सरयू के तट पर राम मंदिर की हुंकार

सरयू के तट पर राम मंदिर की हुंकार

-आशीष वशिष्ठ-

हिंदुत्व की हांडी में राम मंदिर का मुद्दे एक बार फिर से पकने लगा है। देश में फिलवक्त पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इनमें से तीन राज्यों में भाजपा की सरकार है। वहीं 2019 के आम चुनाव भी दरवाजे पर खड़े हैं। मौसम चुनाव का हो और भारतीय जनता पार्टी और भगवा ब्रिगेड को राम मंदिर की याद न आये ऐसा हो ही नहीं सकता। पिछले दो दशकों में जब भगवान राम ने ही चुनाव के कीचड़ में धंसे भाजपा के रथ को बाहर निकालने का काम किया। अगर ये कहा जाए कि आज भाजपा को जो स्वरूप और आन-बान-शान है वो राम मंदिर आंदोलन की बदौलत है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा।

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का ये विवाद 490 साल पुराना है। हर बार चुनाव में भाजपा भगवान राम को याद करती है। राम मंदिर का मुद्दा उछालती है। राम मंदिर बनवाने के संकल्प को दोहराती है। चुनाव खत्म होते ही राम मंदिर को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। लेकिन इस बार भाजपा और मोदी सरकार सबसे बड़े भंवर में फंसी है। ऐसे में भाजपा अपने सबसे मजबूत और आजमाये राम मंदिर मुद्दे पर लौटती दिख रही है। अयोध्या विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। राम मंदिर पर बिल या अध्यादेश आएगा या फिर कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जाएगा, यह तो समय ही बताएगा, परंतु इस मामले पर असमंजस की स्थिति बनना स्वाभाविक है, क्योंकि मसला राजनीतिक नफा-नुकसान से भी संबंधित हो सकता है। फिलवक्त राम मंदिर के मुद्दे को जिस तरह भाजपा और भगवा ब्रिगेड गरमा रही है, उससे ऐसा आभास हो रहा है कि 1992 की भांति इस बार भी कुछ होने वाला है।

बीते 29 अक्टूबर को अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई की तारीख आगे सरकाने के बाद से संत महात्माओं, हिंदू समाज और हिंदूवादी संगठनों में भारी नाराजगी का माहौल है। इस नाराजगी के माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिन्दू परिषद मेढ़बंदी करने में जुटे हैं। इसकी शुरूआत अयोध्या में 25 नवंबर को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की विराट धर्म सभा से हो रही है। धर्म सभा के चलते अयोध्या में सरगर्मियां तेज हो गयी है। वहीं शिवसेना ने भी राम मंदिर मुद्दे को लेकर अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। हाल ही में दिल्ली में विशाल धर्म सभा का आयोजन हुआ। जिसमें देश के प्रसिद्ध साधु-संतों ने मोदी सरकार को राम मंदिर मामले में दो टूक निर्णय लेने का फरमान सुनाया। राम मंदिर और अयोध्या के संदर्भ में पहली बार इतना विशाल, 124 संप्रदायों के साधु-संतों का सम्मेलन आयोजित हुआ था।

शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे 24 और 25 नवंबर को अयोध्या आ रहे हैं। उद्धव रामलला के दर्शन करने के साथ ही सरयू तट पर पूजा अर्चना भी करेंगे। अयोध्या जाने से पहले शिवसेना सुप्रीमो ने नया नारा दिया है, ‘हर हिंदू की यही पुकार, पहले मंदिर-फिर सरकार।’ यानी अगले साल लोकसभा चुनाव में सरकार बाद में बने लेकिन पहले राम मंदिर बन जाना चाहिए। विश्व हिंदू परिषद के पूर्व प्रमुख प्रवीण तोगड़िया भी पिछले दिनों अयोध्या में अपना शक्ति प्रदर्शन कर चुके हैं। शिवसेना, तोगड़िया के राम मंदिर मुद्दे में कूदने से भाजपा व भगवा ब्रिगेड थोड़े दबाव में है। ऐसे में बीजेपी और भगवा ब्रिगेड धर्म सभा को भव्य से भव्यतम बनाने में जुटे हैं। मोदी सरकार पर शिवसेना सरीखे सहयोगी दलों, संघ का और 2019 में चुनावी संभावनाओं के गंभीर दबाव हैं। भाजपा के अधिकतर सांसद भी मुखर होकर बोल रहे हैं। साक्षी महाराज का साफ मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करते रहे, तो एक हजार साल भी लग सकते हैं और फिर भी राम मंदिर नहीं बनेगा। लिहाजा भाजपा सांसदों और नेताओं की लगातार मांग है कि सरकार या तो अध्यादेश लाए अथवा संसद के जरिए कानून बनाए। लब्बो लुआब यह है कि राम मंदिर को लेकर हिंदुत्व की कड़ाही में लंबे समय बाद उबाल आया है। जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव का समय निकट आएगा ये हवा तेज से और तेज होती जाएगी।

पिछले दिनों अयोध्या में रामलला के दर्शन के बाद आरएसएस के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी का बयान कि ‘तिरपाल में रामलला का आखिरी दर्शन हैं’, से काफी कुछ समझा जा सकता है। धर्म सभा में राम भक्त अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे। आरएसएस, वीएचपी और भारतीय जनता पार्टी मिलकर राम भक्तों के शक्ति परीक्षण कार्यक्रम में एक लाख से ज्यादा राम भक्तों को बड़ा भक्त माल की बगिया में बुला रहे हैं। इतिहास के पन्ने पलटे तो अयोध्या का विशेष ब्रांड के हिंदुत्व से परिचय 1989 के रामजन्मभूमि मुक्तियज्ञ, 1990 की कारसेवा और 1992 के ढांचाध्वंस कांड से हुआ। जब मंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्ध दूर-दराज के रामभक्तों ने अयोध्या की ओर रुख किया और उन्होंने मंदिर के लिए हुंकार भरी। 1990 की कहानी तो रक्तरंजित हो उठी। शासकीय प्रतिबंध और चप्पे-चप्पे पर तैनात सुरक्षा बलों की परवाह न कर विवादित परिसर की ओर बढ़े डेढ़ दर्जन कारसेवकों ने प्राणों की आहुति दी। इससे पूर्व अयोध्या कफ्र्यू, सुरक्षाबलों की निगरानी, कारसेवकों की धमक और नेताओं की आमद-रफ्त की अभ्यस्त हो चली थी। 1992 का घटनाक्रम तो जगजाहिर है। इसके बाद से रामनगरी हिंदुत्व के केंद्र के तौर पर प्रवाहमान है पर उस दौर का उभार फिर लौटकर नहीं आ सका। 1992 का वह रोष और आक्रोश, तनाव और उत्तेजना आज के माहौल में भी महसूस किया जा सकता है। उन कारसेवकों में साधु-संत, राजनीतिक कार्यकर्ता और आम आदमी भी थे। आज उप्र में मुलायम सिंह नहीं, योगी आदित्यनाथ की सत्ता है और देश में ‘मोदी सरकार’ है!

उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या और राम मंदिर की कितनी भूमिका रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। यही नहीं, 1991 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जब पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी थी तो पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने के तत्काल बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए आया था। सन् 2017 में उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी है तब से अयोध्या के विकास के लिए न सिर्फ तमाम घोषणाएं की गईं बल्कि दीपावली के मौके पर भव्य कार्यक्रम और दीपोत्सव का आयोजन भी किया गया है। फिलवक्त राम मंदिर मुद्दे की कमान भाजपा की ओर से यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के हाथों में है। फैजाबाद जिले का नामकरण अयोध्या करने के बाद से ही राजनीति और भगवा टोली की सरगर्मियां पूरे उफान पर हैं। 2010 में हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया जाए और उसमें से दो-तिहाई हिस्से मामले से जुड़े हिंदू पक्षों को सौंप दिए जाएं और एक तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया जाए। तीनों ही पक्षों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि सभी पक्ष आपस में बातचीत करके विवाद सुलझाएं। मगर इसकी तो शुरुआत तक नहीं हुई।

यह विवाद 1988 से ही राजनीतिक रूप धारण कर चुका है, जब भाजपा ने हिमाचल के पालमपुर में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव पारित किया था। नतीजतन 1989 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 2 से 85 सीटों तक उछाल लगाई थी। 1996 में 161 सीटों के साथ भाजपा लोकसभा में पहली बार सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी, लेकिन जनादेश अधूरा होने के कारण वाजपेयी सरकार 13 दिनों तक ही टिकी रह सकी। बहरहाल वाजपेयी सरकार 1998 से 2004 तक रही, क्योंकि भाजपा की सीटें 182 थीं और एनडीए के रूप में एक सशक्त, व्यापक गठबंधन उभरकर सामने आया था, लेकिन राम मंदिर बनाने की शुरुआत तक नहीं हो सकी, क्योंकि गठबंधन के कई दल सहमत नहीं थे।

आज स्थितियां भिन्न हैं। मोदी सरकार के पास गठबंधन समेत पर्याप्त बहुमत है। राज्यसभा में भी भाजपा-एनडीए सबसे बड़ा पक्ष हैं। कुछ और दलों के धुव्रीकरण से बहुमत के आसार भी बन सकते हैं, जिस तरह राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में हुआ था। आरएसएस के सरसंघचालक का भी स्पष्ट समर्थन है। गठबंधन के घटक दल भी भाजपा के समर्थन में हैं। यदि भाजपा को हिंदुओं की इतनी ही चिंता है, तो अब इस दौर में राम मंदिर बन जाना चाहिए। अलबत्ता इस मुद्दे को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि दूसरे कई मुद्दे भी अहम हैं, जिनकी अनदेखी होती रही है।

मुस्लिम नेताओं ओवैसी और जफरयाब गिलानी ने राम मंदिर पर अगर अध्यादेश आता है तो उसेे अदालत में चुनौती देने की धमकी भी दी है। उनकी दलील है कि देश संविधान से चलता है, न कि हेकड़ी की सत्ता से३। सरकार मंदिर और मस्जिद में भेद करेगी, तो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा, जिसमें समानता के अधिकार की व्याख्या है। बहरहाल मोदी सरकार और भाजपा के लिए यह सांप-छुछूंदर वाली स्थिति है। यदि मई, 2019 से पहले इस मुद्दे का निपटारा नहीं होता है, तो प्रधानमंत्री मोदी की दोबारा सत्ता में आने की कोशिशों को धक्का लग सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि करीब 2-3 फीसदी वोट भाजपा से छिटक कर दूर जा सकते हैं। इसी से जीत-हार का अंतर बढ़ सकता है, लिहाजा अब आखिरी दारोमदार प्रधानमंत्री मोदी पर ही है। देखते हैं कि उनका कदम क्या होता है? फिलवक्त सरयू के तट पर 1992 जैसा माहौल बनाने की तैयारियां आसमान छू रही हैं। इन सबके बीच यह बात तय है कि भाजपा और भगवा ब्रिगेड राम नाम लहर के करंट, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों और सियासी नफे-नुकसान के अंकगणित के हिसाब से फैसला लेंगे।