नोएडा में कथित आतंकियों की गिरफ्तारी जनता को डराने का ड्रामा:  मोहम्मद शुऐब

नोएडा में कथित आतंकियों की गिरफ्तारी जनता को डराने का ड्रामा: मोहम्मद शुऐब

लखनऊ । रिहाई मंच ने पिछले दिनों नोएडा से आतंकवाद के आरोप में दो नौजवानों के पकड़े जाने के पुलिस के दावे को आईबी द्वारा पूरे देश में आतंकवाद का भय पैदा करने की कोशिश का हिस्सा बताया है, ताकि गणतंत्र दिवस जिसमें मुख्य अतिथि के बतौर अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आ रहे हैं, छत्तीसिंहपुरा या अक्षरधाम हमला जैसी कोई बड़ी आतंकी हमले की बड़ी घटना अंजाम दी जा सके। इन हमलों में तब केन्द्र में रही भाजपा सरकार की भूमिका संदिग्ध रही है। या फिर आतंकवाद के नाम पर बाटला हाउस की तरह कुछ फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देकर आतंकवाद का हौव्वा खड़ा किया जा सके। संगठन ने अमित शाह द्वारा पोरबंदर तट के करीब बोट में हुए कथित विस्फोट के मामले में खुफिया एजेंसियों को मुंबई हमले जैसे एक और हमले से बचा लेने को हास्यास्पद और वाह वाही लूटने का ड्रामा करार देते हुए कहा कि कई अखबारों में सुरक्षा संस्थानों के अधिकारियों के बयानों से स्पष्ट हो गया है कि इसकी कोई पुष्टि नहीं हो सकी है कि नाव में आतंकी सवार थे। बल्कि इसकी संभावना ज्यादा है कि वे ड्रग्स और डीजल की तस्करी करने वाले अपराधी थे, जिनकी बोट में भागने के दौरान विस्फोट हो गया। 

संगठन द्वारा जारी बयान में रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्म्द शुऐब ने कहा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने और अजीत डोभाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने के बाद से ही तय हो गया था कि एक बार फिर से 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्व के दौरान आतंकवाद के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों और गिरफ्तारियों का दौर एक बार फिर वापस लाया जाएगा। जिसकी शुरुआत मध्य प्रदेश के खंडवा जेल से कथित तौर पर भागे बताए जा रहे आतंकियों की रोज-रोज अखबारों में खुफिया सूत्रों के हवाले से छपती खबरों, जिनमें उन्हें एक साथ कई राज्यों में देखे जाने का दावा तो किया जाता है, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से पकड़ा नहीं जा पा रहा है और पश्चिम बंगाल के बर्धवान धमाकों से हो चुकी है। जिसमें कई मीडिया और स्वतंत्र जांच रिपोर्टों से यह संदेह पुख्ता हुआ है कि इस धमाके के पीछे एनआईए और संघ परिवार का हाथ है। एनआईए वर्धमान धमाके में मारे गए जिस करीम शेख को मारने का दावा कर रही है उसके पिता जमशेद शेख उसे अपने बेटे का शव मानने से इंकार कर रहे हैं। तो वहीं एनआईए की जांच पर सबसे बड़ा सवाल तो पुलिस के मुखबिर परवेज खान का सार्वजनिक हुआ यह बयान लगा देता है जिसमें उसने कहा है कि विस्फोट में घायल व्यक्ति को, जिसे पुलिस करीम शेख बता रही है, ने उसे अपना नाम स्वपन मंडल बताया था। यह नाम अखबारों में भी छपा था। उन्होंने कहा कि इसीलिए देखने में आ रहा है कि नोएडा से गिरफ्तार बताए जा रहे एक कथित बांग्लादेशी के वर्धवान धमाके से भी जुड़े होने की खबरें खुफिया विभाग कथित सूत्रों के हवाले से अखबारों में परोस रहा है ताकि उसकी भूमिका पर उठ रहे सवाल दबाए जा सकें। मोहम्मद शुऐब ने कहा कि यह महज संयोग नही है कि जिन दो नौजवानों को जिनमें से एक सहारनपुर के देवबंद इलाके का बताया जा रहा है, को 19 दिसंबर को केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों द्वारा कथित तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया था। लेकिन मीडिया में उसकी खबरें नए साल की पहली तारीख में लीक की जाती हैं। ताकि नए साल के पहले ही दिन से देश वासियों को आतंक का डर दिखा कर युद्धोन्माद पैदा किया जा सके। 

रिहाई मंच आजमगढ़ के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने पूछा है कि यह कैसे हुआ कि जिस मीडिया को आईबी और पुलिस किसी आतंकी के पकड़े जाने के फौरन बाद ही उसका नाम पता और टारगेट बता देती है वह इस मसले पर इतने दिन क्यों चुप रही? और क्यों उनकी गिरफ्तारी की खबर सार्वजनिक करने के एक दिन पहले ही गाजियाबाद के एसपी धर्मेन्द्र सिंह यादव ने प्रेस कान्फ्रेंस कर बताया कि गाजियाबाद में 10 आतंकवादी छुपे हुए हैं। जिनकी गिरफ्तारी के लिए सघन अभियान 26 जनवरी तक चलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि 26 जनवरी तक दिल्ली या उसके आस-पास आतंकवाद के नाम पर कोई विस्फोट या फर्जी मुठभेड़ करने की फिराक में खुफिया एजेंसियां क्या लगी हुई हैं। जैसा कि 2009 में भी 24 जनवरी के दिन नोएडा में हुआ था। जब 2 बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को आतंकी बताकर फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। उन्होंने संदेह व्यक्त किया कि हो सकता है इस बार खंडवा जेल से भागे बताए जा रहे नौजवानों को फर्जी मुठभेड़ में मारा जाए जो खुफिया एजेंसियों की अवैध हिरासत में हैं। 

रिहाई मंच केे नेता अनिल यादव ने कहा कि फर्जी गिरफ्तारी के इस गंदे खेल में उत्तर प्रदेश की सपा सरकार भी शामिल है। जबकि वह इसी वादे के साथ सत्ता में आई थी कि वह आतंकवाद के नाम पर बंद बेगुनाह नौजवानों को रिहा कर देगी। इसे निभाना तो दूर ऐसे ही बेगुनाह नौजवान खालिद मुजाहिद का कत्ल भी करवा दिया और निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर भी अमल नहीं किया। जिसने उनकी और तारिक कासमी की फर्जी गिरफ्तारी दिखाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कारवाई की सिफारिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा सरकार पूरी तरह से खुफिया एजेंसियों के मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक एजेंडे को बढ़ाने में लगी है इसीलिए केन्द्रीय खुफिया और सरक्षा एजेंसियों ने एक बार फिर नोएडा से मुस्लिम नौजवानों को पकड़ा है। जैसा कि सपा सरकार में सीतापुर के मोहम्म्द शकील के साथ हुआ था। जिन्हें दिल्ली से आई स्पेशल सेल ने आतंकी बता कर पकड़ा और जेल में डाल दिया। या फिर जैसा कि लियाकत शाह मामले में देखा गया जिन्हे गोरखपुर से पकडऩे के बाद दिल्ली स्पेशल सेल ने दिल्ली से गिरफ्तार दिखा दिया और कहा कि होली के मौके पर दिल्ली को दहला कर अफजल गुरू की फांसी का बदला लेने आया था। जबकि बाद में पता चला कि वह सरेन्डर कर चुका आतंकी है जो सरकार की सहमति से ही वापस कश्मीर जा रहा था। जिसे फंसाने के लिए दिल्ली स्पेशल सेल के अधिकारियों ने एक होटल में छापा मारकर हथियारों के बरामद होने का दावा किया। जिसमें पाया गया कि ये विस्फोटक और अवैध हथियार दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के ही अधिकारी ने ही रखा और अपना पता होटल के एन्ट्री रजिस्टर में दिल्ली स्पेशल सेल का आफिस लिखा।

रिहाई मंच के नेता हरेराम मिश्र ने कहा गणतंत्र दिवस पर ओबामा के भारत आने के समय खुफिया विभाग द्वारा किसी बड़े आतंकी धमाके के अंजाम दिए जाने से इंकार नहीं किया जा सकता। इससे पहले भी पिछली राजग सरकार में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दौरे की पूर्व संध्या पर कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा गांव में 30 मार्च 2000 को कथित आतंकी हमले में भारतीय सेना की पोशाक पहने और भगवा संगठनों द्वारा लगाए जाने वाले धार्मिक नारे लगाते हुए 36 सिखों को कत्ल कर दिया गया था। इस पर बिल क्लिंटन ने भी संदेह जाहिर किया था कि इसे हिन्दुत्ववादी आतंकियों ने अंजाम दिया था। इस बात को उन्होंने अमरीकी उपमंत्री मैडलिन अलब्राइड की पुस्तक Óद माइटी एंड द अलमाइटी: रिफलेक्शनस् ऑन अमेरिका, गॉड एंड वल्र्ड अफेयरÓ की भूमिका में भी लिखा था। और जिसे तत्कालीन अमरीकी उपमंत्री स्टोरोक टलबोट ने अपनी पुस्तक Óइंगेजिंग इंडियाÓ में भी लिखा है कि क्लिंटन ऐसा मानते थे कि छत्तीसिंह पुरा नरसंहार हिन्दुत्ववादी आतंकियों ने किया था। इसके सच होने की संभावना इससे भी बढ़ जाती है कि इस मामले में जिन लोगों को दोषी बताया गया था वे सब अदालत से बरी हो चुके हैं। वहीं 24 सितंबर 2002 को भी अमरीकी उपमंत्री क्रिस्टीना रोक्का के दौरे के दौरान कथित आतंकी हमला हुआ था जिसमे सभी आरोपी न सिर्फ दोष मुक्त हो गए हैं बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गृहमंत्री का भी पदभार देख रहे नरेन्द्र मोदी पर इस मामले में पोटा के तहत मुकदमा आयद करते हुए अपने ÓदिमागÓ का इस्तेमाल न करने के लिए फटकार लगाई है। उन्होंने कहा कि इस कथित आतंकी हमले को कई वरिष्ठ पुलिस अधिकरियों व मानवाधिकार संगठनों द्वारा भी खुफिया विभाग द्वारा कराया गया बताया गया था। ताकि मोदी के पक्ष में दो माह बाद होने वाले चुनाव में माहौल बनाया जा सके। हरे राम मिश्र ने कहा कि राजग सरकार के दौरान अमरीकी नेतृत्व के भारत आने पर भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अंजाम दिए जाने वाले फर्जी आतंकी घटनाओ के पुराने रिकार्ड को देखते हुए आम जनता को चैकन्ना रहना चाहिए।

Lucknow, Uttar Pradesh, India