क्या सोनभद्र के दलित-आदिवासी सपा-बसपा और भाजपा को वोट देंगे?

क्या सोनभद्र के दलित-आदिवासी सपा-बसपा और भाजपा को वोट देंगे?

एस आर दारापुरी

सोनभद्र उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है. यह एक आदिवासी-दलित बाहुल्य जिला है. इस जिले की कुल आबादी 18.62 लाख है जिस में से 4.21 लाख दलित और 3.85 लाख आदिवासी हैं जोकि कुल आबादी का लगभग 44% है. यह जिला कैमूर की पहाड़ियों में बसा है. इसका 3.26 हेक्टेयर भाग जंगल और पहाड़ से आच्छादित है. इसकी सीमा बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से लगती है.

यद्यपि सोनभद्र वन उपज और खनिज संपदा से भरपूर है और यह जिला उत्तर प्रदेश को सब से अधिक राजस्व देता है परन्तु विकास की दृष्टि से यह जिला नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसारर देश के 15 अति पिछड़े तथा उत्तर प्रदेश के 4 अति पिछड़े जिलों में शामिल है. यहाँ पर अधितर दलित आदिवासी भूमिहीन हैं और उनके जीवन का स्तर बहुत निम्न है. अधिकतर महिलाएं और बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. लोगों के लिए पीने का सुरक्षित उपलब्ध नहीं है और गर्मियों में पानी की अति कमी हो जाती है. विद्यालयों की कमी के कारण सामान्य जातियों, दलितों और आदिवासियों का शिक्षा दर उत्तर प्रदेश की दर से काफी कम है. जिले में स्वास्थ्य सुविधायों की बहुत कमी एवं खस्ता हालत है. सिचाई के साधनों की अत्यंत कमी के कारण कृषि अति पिछड़ी है. स्थानीय मार्किट उपलब्ध न होने के कारण किसानों को अरहर, चना तथा टमाटर आदि को अति कम दर पर बेचना पड़ता है. इन कारणों से सामान्य जातियों के साथ साथ दलित एवं आदिवासी जातियां सामाजिक तथा आर्थिक तौर पर बहुत पिछड़ी हुयी हैं.

जैसाकि सर्वविदित है कि ग्रामीण परिवेश में भूमि का बहुत महत्त्व होता है. सोनभद्र जिले की कुल आबादी (18.62 लाख) का तीन चौथाई भाग (15.48 लाख) ग्रामीण क्षेत्र में रहता है. अतःइन सबके लिए भूमि का स्वामित्व अति महत्वपूर्ण है. ग्रामीण लोगों में बहुत कम परिवारों के पास पुश्तैनी ज़मीन है. अधिकतर लोग जंगल की ज़मीन पर बसे हैं परन्तु उस पर उनका मालिकाना हक़ नहीं है. इसी लिए जंगल की ज़मीन पर बसे लोगों को स्थायित्व प्रदान करने के उद्देश से 2006 में वनाधिकार अधिनयम बनाया गया था जिसके अनुसार जंगल में रहने वाले आदिवासियों एवं वनवासियों को उनके कब्ज़े वाली ज़मीन का मालिकाना हक़ अधिकार के रूप में दिया जाना था. इस हेतु निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक परिवार का ज़मीन का दावा तैयार करके ग्राम वनाधिकार समिति की जाँच एवं संस्तुति के बाद राजस्व विभाग को भेजा जाना था जहाँ उसका सत्यापन कर दावे को स्वीकृत किया जाना था जिससे उन्हें उक्त भूमि पर मालिकाना हक़ प्राप्त हो जाना था. वनाधिकार अधिनयम 2008 में लागू हुआ, उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुत मज़बूत सरकार थी. उसी वर्ष इस कानून के अंतर्गत सोनभद्र जिले में वनाधिकार के 65,000 दावे तैयार हुए परन्तु 2009 में इनमे से 53,000 अर्थात 81% दावे ख़ारिज कर दिए गये. मायावती सरकार की इस कारवाही के खिलाफ आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने अपने संगठन आदिवासी-वनवासी महासभा के माध्यम से आवाज़ उठाई परन्तु मायावती सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. अंतत मजबूर हो कर हमे इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को सभी दावों की पुनः सुनवाई करने का आदेश अगस्त 2013 को दिया परन्तु तब तक मायवती की सरकार जा चुकी थी और उस का स्थान अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने ले लिया था. हम लोगों ने 5 साल तक अखिलेश सरकार से इलाहबाद हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार कार्रवाही करने का अनुरोध किया परन्तु उन्होंने हमारी एक भी नहीं सुनी और एक भी दावेका निस्तारण नहीं किया. इससे स्पष्ट है कि किस प्रकार मायावती और अखिलेश की सरकार ने सोनभद्र के दलितों और आदिवासियों को बेरहमी से भूमि के अधिकार से वंचित रखा. आइये वनाधिकार कानून को लागू करने के बारे में अब ज़रा भाजपा की योगी सरकार की भूमिका को भी देख लिया जाए. यह सर्विदित है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 2017 विधान सभा चुनाव में अपने संकल्प पत्र में लिखा था कि यदि उसकी सरकार बनेगी तो ज़मीन के सभी अवैध कब्जे (ग्राम सभा तथा वनभूमि ) खाली कराए जायेंगे. मार्च 2017 में सरकार बनने पर जोगी ने इस पर तुरंत कार्रवाही शुरू कर दी और इसके अनुपालन में ग्राम समाज की भूमि तथा जंगल की ज़मीन से उन लोगों को बेदखल किया जाने लगा जिन का ज़मीन पर कब्ज़ा तो था परन्तु उनका पट्टा उनके नाम नहीं था. इस आदेश के अनुसार वनाधिकार के ख़ारिज हुए 53,000 दावेदारों को भी बेदखल किया जाना था. जोगी सरकार की बेदखली की इस कार्रवाही के खिलाफ हम लोगों को फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. हम लोगों ने बेदखली की कार्रवाही को रोकने तथा सभी दावों के पुनर परीक्षण का अनुरोध किया. इलाहबाद हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध पर बेदखली की कार्रवाही पर रोक लगाने, सभी दावेदारों को छुटा हुआ दावा दाखिल करने तथा पुराने दावों पर अपील करने के लिए एक महीने का समय दिया तथा सरकार को तीन महीने में सभी दावों पुनः सुनवाई करके निस्तारण करने का आदेश दिया. अब उक्त अवधि पूर्ण हो चुकी है परन्तु सरकार द्वारा इस संबंध में कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी है.

इसी बीच माह फरवरी में आरएसएस की एक संस्था वाईल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वनाधिकार कानून की वैधता को चुनौती दी गयी तथा वनाधिकार के अंतर्गत निरस्त किये गये दावों से जुडी ज़मीन को खाली करवाने हेतु सभी राज्य सरकारों को आदेशित करने का अनुरोध किया गया. मोदी सरकार ने इसमें आदिवासियों/वनवासियों का पक्ष नहीं रखा. परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई तक ख़ारिज हुए सभी दावों की ज़मीन खाली कराने का आदेश पारित कर दिया. इससे प्रभावित होने वाले परिवारों की संख्या 20 लाख है जिसमे सोनभद्र जिले के 65,000 परिवार हैं. इस आदेश के विरुद्ध हम लोगों ने आदिवासी वनवासी महासभा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट फिर गुहार लगाई जिसमें हम लोगों ने बेदखली पर अपने आदेश पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों का पुनर्परीक्षण करने का अनुरोध किया. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए 10 जुलाई तक बेदखली पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों की पुन: सुनवाई का आदेश दिया है जिस पर चुनाव उपरान्त कारवाही की जानी है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि किस तह पहले मायावती और फिर अखिलेश यादव की सरकार ने दलितों, आदिवासियों और वनवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत भूमि के अधिकार से वन्चित किया है और भाजपा सरकार में उन पर बेदखली की तलवार लटकी हुयी है. यह विचारणीय है कि यदि मायावती और अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में इन लोगों के दावों का विचरण कर उन्हें भूमि का अधिकार दे दिया होता तो आज उनकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती. इसी प्रकार यदि मायावती ने अपने शासन काल में भूमिहीनों को ग्रामसभा की ज़मीन जो आज भी दबंगों के कब्जे में है, के पट्टे कर दिए होते तो उनकी आर्थिक हालत कितनी बदल चुकी होती. अतः यह विचारणीय है कि क्या मायावती, अखिलेश और भाजपा सरकार द्वारा दलितों,आदिवासियों और वनवासियों को भूमि के अधिकार से वंचित करने की इस कार्रवाही के सम्मुख वे लोग इस चुनाव में उन्हें वोट देंगे?