भारतीय कृषक और राजनीति

भारतीय कृषक और राजनीति

डाॅ. नीतू सिंह तोमर, पोस्ट डाॅक्टोरल फेलो, विश्वद्यिालय अनुदान आयोग दिल्ली

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था अति स्वार्थी रहीसों के चंगुल में फंसी होने के कारण कृषक उपेक्षित तथा समस्याओं एवं व्याधियों से पीड़ित है। कृषकों के लिए सस्ते दामों पर खाद, बीज, खाद्यान्न्ा का विक्रय एवं अच्छे दामों पर खाद्यान्न्ा खरीद तथा आपदा राहत और ऋणमाफी आदि पर केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लाखों लाख करोड़ रुपये वार्षिक व्यय किए जा रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2017-18 में उर्वरक पर 65 हजार करोड़ रुपये, खाद्यान्न्ा पर 1.40 लाख करोड़ रुपये सब्सिडी तथा 2.20 लाख करोड़ रुपये कृषि कर्ज कृषकों को राहत देने के नाम पर माफ किए गए है। इनमें से सर्वाधिक 43 हजार करोड़ रुपये आन्ध्र प्रदेश और 38 हजार करोड़ रुपये मध्य प्रदेश सरकारों ने ऋणमाफी किया है। इसके बावजूद कृषकों की बदहाल स्थिति बनी हुई है। ठंड और भूख की मार से बेहाल कृषक आए दिन ‘आत्महत्या’ कर रहे हैं। कृषि प्रधान देश होते हुए भी भारत में कृषि और कृषकों की दशा बहुत गिरी हुई है। आखिर क्यों?

भारत में निर्धन हैं और इन्हीं के समान निर्धन उद्योग भी है। दुर्भाग्य से कृषि भी उनमें से एक है। कृषकों के पास सदा से पूँजी का अभाव रहा है। वह उत्तम बीज, खाद, कृषि-यंत्रों का क्रय नहीं कर सकता। इसे साख की सस्ती सुविधाएँ भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं वह मुख्य रूप से व्यापारियों से रुपया उधार लेता है, जो अत्यधिक शोषण करता है और इसके चंगुल में फंस जाने के बाद कृषक के लिए छुटकारा पाला कठिन हो जाता है। इस प्रकार ऋण की जंजीरों ने कृषक और कृषि की कमर तोड़ ड़ाली है। इसकी आय का अधिकांश भाग ऋण के ब्याज में ही चला जाता है। इस ऋण के कारण कृषक की भूमि व्यापारियों के हाथ पहुँच जाती है और कृषक भूमिहीन बनता चला जा रहा है। इस प्रकार कृषक ऋण में जन्म ले रहा है, ऋण में जीवन चलता है और ऋण में ही मर जाता है।

देश में तीव्र गति से हो रही जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति उपलब्ध भूमि का औसत घटता जा रहा है। 1961 में प्रति व्यक्ति भूमि का औसत 0.30 हेक्ट था जो 1971 में 0.25 हेक्ट एवं 1991 में 0.20 हेक्ट तथा 2011 में 0.14 हेक्ट हेक्टे.रह गया। देश की 32.9 करोड़ हेक्ट भूमि क्षेत्रफल में से 17.1 करोड़ हेक्ट(52.4ः) भूमि में कृषि की जाती है। देश में भूमि का वितरण अत्यधिक असन्तुलित है। भूमि सुधार कानून लागू होने के बावजूद भी आज 1ः अति रहीसों के पास कुल भूमि का 50ः भाग है, 10ः धनी-कृषकों के पास कुल भूमि का 20ः भाग है तथा 89ः कृषकों के पास कृलभूमि का 52.4ः भाग है। कृषि भूमि का असमान वितरण और प्रति व्यक्ति भूमि के घटने कृषक कल्याण सरकारी योजनाओं के ऋणमाफी एवं आपदा राहत लाभ वास्तविक कृषकों के स्थान पर भूपति, पूँजीपति, जमींदार, सामन्त को दिए जाने के कारण कृषि क्षेत्र में अदृश्य बेरोजगार तथ रोजगार की गंभीर समस्या विद्यमान है।

देश में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हो चुका है एवं भूमि सुधार लागू है। फिर भी कृषकों को भूमि उपलब्ध नहीं हो पाई है। सुधार के लिए उठाए गए कदम निश्चित ही संतोषजनक हैं परन्तु इन्हें उचित रूप से लागू करने के अभाव में इनका प्रभाव संतोषजनक नहीं हो पाया है। भूमि सुधार कानूनों का सख्ती से पालन नहीं किया गया है। खेतों में काम करने वाले कृषकों, बटाईदारों और खेतिहर मजदूरों के पास अपनी भूमि उपलब्ध नहीं है। खेतों में काम करने वाले आपदाग्रस्त भूमिहीन बटाईदार-खेतिहर श्रमिक कृषकों को सरकारी योजनाओं के लाभ से जबरदस्त वंचित कर बटाई-कटौती पर भूमि उठाने वाले जमींदारों एवं सामंतों को फसल बीमा, ऋणमाफी, आपदा राहत एवं फसल प्रोत्साहन-सम्मान लाभ मनमान ढंग से दिया जा रहा है।

विभिन्न्ा जमींदारी उन्मूलन अधिनियमों में यह छूट दी गई है कि विधवा, अवयस्क, सैनिक या असमर्थ लोग अपनी भूमि को दूसरों को जोतने के लिए दे सकते है। इसको पट्टेदारी कहते हैं। कुछ राज्यों में निर्धारित क्षतिपूर्ति करने के बाद पट्टेदारों को भूमि का स्वामित्त्व प्राप्त करने के अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसके बावजूद अधिकांश कृषि भूमि का मालिकाना स्वामित्त्व भूपति, सामन्तों, जमींदारों, व्यापारियों, पूँजीपतियों, उद्योगपतियों, राजनेताओं, रहींसों के पास है, जो कृषि भूमि को कटौती, किराए, अर्द्ध-बटाई पर देकर कृषि कार्य किए बिना लाभ लेकर वास्तविक कृषकों का शोषण व उत्पीडन कर रहे हैं।

खाद, बीज, गेंहू, चावल, चीनी, तेल, कोयला आदि की सरकारी-सार्वजनिक दूकान-समितियों एवं कृषि बीमा, ऋण, सब्सिडी, तथा आपदा राहत ऋणमाफी आवंटन के पात्रों की स्थिति अवलोकन करने से पता चलता हैं कि गरीब कृषक श्रमिकों हेतु बनी अन्त्योदय-बी.पी.एल. पात्रता ऐसे रहीस व्यक्ति-परिवारों को मिली है जो धन, पद के प्रभाव में फर्जी गरीब-कृषक असहाय बने हुए हैं। यह फर्जी गरीब-कृषक सरकारी योजनाओं का कोटा, बीमा, ऋण, पट्टा, सब्सिड़ी, खाद, बीज, खाद्यान्न्ा, असहाय पेंशन, राशन, तेल, चीनी, गैस-विद्युत कनेक्शन, छात्रवृत्ति, आरक्षण, नौकरी, ऐजेन्सी, ऋण, आपदा राहत, ऋणमाफी, आवास, शौचालय, सब्सिडी आदि फर्जीबाड़ा करके हड़प रहे हैं। जबकि, इनके पास काफी बड़े प्लाट, भूमि, भवन, जायदाद, ए.सी., फ्रिज, मोटर-वाहन, नौकरी, व्यापार, उद्योग आदि स्वामित्त्व है तथा सरकारी भूमि-भवन पर अवैध कब्जा करके गरीबों का शोषण एवं उत्पीडन कर रहे है। ऐसी स्थिति साक्ष्य हैं- कानपुर परिक्षेत्र के जिलों में रहीसों की अन्त्योदय-बी.पी.एल.की पात्रता, नगरवासियों की ग्रामसभाओं में पदासीनता, गैरजनपदीय को जिला पंचायत अध्यक्ष एवं ब्लाक प्रमुख पदासीनता, शहरी गरीबों की कांशीराम कालोनी में रहीसों के निवास, गरीब पट्टा भूमि पर रहीस हवलियाँ, चरागाहों एवं सरकारी भवनों पर कब्जा-बिक्री, गरीब आवास-शौचालय अवंटनों में रहीसों की पात्रता, कटौती-बटाई पर भूमि देने वालों को आपदा राहत, ऋणमाफी आदि हैं।

कृषकों के निवास गाँव की गन्दी बस्तियों में तथा आजीविका कृषि श्रम है। जनसंख्या में वृद्धि से कृषक परिवार तेजी से विघटित हो रहे हैं। कृषकों के घरों एवं भूमि के बंटबारों से आवास लघु हो रहे हैं। कृषक परिवार के अनेक सदस्य एक कक्ष में एवं कम भूमि पर बड़े परिवारों का जीवन-यापन कर रहे हैं। आवासों एवं कृषि जोतों की लघुता के कारण अनेक कृषक अपना घर-भूमि बेंच शहर जाकर मजदूरी कर रहे हैं। अनेक कृषक बेरोजगार एवं बेकार हैं। कृषक प्रतिपाल्यों के लिए महंगी शिक्षा कल्पना से परे है। अधिकांश कृषक निरक्षर या अल्प शिक्षित हैं। कृषक परिजनों के लिए अच्छे स्कूलों में शिक्षा असम्भव सिद्ध हो रही है। महंगाई के कारण कृषक और उनके परिजन जीवन की मूल वस्तुओं के अभाव में जीवन यापन कर रहे हैं। यह जीवन को बनाए रखने व जीवन की मूलभूत जरूरतों की पूर्ति हेतु घर-जमींन बेंचने को मजबूर हैं।

कृषक परिवारों में तीव्र गति से फैल रही गरीबी एव बेरोजगारी के कारण जहाँ एक ओर कृषक व उसके परिजन जीवन की मूलभूत वस्तुओं अभाव में गुजारा करने को मजबूर हैं वहीं दूसरी ओर बढ़ती गरीबी के कारण कृषक पुत्र-पुत्रियों का विवाह कर पाने में असमर्थ हैं। लगातार क्षतिग्रस्त हो रहे कृषक आस्तित्त्व पर विचारोपरान्त कहा जा सकता है कि अब कृषक परिवारों को आरक्षण दिए जाने की विशेष जरूरत है। अन्यथा की स्थिति में कृषक परिवारों के नष्ट हो जाने की संभावनाएं प्रबल हैं।

कृषकों की बहुत बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद कृषक नेतृत्त्व का पूर्णतया अभाव है। यदि कोई कृषक अपने नेतृत्त्व से कृषक कल्याण या जनसेवा का प्रयास भी करता है तो पदलोलुप, स्वार्थी और अन्य जातीय नेताओं का चरणामृत ग्रहण कर गुलामी का जीवन-यापन करने वाले एक जुट होकर हमलावर हो जाते हैं। कृषक नाम के सहारे पनपे अधिकांश स्वार्थी राजनेता अपने सामने किसी भी सामान्य कृषक को बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं। कृषकों के पतन में पाखंडी राजनेताओं के प्रपंच प्राचीनकाल की भांति प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। अधिकांश कृषक पाखंडी-नेताओं के अंधानुकरण करने को अति मजबूर हैं। चतुर-चालाक पाखंडी-नेता चुनाव प्रचार-प्रसार में भ्रमक घोषणाएं एवं गरीब कृषक उत्थान एवं कृषक विकास के वादे कर कृषकों से वोट भीख ले रहे हैं। इसके बावजूद देश, समाज व सदन में कृषक विरोधी राजनीति कर रहे हैं एवं चुनावों में कृषक विरोधी रहीस को जिताने हेतु कृषक वोट तो ले रहे हैं, परन्तु कृषक प्रत्याशी को कृषक वोट भी नहीं मिलने देते हैं। भले ही जाति-परिवार वादी, अपराधी, भ्रष्टाचारी, आतंकवादी के गले लगना पड़े या हाथ पलटकर हाथी, कीचड़ में कमल खिलाना पड़े।

आज लोकतांत्रिक व्यवस्था के सभी पदों पर राजनीतिक हस्ताक्षेप चरम पर है। सभी संवर्ग-पदों पर आसीन अधिकांश लोग या तो उच्च पदस्थों एवं उनके परिजनोें की आवभगत में जुटे हुए हैं या फिर अपने पद पर निष्क्रय बने हुए हैं। उच्च से निम्न सदनों की पदासीनता हेतु प्रत्याशिता, नौकरी, संवैधानिक पदों पर चयन-मनोनयन में साधारणजनों की उपेक्षा तथा रहीस, नेता, व्यापारी और उनके परिजनों को राज्यपाल, मंत्री, कुलपति, निदेशक आदि का ‘पद-प्रसाद’ जारी है। भले ही वह अपराधी, अति वृद्ध-जर्जर, अयोग्य, अमानक हो। केन्द्र, राज्य, जिला, ग्राम सदन कार्य-कारणी पदों पर अधिकांश अति रहीस पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, भाई-बहिन व मां-बेटे सभी परिजनों सहित बारंबार पदासीन हो रहे हैं। बड़े व्यापार-मकान के स्वामी होने के बावजूद सरकारी आवास, वेतन-भत्ते, पेंशन्स सरकारी कोषों से प्राप्त हो रहे हैं। यह व्यापारी, दलाल एवं अधिकारियों से भोजन, नाश्ता, प्रेट्रौल, भेंट, उपहार लेने के बावजूद भोजन, नाश्ता, यात्रा बिलों का भुगतान सरकारी कोषों से ले रहे हैं। यह दरिद्र असहायो एवं सरकारी-सार्वजनिक भूमि-भवनों पर जबरदस्त कब्जा कर रहे हैं। इनके द्वारा सार्वजनिक विकास निधियों का धन फर्जी बाउचर्स से हड़पा जा रहा है। दरिद्र जनता के कल्याण उद्देश्य से निर्मित विकास योजनाओं का धन-सम्पत्ति व्यापारियों को बेंच कर स्वःलाभ कमाया जा रहा हैं। बी.पी.एल., अन्त्योदय, दरिद्र-असहाय पेंशन, आवास, राशन, गैस, विद्युत, मनरेगा, आरक्षण आदि योजनाओं का लाभ दरिद्रों की जबरदस्त उपेक्षा कर रहीसों को फर्जी दरिद्र बनाकर हड़पा जा रहा है। सरकारी विद्यालयों में छात्र-शिक्षण हीनता व शिक्षक बाहुल्यता के बावजूद फर्जी छात्र-संख्या के आधार पर शिक्षक भर्ती एवं मिड-डे-मील तथा इंटर एवं डिग्री कालेजों में बिना पढ़े-पढ़ाए नकल-परीक्षा एवं डिग्री बंटन व्यापार हो रहा है। निम्न से उच्च सदनों के प्रस्ताव हंगामों एवं वेतन-भत्तों की वृद्धि तक सीमित हो रहे हैं। सरकारी कोषों से करोड़ों-अरबों रुपये व्यय कर आयोजित मंचों पर राजनैतिक लोगों का गुणगान होता है तथा रोजी-रोटी माँग रही जनता की समस्याओं पर राजनेता एवं अधिकारी कोई ध्यान नहीं देते हैं।

नेतृत्त्व पाने वाले लोगों एवं उनके सगे-सम्बंधियों एवं दलालों की गतिविधियाँ कृषकों के लिए अत्यन्त घातक हो रही हैं। नेताओं के संबंधी-दलाल अपने को महानायक के रूप में प्रतिष्ठित करने में लगे रहते हैं। इनकी सरकारी सुख-सुविधाएँ विशिष्ट हैं। सरकारी धन होटल्स एवं आहार-विहार एवं मौज-मस्ती पर व्यय होती हैं। इनके सहयोगी उच्चस्तरीय एवं सर्वगुण सम्पन्न धनी वर्ग विशेष के होते हैं। यह जनसाधारण एवं कृषकों से सदैव दूरी बनाए रखते हैं। व्यापारी व शातिर अपराधी अपने लाभ-सुरक्षा हेतु नेताओं के परिजनों को मिष्ठान, फल, दावत, गिफ्ट, धन, भंेट एवं कमीशन देकर इनकी कृपा के पात्र बनते हैं।

नायक एवं नेतृत्त्व की गतिविधियों पर विचारोपरान्त कहा जा सकता है कि नेतृत्त्व कर रहे लोग अपने स्वलाभ के लिए किसी भी हद तक जाकर कुछ भी कर सकते हैं। राष्ट्रीय धन-सपत्ति इनके जेब की वस्तु होती है। जब चाहें, जहाँ चाहें, वहाँ प्रयोग या नष्ट कर सकते हैं। देश-विकास की धन-सम्पत्ति मनमाने प्रस्ताव से हथिया कर पीढ़ियो सहित भविष्य सुरक्षित कर लेते हैं।

धनी नेता, व्यापारी और अधिकारी कृषकों से घृणा करते हैं। कृषक सदैव शक्तिशाली लोगों के आक्रमण एवं विद्वेष के निशाना बनाए जाते हैं। इन्हें हर स्तर पर सताया जाता है और जलील किया जाता है। इनसे भेदभाव किया जाता है। इन्हें निरक्षरता एवं सामाजिक पूर्वाग्रह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन्हें ऋण पर ऊँची दर से ब्याज देना पड़ता है। इन पर दोषारोपण किया जाता है। जिन कार्यालयों में ये जाते हैं, वहाँ इनकी ओर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है। कृषक एवं उनके प्रतिपाल्य जिन महत्त्वपूर्ण समस्याओं का सामना करते हैं, वे हैं-1. भर पेट भोजन का अभाव, 2. वस्त्रों का अभाव, 3. आवास अभाव, 4. स्वास्थ्य-चिकित्सा अभाव, 5. साधनहीनता, 5. निरक्षरता, 6. ऋणग्रस्तता, 7. बेरोजगारी, 8. पूँजीवाद, 9. जातिवाद, 10. अस्पृश्यता, 11. अंधानुकरण, 12. बालश्रम, 13. बालविवाह, 14. अस्पृश्यता, 15. भ्रष्टाचार, 16. अन्याय, 17. दबंग-दहशत, 18. आतंक, 19. बिचैलिया, 20. उत्पीडन, 21. भिक्षावृत्ति, 22. मद्य, 23. नशा, 26. भूखनन, 27. सूखा-बाढ़, 28. सामंत, 29. राजनीति।

कृषक की मुख्य पहचान कृषि में संलग्न परिवारिक श्रम आधारित आजीविका से होनी चाहिए। खेतों में काम करने वालों को ही कृषि भूमि का स्वामित्त्व मिलना चाहिए। कृषकों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकारी योजनाएँ ‘दरिद्रताग्रस्त एवं अन्याय के शिकार जनसाधारण और गरीब कृषकों की सहायतार्थ होनी चाहिए। देश-ग्राम सदन-समितियों में दो तिहाई पदासीनता गरीब कृषकों मात्र की होनी चाहिए। किसी भी संवैधानिक संस्था-सदन में रहीसों एवं उनके परिजनों की पदासीनता पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। सदन एजेण्डा-वार्ता विषय पर विचारोपरान्त प्रस्ताव एवं भाषण करने हेतु कृषकों के नाम आमन्त्रित होने चाहिए। कृषकों के हितों की सुरक्षार्थ सक्रिय वास्तविक कृषक लाभान्वित-सम्मानित होने चाहिए। कृषकों को चाहिए कि कृषक समाज संगठित होकर बैठक-सम्मेलन आयोजित करें ताकि अधिकारी-राजनेता दौड़े चले आएँ। कृषकों की भावनानुरूप सम्मेलन-बैठकों के मंच भारत भूमि की झांकियों तक सीमित रहें। किसी भी गरीब कृषक का उत्पीडन करने वाले या गरीब कृषकों की सहायता के नाम पर दलाली कर लाभ कमाने वालों पर अंकुश लगना चाहिए। जनाधारित सभी चुनाव प्रस्तावित रहें कि प्रत्याशी गरीब कृषक तक सीमित हों।