तीन तलाक़: शरीयत में कोई भी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं

तीन तलाक़: शरीयत में कोई भी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दारुल उलूम की तीखी प्रतिक्रिया

नई दिल्ली: एक साथ ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के ऐतिहासिक फैसले के बाद पूरी दुनिया मे दीनी तालीम और फतवों के लिए मशहूर सहारनपुर के दारुल उलूम देवबंद का बड़ा बयान आया है. दारुल उलूम के वीसी मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तीन तलाक का मसला शरीयत-ए-इस्लाम का मसला है, जिसको तब्दील नही किया जा सकता. यह इंसान का बनाया हुआ मसला नहीं बल्कि कुरान-ओ-हदीस से साबित है.

दारुल उलूम मोहतमिम ने कहा कि शरीयत में कोई भी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं होगी. मोहतमिम ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड प्रकरण में जो फैसला लेगा उसमें हम उनके साथ हैं. हम ये चाहते हैं कि जो मजहबी मसले हैं, उसमें अदालतें और संसद हस्तक्षेप न करे. संसद को भी इस पर कानून बनाने से पहले सोचना चाहिए.

तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बरेलवी मसलक से जुड़े मौलानाओं ने कहा कि वह इस फैसले से सहमत नहीं हैं. महासचिव जमात-ए-रजा के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा, " किसी को भी शरीयत में दखल देने का हक नहीं है. अबी तो सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को हिदायत जारी की है. अब देखना ये है कि किस तरह का कानून केंद्र सरकार बनती है. लेकिन इस तरह का फैसला शरीयत में दखल है जो ठीक नहीं है. क्योंकि संविधान में सभी को अपने तरह से धर्म को मानने का हक है. अब देखना यह है कि केंद्र सरकार किस तरह का कानून बनाती है."

वहीं बरेली के दरगाह आला हजरत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा जो भी कानून बनना चाहिए वह शरीयत की रोशनी में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नजर में बनाया जाए.

''सुप्रीम कोर्ट का फैसला आखिरी नहीं है. अभी पार्लियामेंट को कानून बनाने का जिम्मा सौंपा गया है. पार्लियामेंट से हम बात करेंगे कि जो भी कानून बनाया जाए, वो शरीयत की रोशनी में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नजर में बनाया जाए.''

अलीगढ़ में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया गया है. तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में भी इसका स्वागत किया गया है. एएमयू में इतिहासविद् इरफान हबीब ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि शरीयत का कानून बहुत जगह लागू नहीं होता है. उन्होंने कहा कि कानून पार्लियामेंट को बनाना चाहिए.

एएमयू की शिक्षिका रकिया हुसैन ने तीन तलाक को सामाजिक बुराई बताई और का पुरुषों ने अपने फायदे के लिए सिस्टम को बना रखा था. उन्होंने कहा कि ये मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ था और इसे बैन कर देना चाहिए. इस्लाम ने कभी तीन तलाक की इजाजत नहीं दी.

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