल औद्योगिक देशों या उभरते बाजारों की समस्या नहीं है बल्कि इस पर ‘सामूहिक कार्रवाई की जरूरत है।’ उनके इस विचार के उलट आईएमएफ के एक अनुसंधान पत्र में कहा गया है कि सिर्फ मौद्रिक नीति आसान बनाने को ही वित्तीय अस्थिरता के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बीते समय में विश्व के समक्ष मंत्री की बड़ी समस्याएं ‘वित्तीय प्रणाली की स्थिरता की हिफाजत के लिए प्रभावी नियामकीय व्यवस्था की कमी’ के कारण पैदा हुईं। परचे के मुताबिक 2007-09 का संकट भी इसी कारण हुआ।

यह रपट बैंक आफ इंग्लैंड की अर्थशास्त्री एंब्रोगियो सेसा बियोंची और जॉन हापकिन्स यूनिवर्सिटी के ऐलेसांद्रो रेबुकी ने तैयार की है। दोनों ने 2007-09 की वैश्विम नरमी और उस दौर में वित्तीय प्रणाली या पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए लागू नीतियों की भूमिका का अध्ययन करने के बाद अपना निष्कर्ष निकाला है।

इस रपट में कहा गया है, ‘विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह बहस वैश्विक संकट पैदा करने में मौद्रिक एवं नियामकीय नीतियों की भूमिका के इर्द-गिर्द घूम रही है। चर्चा इस बात की है कि मौद्रिक नीति और वित्तीय बाजार के मध्यस्थों की निगरानी की व्यवस्था को कैसे संचालित किया जाएगा कि भविष्य में ऐसे भीषण संकटों की पुनरावृत्ति न हो।’ 

मुद्राकोष की रपट के दोनों लेखक राजन की इस बात पर सहमत हैं कि मौद्रिक नीति वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर सकती है जिसके लिए उन्होंने 2005 में राजन द्वारा तैयार रपट का हवाला दिया है हालांकि कहा कि प्रभावी नियामकीय प्रणाली इसका परस्पर संतुलन कर सकती है।

मुद्राकोष की रपट के इन दोनों लेखकों का कहना है कि अमेरिका में डाटकाम का गुब्बारा फूटने के बाद फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को तेजी से घटा दिया था। उनका तर्क है कि मौद्रिक नीति वृहद आर्थिक स्थिरता को लक्ष्य कर के ही संचालित की जा रही थी पर उस प्रणाली की नियामकीय व्यवस्था ‘वित्तीय असंतुलन का समाधान करने में कुल मिलाकर निष्प्रभावी रही और अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता के आवास ऋण बाजार में यह असंतुलन बढ़ता रहा जबकि 2004-05 में मौद्रिक नीति कड़ी कर दी गयी थी।

गौरतलब है कि डाटकाम बाजार के बैठने के बाद फेडरल रिजर्व के तत्कालीन चेयरमैन एलन ग्रीनस्पैन ने मानक ब्याज दर 6.5 प्रतिशत से घटा कर 2000-01 में 2 प्रतिशत और 2002-03 में मंदी के खतरे को टालने के लिए 1 प्रतिशत कर दी थी। लेकिन बाद में कर्ज महंगा करने की नीति अपना ली गयी और फेड की मुख्य ब्याज दर को 2004-06 के दौरान बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया था। राजन ने 2005 की रपट में आने वाले दिनों वित्तीय संकट के प्रति आगाह किया था और कहा था कि अर्थव्यवस्थाएं अतीत के मुकाबले इस समय वित्तीय क्षेत्र केंद्रित संकट के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।