2G स्‍पेक्‍ट्रम में घोटाला हुआ ही नहीं

2G स्‍पेक्‍ट्रम में घोटाला हुआ ही नहीं

कोर्ट ने सुनाया फैसला, राजा और कनिमोई समेत 15 बरी

नई दिल्ली: दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने बहुचर्चित 2जी घोटाले में गुरुवार को पूर्व दूरसंचार मत्री ए.राजा और डीएमके प्रमुख एम.करुणानिधि की बेटी कनिमोझी सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया है. कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान 2008 में दूरसंचार विभाग द्वारा 2जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन में कथित तौर पर अनियमितता हुई थी, जिसका 2010 में कैग की रिपोर्ट के बाद व्यापक स्तर पर खुलासा हुआ था. सीबीआई जज ओपी सैनी ने टू जी घोटाले पर राजा और कनिमोई को बरी करते हुए फैसले में कहा, किसी ने दूरसंचार मंत्रालयल के किसी वर्जन पर विश्वास नहीं किया जा सकता. सभी ने इसमें एक बडा घोटाला देखा, जबकि ऐसा हुआ ही नहीं था. आरोपियों के खिलाफ दलीलों को साबित करने वाले पुख्ता सबूत नहीं और अधिकारियों की समझदारी सवालों के घेरे में है. उनको कई चीजों के अर्थ तक मालूम नहीं थे.

सीबीआई जज ने कहा कि मैं यह भी जोड़ना चाहूंगा कि पिछले लगभग सात साल से पूरी तन्मयता के साथ सभी कार्यदिवसों पर, जिनमें ग्रीष्मावकाश भी शामिल हैं, ओपन कोर्ट में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैठा रहा और इंतज़ार करता रहा कि कोई शख्स कानूनन स्वीकार्य सबूत लेकर सामने आएगा, लेकिन सब व्यर्थ गया. कोई भी सामने नहीं आया. इससे संकेत मिलता है कि हर कोई अफवाहों, गपशप और अटकलों के आधार पर बनी सार्वजनिक धारणा के हिसाब से चल रहा है. बहरहाल, सार्वजनिक धारणा का न्यायिक कार्यवाही में कोई स्थान नहीं होता.

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और ऐसा कोई सबूत नहीं है जो आरोपियों की अपराध को साबित करता हो. फिर चाहे वो कट ऑफ डेट के फिक्स करने की बात हो या पहले आओ पहले पाओ नीति के मैन्युपुलेशन का मामला हो, कंपनियों को स्पेक्ट्रम देने की बात हो या कलाईनार टीवी को 200 करोड़ रुपये रिश्वत के तौर पर देने का आरोप हो. अदालत ने कहा कि इस केस के आरोपपत्र ऑफिशियल रिकॉर्ड की मिसरीडिंग और संदर्भ से हट कर है.

कोर्ट ने कहा कि आरोप-पत्र जांच के दौरान गवाहों के तरफ से दी हुई मौखिक गवाही पर आधारित है, जो गवाहों ने कोर्ट में गवाही के दौरान नहीं बोली. अगर गवाहों ने मौखिक तौर पर बयान दिया है और अधिकारिक रिकॉर्ड के खिलाफ जाते है तो कानून में मान्य नहीं है. आरोपपत्र में रिकॉर्ड किये गए बहुत से तथ्य गलत हैं. मसलन एंट्री फीस के रिवीजन की वित्त सचिव द्वारा सिफारिश करना और एंट्री फीस के रिवीजन को ट्राई द्वारा सिफारिश.

कोर्ट ने कहा नतीजा यही है और मुझे ये कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं है कि आरोपियों के खिलाफ केस को साबित करने में अभियोजन पक्ष बुरी तरह से नाकाम रहा है. कोर्ट ने कहा कि सीबीआई का आरोप-पत्र वेल कोरियोग्राफ्ड है. अभियोजन पक्ष तो ये ही तय नहीं कर पाया कि वो आखिर साबित क्या करना चाहता है?

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