होम्योपैथी के आविष्कारक डाॅ़ हैनीमैन

होम्योपैथी के आविष्कारक डाॅ़ हैनीमैन

(10 अप्रैल जन्मदिन पर विशेष)

जीवन की उत्पत्ति के साथ ही रोगों का जन्म हुआ, तो रोगों के साथ ही उसके उपचार के तरीकों की खोज भी प्रारम्भ हो गयी। मानव समाज के अलग-अलग हिस्सों में रोगों के उपचार की विभिन्न पद्धतियों का आविष्कार हुआ। कुछ पद्धतियों का आविष्कार हुआ। कुछ पद्धतियां सामाजिक स्वीकृति के अभाव में अपना अस्तित्व खोती चलीं गयीं और कुछ अपने गुणों एवं विशिष्टताओं के कारण अपना स्थान बनाती चली गयीं। समाज में इन्हीं प्रतिस्थापित चिकित्सा पद्धतियों मंे से एक है होम्योपैथी, जो लगभग 200 से अधिक वर्षों से जन स्वास्थ्य का विकल्प बनने की ओर अग्रसर है।

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति पद्धति के आविष्कार डा. हैनीमैन का जन्म 10 अप्रैल 1755 को जर्मनी में हुआ था। कुशाग्र बुद्धि के धनी डा0 हैनीमैन ने अल्प अवस्था ही में चिकित्सा विज्ञान में एम.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। कुछ समय तक डा0 हैनीमैन ने चिकित्सा पद्धति से वह सन्तुष्ट न हो सके और चिकित्सा कार्य छोड़कर पुस्तकों का अनुवाद करने लगे। यह संयोग ही कहा जायगा कि 1710 में जब वह क्यूलेन की मैटिरिया मेडिका का अंग्रेजी से जर्मनी में अनुवाद कर रहे थे तो उन्होनें पाया कि सिंकोना नामक वृक्ष की जड़ का सत स्वास्थ्य मनुष्य को देने से जाड़ा देकर बुखार के लक्षण उत्पन्न हो जाते है। उन्होंने इसका बार-बार अपने प्रयोग किया। निरन्तर प्रयोगों तथा अनुभव के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जो औषधि द्रव्य किसी स्वास्थ्य मनुष्य मंे जो विकार एवं लक्षण उत्पन्न करती है इसी को डा0 हैनीमैन ने सिमिलिया-सिमिलिबस, क्यिूरेन्टर अर्थात् होम्योपैथी का सिद्धान्त कहा।

हैनीमैन ने बताया कि शरीर में प्राण के संचरण का काम जीवनी शक्ति करती है जिसे उन्होंने ‘वाइटल फोर्स‘ का नाम दिया। जब किसी कारण जीवनी शक्ति कमजोर हो जाती है तो शरीर में तरह-तरह के अस्वाभाविक लक्षण एवं विकार दिखायी देने लगते हैं। शक्तिकृत पोटेन्टाइज्ड होम्योपैथिक औषधियां इसी जीवन शक्ति को सक्रिय करती है और वह खुद ही शरीर को रोग मुक्त करा लेती है।

मुख्य लक्षणों के आधार पर रोगी का उपचार करने वाली होम्योपैथी में रोगी की मानसिक एवं शारीरिक बनावट, व्यक्तिगत व्यवहार एवं विचार आदि पर विशेष ध्यान रखकर उपचार किया जाता है। इसे डा. हैनीमैन ने व्यक्तिकरण का सिद्धान्त कहा क्योंकि होम्योपैथी में रोग नहीं रोगी का उपचार किया जाता है।

डा. हैनीमैन ने मियाज्म का अनोखा सिद्धान्त दिया, उन्होंने बताया कि सोरा, सिफिलिस तथा साइकोसिस मियाज्म शरीर की जीवनी शक्ति को कमजोर कर रोगी बना देते है। इसलिए होम्योपैथी द्वारा उपचार में मियाज्म का बहुत ही महत्व होता है। डा. हैनीमैन ने दवाइयों को शक्तिकृत कर प्रयोग करने का तरीका बताया इसमें औषधि द्रव्य में छिपी हुई रोग उपचारक क्षमता ऊर्जा में बदल कर अधिक फायदा करती है। इसी को डा. हैनीमैन ने औषधियों के शक्तिकरण अर्थात् पोटेन्टाइजेशन का सिद्धान्त कहा। उन्होंने होम्योपैथिक दवाइयों का परीक्षण स्वस्थ्य मनुष्य पर करने का सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिससे होम्योपैथिक औषधियों का रोगी मनुष्य पर पूरा प्रभाव हो सके तथा उसको पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हो सके। होम्योपैथिक औषधियां रोगी को जहां पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती है वहीं मनुष्य मे रोगों से बचाव करके उनसे लड़ने की शक्ति भी प्रदान करती हैं।

डा. हैनीमैन का रोगों से पीडि़त मानव को होम्यौपैथी का यह अनूठा वरदान है। होम्योपैथी में चाहे रोग नये हो या पुराने बच्चों के हों या वृद्धों के सभी का सफल उपचार है, यही कारण है कि आज होम्योपैथी भारत ही नही दुनिया के अनेक देशों में लोकप्रियता प्राप्त कर रही है। आवश्यकता इस बात की है, इस पद्धति को व्यापक सरकारी संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के माध्यम से आम जनता तक पहुंचाया जाये जिससे जनता स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकें।

डा. अनुरूद्ध वर्मा

    सदस्य,  केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद

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