आरक्षण भारतीय समाज के लिए एक बैसाखी: सत्य प्रकाश

आरक्षण भारतीय समाज के लिए एक बैसाखी: सत्य प्रकाश

आरक्षण जिसका अर्थ है सुरक्षित अधिकार | हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। जो इस प्रकार है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। शूद्रों को उनसे उच्च वर्ग के लोग अत्यधिक कष्ट देते थे।उन्हें अछूत मानते थे एवं अछूत लोगों को सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था | समाज में उच्च शिक्षा,नौकरी,एवं सामाजिक संसाधनों के प्रयोग की अनुमति नहीं थी यहाँ तक कि सार्वजनिक स्थानों पर लगे पानी के नलों को स्पर्श करने कि अनुमति भी नहीं थी ,फिर जो भी आपदा आ जाए एक अछूत प्यासा क्यों न मर जाये परन्तु नल को स्पर्श करने पर उसे प्रताड़ित किया जाता था | भीमराव आंबेडकर जो एक मराठी दलित थे एवं हिन्दू धर्म की महार जाति में आते थे, ने समाज में अनसूचित जाति और जनजाति को एक सामान लाने के लिए सम्पूर्ण जीवन संघर्ष किया,उन्होंने अपने जीवन में अत्याधिक संघर्ष किया चूँकि वह एक दलित समाज से थे तो उन्हें भी अछूत नजरों से देखा जाता था ,शिक्षा प्राप्ति के आरंभिक समय में उन्हें कक्षा में अलग सीट पर बैठाया जाता था एवं शिक्षक भी उन पर ध्यान नहीं देते थे उन्हें कक्षा के किसी बच्चे की वस्तु छूने की अनुमति नहीं थी यदि उन्हें पानी पीना होता तो ऊँचे स्थान से एक चपरासी द्वारा पानी डाला जाता था,बर्तन को स्पर्श करने की अनुमति भी नहीं थी | समाज द्वारा किये जा रहे भेद भाव ने उनके अंदर क्रान्ति की भावना पैदा कर दी और उन्होंने विदेश जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण की और विभिन्न उपाधियाँ प्राप्त की और बैरिस्टर बन गए | उन्होंने दलित समाज के लिए अत्याधिक संघर्ष किया एवं इस सम्बन्ध में वह महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू का भी विरोध किया |  

डॉ अम्बेडकर सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर दलित समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है। अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी। 1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गाँधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी। गाँधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी स्वर्ण भी पूना संधि का आदर कर, सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया। आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उमीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उमीदवार चुनते। इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म /जाति) द्वारा एक नेता चुना जाता। इस आधार पर सिर्फ एक बार सन 1937 में चुनाव हुए। आंबेडकर 20-25 साल के लिये आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण यह आरक्षण मात्र  5 साल के लिए ही लागू हुआ था | मोहनदास करमचंद गांधी ने आम्बेडकर द्वारा पृथक  निर्वाचिका की मांग का विरोध किया तथा जाति और धर्म के नाम पर आरक्ष को केवल पांच साल की मंजूरी दी थी , क्योंकि वह जानते थे की भावी  समय में इस मुद्दे को लेकर समाज में अशांति और अराजकता का माहौल पनपेगा,जिसका परिणाम साफ़ दिखाई पड़ता है आज समाज का हर वर्ग आरक्षण की मांग कर रहा है , विभिन्न नेता और राजनैतिक दल आरक्षण के नाम पर समाज के लोगों को आपस में लड़ाकर अशांति का माहौल बनाते है वह केवल अपने चुनावी फायदे को ही देखते हैं समाज पर इसका प्रभाव क्या है ? तनिक भी विचार नहीं करते | आज तक किसी नेता ने सामाजिक समानता,एकता और भाईचारे की बात तो कि परन्तु अपनी बातों पर अमल नहीं किया | आंबेडकर जी द्वारा दलितों को आरक्षण दिलाना एक बड़ी प्रशंसा का कार्य है परन्तु करमचंद गांधी जी द्वारा यदि पृथक निर्वाचिका कि भाँती ही आरक्षण की अनुमति ना दी गयी होती तो आरक्षण नाम का शब्द भी समाज के लोगों में नहीं होता, लोग आरक्षण के नाम पर लड़ नहीं रहे होते एवं आरक्षण के नाम पर चुनाव जीत रहे राजनैतिक दलों का अस्तित्व ही नहीं होता | अतः आंबेडकर जी द्वारा आरक्षण की मांग करना एक ऋणात्मक कदम रहा जो समाज को अन्धकार की ओर ले जा रहा है और भारतीय समाज के लिए बैसाखी बनकर रह गया है |