कम मतदान कहीं मोदी की विदाई का संकेत तो नहीं !

कम मतदान कहीं मोदी की विदाई का संकेत तो नहीं !

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी राज्य मुख्यालय लखनऊ। इस बार के आमचुनाव में बुनियादी फ़र्क़ महसूस किया जा रहा है पिछले चुनाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि पिछली सरकारों ने अपने काम के आधार पर वोट माँगा था और वर्तमान सरकार ऐसा कुछ करती नज़र नही आई।कभी बजरंग बली और अली की बात की गई तो कभी बालाकोट को मुद्दा बनाने की कोशिश की गई इन सबसे हटकर हिन्दू-मुसलमान करने की भी भरपूर्व कोशिश की गई परन्तु मोदी की भाजपा नाकाम रही ऐसा ग्राउंड ज़ीरो पर देखने को नही मिला 2019 के चुनाव में मोदी की भाजपा ने पूर्व सरकारों को पीछे छोड दिया है पूर्व की सरकारों ने अपने काम को आगे रख वोट माँगे थे चाहे भाजपा की ही 2004 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार हो या 2009 में मनमोहन सरकार हो दोनों सरकारों ने अपने काम के दम पर वोट माँगे थे जिसमें देश की जनता ने अटल सरकार को नकार दिया था और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए को सरकार बनाने का मौक़ा दिया था उसके बाद फिर 2009 में मनमोहन सिंह सरकार को ही मौक़ा दिया था लेकिन 2014 के आमचुनाव में RSS व उससे जुड़े संगठनों के द्वारा एक झूट फैलाया गया कि देश में भ्रष्टाचार अपनी सभी सीमाएँ पार कर चुका है इसमें इनके झूट को सच साबित करने के लिए अन्ना हज़ारे ने भी बुग्ला भक्त बनकर RSS के ही एजेंडे को आगे बढ़ाया जिसको लोगों ने सच मान लिया जबकि ये सच नही था क्योंकि भ्रष्टाचार की क़लई को खोलने के लिए मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार कानून लाकर एक क्रान्तिकारी क़दम उठाया था जिसके बाद ही यह सब मामले खुले थे जबकि हक़ीक़त में इन मामलों में कुछ नही निकला कोर्ट ने सुनवाई करते हुए ज़्यादातर मामले खतम कर दिए है लेकिन जनता में झूट से ही सही आक्रोश फैल गया और मनमोहन सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर मोदी की भाजपा को सत्ता की चाबी सौंप दी मोदी की भाजपा ने जनता को यह यक़ीन दिलाया था कि हम सबका साथ सबका विकास के एजेंडे पर काम करेगे इसको भी लोगों ने सच मान लिया जबकि हक़ीक़त इसके विपरीत रही न विकास की बात हुई न सबको साथ लेकर चलने की बात दिखाई दी बल्कि गोदी मीडिया के ज़रिए हिन्दू-मुसलमान के नाम पर ज़हरीली ख़बरों को परोसा गया जो अभी तक जारी है।असल बात जो देखने को मिली वो ये रही कि मोदी की भाजपा ने अपने काम को वोट माँगने का आधार नही बनाया और न ही काम को आधार बनने दिया।लोकसभा संग्राम 2019 के आमचुनाव में 543 सीटों में से चार चरणों में 374 पर चुनाव हो चुका है जिसके बाद ये कहा जा सकता है कि देश में किसकी सरकार बनेगी ये लगभग तय हो चुका है।मोदी की भाजपा ने काम को आधार नही बनाने का क्या कारण है क्या वास्तव में मोदी की सरकार काम करने व देश को आगे ले जाने में नाकाम रही है ये बात सही है कि मोदी की भाजपा सरकार न देश को आगे बढ़ा पाई और न ही देश के विकास को गति दे पाई अगर ये दोनों बातें न होती तो मोदी की भाजपा अपने कामों को जनता में मुद्दा बनाती न बना पाने की वजह ही मोदी सरकार के पास कोई ठोंस कार्य नही है जिसके दम पर वह जनता के बीच जाती।मोदी सरकार को गोदी मीडिया का सहारा है जो उसको हिसाब से ज़्यादा सपोर्ट कर रहा है।कम मतदान को लेकर भी बहुत कुछ क़यास लगाए जा रहे है क्योंकि 2014 के चुनाव में देश की जनता ने सरकार के खिलाफ भरपूर वोट किया था उसी का नतीजा था मोदी की भाजपा ने 282 सीट जीत ली थी और एनडीए समेत 330 सीट जीतकर सरकार बनायी थी और जब 65 फ़ीसद वोटरों ने अपने मत का प्रयोग किया था जो आज चार चरणों में 60 फ़ीसद हो रहा है आमतौर पर कम मतदान सरकार के पक्ष में माना जाता है लेकिन पता नही ऐसा क्यों लग रहा है कि इस बार का कम मतदान मोदी सरकार की विदाई का कारण बनेगी उसकी वजह ये मानी जा रही है कि मोदी के वोटर ने ये मान लिया है कि मोदी तो आ ही रहा है तो उसका वोटर उतने जोश के साथ मतदान केन्द्र पर नही है जैसा हमने भी ग्राउंड ज़ीरो पर देखा मोदी के भक्तों में 2014 जैसा जोश नही है लेकिन मोदी विरोधी वोटर में मतदान केन्द्रों पर जाने की होड़ लगी है और वह झमाझम तरीक़े से मोदी के विरोध में वोटो की बारिश कर रहे है यही वजह है मोदी सहित उनके रणनीतिकार इसको लेकर परेशान है कि सत्ता के जाने का कारण कम मतदान ही न बन जाए तभी तो मोदी ने झारखंड में एक सभा के दौरान मतदाताओं से मतदान करने की अपील की इससे पहले भी वाराणसी में भी यही बात कह चुके है।अगर नरेन्द्र मोदी की सरकार चली गई तो मोदी को नोटबंदी व राफ़ेल में की गई गड़बड़ियों का रह रह कर ख़याल तो नही आ रहा है कि सत्ता जाने के बाद इन दोनों मामलों की कही जाँच न हो जाए और ये सही भी है इन दोनों विषयों पर गंभीर जाँच होने पर जेल के जंगलों की हवा दिखाई दे रही होगी इस लिए मोदी की भाजपा किसी भी क़ीमत पर सरकार नही जाने देगी चाहे इसके लिए यूपी जैसा ही गठबंधन क्यों न करना पड़े न होने वाला लेकिन सियासी मजबूरियां सबकुछ करा देती है जैसे यूपी में हुआ भी है बसपा-सपा एक मंच पर आए भी किसी को हैरत भी हुई तो किसी को ख़ुशी भी हुई पर सरकार नही जानी चाहिए करना कुछ भी पड़े क्या मायावती की लाटरी निकल सकती है।