राफेल डील में कोई घोटाला नहीं हुआ: CEO एरिक ट्रैपियर

राफेल डील में कोई घोटाला नहीं हुआ: CEO एरिक ट्रैपियर

नई दिल्ली: राफेल डील पर विपक्ष खासतौर से कांग्रेस,केंद्र सरकार को जबरदस्त तरीके से घेर रही है। लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से ये बार बार कहा जा रहा है कि राफेल डील को अंजाम तक पहुंचाने के लिए नियमों और कानून की अनदेखी नहीं की गई है। ये बात अलग है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी ने सीधे तौर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि देश का चौकीदार ही चोर है। अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने में नरेंद्र मोदी सीधे तौर पर जुड़े हैं। लेकिन इस बीच डसॉल्ट के सीईओ एरिक ट्रैपियर का बयान केंद्र सरकार के लिए राहत लेकर आया है।

डसॉल्ट के सीईओ एरिक ट्रैपियर का कहना है कि हमने खुद अनिल अंबानी का चयन किया था। रिलायंस के अलावा हमारे सामने 30 लोगों ने प्रस्ताव दिया था। इंडियन एयरफोर्स डील को इसलिए आगे बढ़ा रही थी क्योंकि उसे यकीन था कि राफेल फाइटर जेट उनकी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं

एरिक ट्रैपियर ने कहा कि वो जानते हैं कि इस मुद्दे पर कुछ विवाद हैं। लेकिन सच ये भी है चुनावों के मौके पर घरेलू राजनीति की वजह से इस तरह के मामले सामने आते हैं। उनके लिए सबसे जरूरी बात है कि सच क्या है और सच यही है कि यह क्लीन डील है और भारतीय वायुसेना भी इस डील से खुश है।

कांग्रेस पार्टी के साथ हमारे संबंध बहुत पुराने हैं। 1953 में भारत के पहले पीएम नेहरू के कार्यकाल में हमारी पहली डील साइन हुई। उसके बाद ये सिलसिला दूसरे प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में जारी रहा। हम किसी पार्टी के लिए काम नहीं कर रहे हैं। हम सिर्फ भारतीय वायुसेना और भारत की सरकार को सामरिक उत्पाद मुहैया करा रहे हैं और ये सबसे महत्वपूर्ण है।

एरिक ट्रैपियर ने कहा कि वो झूठ नहीं बोलते हैं। इस संबंध में वो सच्चाई सबके सामने रख चुके हैं और जो कुछ भी कहा है कि वो पूरी तरह तथ्यों को आधार बनाकर सच्चाई के करीब है। उनकी ख्याति न तो झूठ बोलने की है और न ही सीईओ जैसे पद पर आसीन होकर झूठ बोल सकते हैं।

राफेल जेट की कीमतों को समझाते हुए एरिक ट्रैपियर कहते हैं कि 36 राफेल विमानों के सौदे की कीमत 18 फ्लायावे के बराबर है। आप जानते हैं कि 36, 18 का दूना होता है। इस लिहाज से 36 विमानों की कीमत वहीं होनी चाहिए थी। लेकिन सरकार-सरकार के बीच समझौते होने की वजह से इसके दाम दूना होना चाहिए था। ये बात जानकार आपको हैरानी होगी कि डसॉल्ट को प्राइस बढ़ाने की जगह 9 फीसद कीमत घटानी पड़ी।

जहां तक रिलायंस में पैसे डालने की बात है तो ये बात गलत है सौदे का पैसा डसॉल्ट- रिलायंस ज्वाइंट वेंचर में जा रहा है। डसॉल्ट के इंजीनियर और कर्मचारी इसके औद्योगिक उत्पादन में अग्रणी भूमिका में हैं। डसॉल्ट की जिम्मेदारी सिर्फ बेहतर उत्पाद मुहैया कराने की है और उस दिशा में हम आगे बढ़ चुके हैं।