(आलेख : शमिक लाहिड़ी, अनुवाद : संजय पराते)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पास आ रहे हैं। वामपंथी पार्टियों, खासकर सीपीआई(एम) पर मीडिया की कड़ी नज़र है, जिससे उनकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति के बारे में कई सवाल उठ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग कभी सीपीआई(एम) को अप्रासंगिक मानते हुए खारिज करते थे, अब उन्हें उसकी मौजूदगी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी की गतिविधियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाने के कारण, वे विवादित मुद्दे उठाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए, इनमें से उनकी कुछ चिंताओं पर सीधे तौर पर बात करना ज़रूरी है। एक अहम सवाल यह है : पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सीपीआई(एम) का अधिकृत रुख क्या है? खास तौर पर, क्या सीपीआई(एम) ने तृणमूल कांग्रेस का अंध-विरोध करने के कारण एसआईआर को खुला समर्थन दिया था?

एसआईआर गलत

बिल्कुल नहीं। सरासर झूठ। हमारी पार्टी ने पहले दिन से ही कहा है कि चुनाव आयोग प. बंगाल में “एसआईआर” करने की रट लगाकर एक खतरनाक काम कर रहा है। वे लोगों को डराने के लिए नागरिकता को हथियार बना रहे हैं। हम यह स्पष्ट कहना चाहते हैं : चुनाव आयोग के पास नागरिकता तय करने का कोई अधिकार नहीं है ; अगर उसे कोई शक है, तो उसे 76 लाख मतदाताओं को परेशान करने के बजाय घरेलू मामलों के मंत्रालय से सलाह लेनी चाहिए। जबकि “घुसपैठियों” की बात ज़ोर-शोर से कही जा रही है, असली आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं : बिहार में, सिर्फ़ 390 संदिग्धों के कारण 1.30 करोड़ लोगों को लाइनों में खड़ा होने के लिए मजबूर किया गया – एक ऐसा आंकड़ा, जिसे चुनाव आयोग ने कोर्ट में चुनौती देने की ज़हमत भी नहीं उठाई – और बंगाल में, एक भी नहीं मिला, फिर भी लाखों लोगों को अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए पुरानी ज़मीन की डीड के लिए हाथ-पैर मारने पड़ रहे हैं। दूसरे राज्य में काम करने वाला एक प्रवासी मज़दूर यहाँ आने के लिए हज़ारों रुपये खर्च करने को मजबूर है और उसे दूसरी सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है, जिससे चुनाव से ठीक पहले घबराहट फैल रही है।

और ईमानदारी से सोचें कि भारत में ‘विदेशियों’ की खोज करने का क्या मतलब है? हड़प्पा से लेकर आज तक, भारत एक सम्मिश्रण वाला क्षेत्र है। हम संस्कृतियों का मिश्रण हैं। आप सिर्फ एक राजनीतिक कहानी को बढ़ावा देने के लिए किसी नागरिक को मतदाता सूची से नहीं हटा सकते। अकादमिक रूप से कहा जाए, तो केवल आदिवासी आबादी ही पूरी तरह से स्वदेशी है और कोई नहीं। धर्म के आधार पर लोगों को “बाहरी/विदेशी” कहना इतिहास को नजरअंदाज करना है।

एक और बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है। एक चालाकी से छिपाया गया “दोहरा-लाभ घोटाला” चलाया जा रहा है। जहाँ गरीबों को कभी खत्म न होने वाली सुनवाई का सामना करना पड़ रहा है, वहीं टीएमसी-भाजपा का गठबंधन खास इलाकों में “नकली वोटरों” को चुपचाप बचाता है, जिससे चुनाव आयोग जैसी “संवैधानिक संस्था” एक “राजनैतिक हथियार” बन जाती है। उदाहरण के लिए, जहाँ दूसरे चुनाव क्षेत्रों में मतदाता सूची के मसौदे से 25,000 से 30,000 तक नाम हटाए गए हैं, वहीं मुख्यमंत्री के भतीजे के लोकसभा क्षेत्र में फाल्टा और डायमंड हार्बर विधानसभा क्षेत्रों में सिर्फ़ 13,000 से 17,000 नाम हटाए गए। इससे पता चलता है कि मरे हुए और नकली वोटरों को मतदाता सूची में बने रहने देने के लिए एक समझौता किया गया है, जिससे असली नागरिकों को वोट देने से रोका जा सके, और चुनाव आयोग कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। फाल्टा में, तृणमूल ने फ़ॉर्म जमा करने पर एकाधिकार कर लिया, जिसके चलते विपक्षी बीएलए की मौजूदगी को रोका गया और मनमाने ढंग से सूची में बदलाव किया गया और लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाया गया।

हमने शुरू से ही कहा है कि हम मतदाता सूची में बदलाव के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम उस तरीके के खिलाफ हैं, जिससे एसआईआर किया जा रहा है। यह हमारी पार्टी के पोलिट ब्यूरो के बयान में बताया गया है और यह हमारी राज्य समिति के बयान में भी है। हम उस तरीके का विरोध करते हैं, जिसे चुनाव आयोग एसआईआर के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, क्योंकि अगर वे किसी ऐसे संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं, जो उनके पास नहीं है, तो यह खतरनाक है। वे ‘कर्तव्यों के पृथक्करण’ के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं, जो ‘शक्तियों के पृथक्करण’ से पैदा होता है, जो हमारे संविधान की एक खास बात है।

चुनाव आयुक्त ने कहा, ‘मैं उन लोगों को हटा दूंगा, जो नागरिक नहीं हैं।’ आप उन्हें हटाने वाले कौन होते हैं? आप उन्हें पहचानने वाले कौन होते हैं? अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई जज राष्ट्रपति का काम करने लगे, या राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का काम करने लगे, या प्रधानमंत्री, चुनाव आयुक्त का काम करने लगे, तो क्या होगा?

सच्चाई से परे की राजनीति

एक और बात चल रही है। सिर्फ़ आज नहीं, बल्कि काफ़ी समय से। कहा जा रहा है कि कोलकाता और पश्चिम बंगाल के कई दूसरे हिस्सों में बंगालियों का एक बड़ा तबका नहीं चाहता कि भाजपा इस राज्य में सत्ता में आए। जब उनसे पूछा जाता है, ‘क्या इसका यह मतलब नहीं है कि तृणमूल का राज अच्छा है?’ तो वे जवाब देते हैं, ‘नहीं, बिल्कुल नहीं। हम भी यह मौजूदा हालात नहीं चाहते, लेकिन हम क्या कर सकते हैं? भाजपा को रोकने के लिए, हमें तृणमूल को वोट देना होगा।’

इसे ‘कम बुराई’ के सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। कहा जा रहा है कि अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, लूटपाट, आरजी कार में प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या, शिक्षक भर्ती में बहुत बड़ा घोटाला, एक के बाद एक मंत्रियों का जेल जाना, और अलग-अलग इलाकों में सांप्रदायिक झगड़े आदि सब कुछ होने के बावजूद —लोगों को अब भी लगता है कि वामपंथ को वोट देना बेकार है, क्योंकि वे कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे।

यह बहस, या जिसे तकनीकी शब्दों में ‘आख्यान’ कहा जाता है, मीडिया की बनाई हुई है। जैसे, जब वामपंथ और कांग्रेस ने 2016 का चुनाव साथ-साथ लड़ा था, और 66 सीटें जीती थीं, तो भाजपा सिर्फ़ तीन सीटें ही जीत पाई थी। फिर भी, मीडिया में लगातार प्रचार होता रहा, और यह सोच बनाई गई कि भाजपा ही मुख्य ताकत है, कि 66 का नंबर किसी तरह तीन से ‘कम’ है —यह झूठ दुनिया भर में फैलाया गया है। आज के राजनीतिज्ञों और राजनीतिक विज्ञानियों ने इसे ‘सच्चाई से परे’ (‘पोस्ट-ट्रुथ’) नाम दिया है। दूसरे शब्दों में, यह एक तथाकथित सच को बनाना है, जहाँ असली सच का कोई वजूद नहीं है। इस तरह ‘लेसर ईविल’ थ्योरी बनाई गई।

क्या इस बेतुके दावे का कोई आधार है कि भाजपा को तृणमूल को रोक देगी, जबकि वामपंथ या सीपीआई(एम) नहीं रोक पाएगी? असल में, भाजपा की ज़बरदस्त बढ़त और चुनावी सफलता ज़्यादातर टीएमसी के सत्ता में रहने के दौरान ही हुई है। 34 साल तक वामपंथी मोर्चे के राज में, भाजपा ने बहुत कम बढ़त बनाई, शायद ही कभी उसने एकाध पंचायत जीती हो।

इसके अलावा, राज्य में भाजपा के नेतृत्व में, जिसमें मौजूदा विपक्ष के नेता भी शामिल हैं, ज़्यादातर पुराने तृणमूल सदस्य हैं। इससे पता चलता है कि राज्य भाजपा असल में टीएमसी का “ओल्ड बॉयज़ क्लब” है।

इसलिए, लोगों के मन में यह अविश्वास पैदा किया गया है ; यह अपने आप नहीं आया। कहानी बनाई गई है। एक सोच बनाई गई है। क्या इस बनाई गई सोच में कोई सच्चाई है कि भाजपा को तृणमूल रोक सकती है? असल में, हमने देखा है कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और “औपचारिक” विपक्ष भाजपा मिलकर “प्रतिस्पर्धात्मक सांप्रदायिकता” में शामिल होकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में सांप्रदायिक माहौल को बढ़ा रहे हैं।

आई-पीएसी ऑफिस की छापामारी से जुड़ी घटनाओं से पता चलता है कि तृणमूल कांग्रेस द्वारा चुनाव प्रक्रिया का कॉरपोरेटीकरण करके राजनैतिक माहौल को पूरी तरह से बदल दिया गया है। यह एक चौंकाने वाली बात है कि एक बड़ी राजनैतिक पार्टी को एक कंपनी प्रबंधित कर रही है। कंपनियाँ व्यवसाय के लिए होती हैं — व्यापार, उद्योग और कारखाने चलाने के लिए — राजनैतिक दलों को चलाने के लिए नहीं। जब कोई कंपनी राजनीति पर नियंत्रण कर लेती है, तो राजनीतिक प्रक्रिया ज़रूर एक व्यावसायिक धंधे में बदल जाती है। पश्चिम बंगाल में ठीक यही हो रहा है।

इन बड़े दिखने वाले बदलावों की वजह व्यवसायीकरण है, यह साफ़ है। अब हम देखते हैं कि स्थानीय निकाय पार्षद, जो कभी गरीबी में रहते थे, अचानक कई लग्ज़री कारें और कई अपार्टमेंट ले रहे हैं। पैसे का यह तेज़ी से जमा होना राजनीति के व्यावसायीकरण का सीधा नतीजा है।

इसके अलावा, इस बदलाव का एक बड़ा नुकसान मुख्यधारा की मीडिया की आज़ादी को हुआ है, जिससे खतरनाक हद तक समझौता हुआ है। प्रेस की आज़ादी में भारत की अभी की वैश्विक रैंकिंग 154वीं है, जो इस संकट का एक साफ़ संकेत है। किसी पत्रकार के लिए बिना डरे अपनी बात कहना लगभग नामुमकिन है। पत्रकार अक्सर हम वामपंथियों के पास आते हैं, कुछ खास बातें पूछते हैं, इस उम्मीद में कि ‘कोई बात निकल जाएगी’, जिससे यह पक्का होता है कि वे कठोर संपादकीय निर्देशों के तहत काम कर रहे हैं। अलग राय रखने वाली आवाज़ों को दबाने और मिटाने के लिए पूरी तरह से ‘ब्लैकआउट’ है। ऐसे ज़माने में जहाँ लोग जानकारी के लिए टेलीविज़न, अखबारों, स्थानीय नेटवर्क और सोशल मीडिया पर निर्भर हैं, इन चैनलों को नियंत्रित करने का मतलब है कि लोगों तक सच पहुंचने नहीं दिया जा रहा है।

सोचिए कि आज सोशल मीडिया को कैसे नियंत्रित किया जा रहा है। भारत में फेसबुक की पूर्व शीर्ष नीति-निर्धारक ऑफिसर अंखी दास से जुड़ा विवाद एक अहम मामला है। उन पर यह आरोप लगने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था कि उन्होंने अपनी टीम को भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं के पोस्ट पर हेट स्पीच के नियम लागू न करने का निर्देश दिया था। यह ध्यान देने वाली बात है कि उनके ससुर टीएमसी के पूर्व मंत्री थे। उन्होंने ही फेसबुक के प्रमोशन और मोदी को सत्ता में लाने में भूमिका को प्रबंधित किया था।

अभी फेसबुक पर हमारे पोस्ट की पहुंच इस प्लेटफ़ॉर्म के एल्गोरिदम से तय होती है, जो ज़्यादातर उपयोगकर्ता को रोकता है। लेकिन, जो लोग लाखों डॉलर खर्च करने को तैयार हैं, यह प्लेटफ़ॉर्म उन्हें सक्रिय रूप से प्रमोट करता है। इसी तरह, अगर हम भी मीडिया पर भारी रकम खर्च कर पाते, जैसा कि टीएमसी और भाजपा करती हैं, तो हम भी उनका ध्यान आकर्षित कर पाते।

जब पूछा जाता है कि क्या हम सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो जवाब है कि हम ज़रूर कर रहे हैं। बहुत से लोग कहते हैं कि हम सिर्फ़ सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं और सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं। सच तो यह है कि हम दोनों जगहों पर मौजूद हैं। हम ‘नेट’ पर हैं और हम ‘पैरों’ पर हैं — हम ऑनलाइन सक्रिय हैं और हम ज़मीन पर मार्च कर रहे हैं।

वामपंथ की जरूरत किसको है?

विधानसभा से वामपंथ की गैर-मौजूदगी पर बार-बार ज़ोर देना एक सोची-समझी रणनीति है। यह सिर्फ़ संसदीय राजनीति का सवाल नहीं है, न ही यह किसी फुटबॉल टीम के लंबे समय तक ट्रॉफी न जीतने जैसा है। असली सवाल यह है कि विधानसभा से वामपंथ की गैर-मौजूदगी से क्या आम आदमी को फ़ायदा हुआ है? इस नज़रिए से, विधानसभा और संसद दोनों में वामपंथ की मौजूदगी बहुत ज़रूरी है ; नहीं तो, दबे-कुचले लोगों की बात कौन करेगा?

क्या यहां बड़े पैमाने पर निजीकरण – जिसमें कुछ कॉर्पोरेशन या परिवारों द्वारा बैंक, बीमा कंपनियों और कोयला खदानों जैसी राष्ट्रीय संपत्तियों पर कब्ज़ा किया जा रहा है – तब हो पाता, अगर वामपंथ का संसद में अभी भी राजनैतिक दबदबा होता? इसी तरह, पश्चिम बंगाल की अभी की हालत पर गौर करें : बहुत ज़्यादा भ्रष्टाचार, जिसमें पंचायतों से लेकर राज्य सरकार तक लूटपाट में शामिल है और एक के बाद एक मंत्री जेल जा रहे हैं। अगर वामपंथ ने विधानसभा में अपनी मौजूदगी बनाए रखी होती, तो क्या राज्य इस स्तर तक संकट में डूब जाता?

सत्ता में अपने 34 सालों के दौरान, हम मानते हैं कि हमने कई गलतियाँ कीं और कई कमियाँ भी रहीं, जैसा कि कोई बड़ा काम करते समय होता ही है। हम लोगों के सुधारों से निर्देशित हुए है और साथ ही खुद को सुधारने की भी कोशिश की, जिसमें अलग-अलग स्तर पर सफलता मिली। यह प्रक्रिया जनवाद और राजनीति दोनों की तरक्की के लिए ज़रूरी है। अब, जब देश और राज्य अपनी मौजूदा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तो विधानसभा और संसद दोनों से वामपंथ की गैर-मौजूदगी का अर्थ लोगों को साफ़ होता जा रहा है।

इसीलिए हम कहते हैं : हम विधानसभा में भले न हों, लेकिन हम सड़कों पर हैं। फिर भी, आपको मीडिया में सड़कों पर हमारी मौजूदगी की कोई झलक नहीं मिलेगी। आज भी, इतनी रैलियां हो रही हैं, लेकिन आप उन्हें किसी टीवी चैनल पर नहीं देखेंगे। अगर आप कल अखबार खोलेंगे, तो क्या आपको नजीराबाद में जलाकर मारे गए 25 लोगों की रिपोर्ट दिखेगी? उसे छिपाने के लिए, वहां 400 गुंडे और पुलिस बल तैनात है, ताकि कोई अंदर न आ सके। तो, सिर्फ वामपंथ की खबरें ही नहीं दबाई जा रही हैं, कई दूसरी चीजों को ब्लैकआउट और सेंसर किया जा रहा है।

अक्सर कहा जाता है कि वामपंथ के नेतृत्व वाले आंदोलन उतने असरदार नहीं होते, खासकर इसलिए कि वे ध्यान खींचने के लिए काफी “शोर” नहीं मचाते। दूसरे लोग कहते हैं कि क्योंकि वामपंथ ने ‘अभया’ के लिए न्याय के आंदोलन में नेतृत्व नहीं किया, इसलिए ‘अ-राजनीतिक’ होने की आड़ में गतिशीलता खो गई है। बहरहाल, हमारा मानना है कि कोई भी लड़ाई कभी असफल नहीं होती। क्या स्पार्टाकस अपनी लड़ाई हार गया था? ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है, लेकिन स्पार्टाकस ने ही इतिहास लिखा था। यह सिर्फ एक लड़ाई नहीं है, जिसमें हार ही अंत तय करती है ; यह इस राज्य की खोई हुई शान को वापस लाने और इसके अंधेरे को दूर करने के लिए एक लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई है। हम कदम-दर-कदम आगे बढ़ेंगे, और साथ-साथ लोगों को लामबंद करेंगे। राजनीति इन्हीं उतार-चढ़ावों से होकर आगे बढ़ती है।

हमारा 34 साल का राज भारतीय लोकतंत्र और शायद दुनिया के इतिहास में एक अनोखी कामयाबी थी। कम्युनिस्टों को शायद ही कभी शांति से रहने दिया गया हो ; हमारी सरकार को 1957 में ज़बरदस्ती गिराया गया, और फिर 1967 और1969 में गिराया गया। 1971 में, हमें सरकार बनाने से रोका गया। अगर हम सिर्फ़ उन खास पलों को देखें, तो कोई सोच सकता है कि हम असफल हो गए। 1972 और 1977 के बीच, हमारे 1,200 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। अगर आप सिर्फ़ उस समय को देखें, तो आपको लगेगा कि वामपंथ खत्म हो गया है। लेकिन इतिहास अपने नियमों के अनुसार चलता है, सिर्फ़ हमारी इच्छाओं के हिसाब से नहीं। हमने निश्चित रूप से अकेलेपन का सामना किया है — अगर नहीं किया होता, तो हम इतने छोटे कैसे हो गए? लेकिन अंबानी या अडानी जैसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों से वित्त पोषित बड़े मीडिया हाउस, लोगों से दोबारा जुड़ने में हमारी मदद करने के लिए अपना एयर समय या लाइनें खर्च नहीं करेंगे। हमें वह काम खुद करना होगा।

हमारी पार्टी के मुखपत्र गणशक्ति को लोगों की असली समस्याओं को पहचानना चाहिए, और हमारे कार्यकर्ताओं को घर-घर जाना चाहिए। हम अभी पूरे राज्य में 30,000 से 40,000 छोटी बैठकें कर रहे हैं, जिसका लक्ष्य सभी 88,000 बूथों तक पहुंचना है। हमारे कार्यकर्ता सड़कों पर घूम रहे हैं, गांवों में जा रहे हैं, और घरों में बैठकर लोगों को समझा रहे हैं कि टीएमसी और भाजपा में कोई फर्क नहीं है। कल के टीएमसी नेता आज के भाजपा नेता हैं। कुछ को छोड़कर, इस राज्य में भाजपा के लगभग सभी बड़े चेहरे टीएमसी से ही आए हैं। वे एक ही वेयरहाउस की दो अलग-अलग दुकानें हैं। वे एक ही सामान बेचते हैं और जब सुविधा हो, पाला बदल लेते हैं। हम, वामपंथ वाले, एक खास विचारधारा के आधार पर लोगों के लिए लड़ते हैं। जो लोग पहले वामपंथ से भागना चाहते थे, वे मारपीट, जेल और झूठे केस झेल रहे हैं। हम महसूस कर सकते हैं कि अकेलापन खत्म हो रहा है, क्योंकि लोग अब हमें वापस आने और अपने झंडे लहराने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं।

इस राज्य में, कोई भी व्यक्ति दीवार लेखन करने पर या झंडा लगाने के लिए शहीद हो सकता है — यह स्थिति फासीवादी राज्यों से भी बदतर है। ‘दीदी’ और मोदी दोनों मुसोलिनी और हिटलर के आदर्शों पर चलते हैं, उन्हीं के तरीकों से राज्य और देश चलाने की कोशिश करते हैं।

वामपंथी विकल्प

हमारे लिए, वामपंथ सिर्फ़ एक रणनीतिक स्थिति नहीं है ; यह ज़िंदगी का एक दर्शन है और विकल्प की तलाश है। उनका “विकल्प” सिर्फ़ मंदिर या मस्जिद के बीच चुनना है— देवता के गदा के साइज़ पर बहस करना है। हमारा विकल्प किसान की फ़सल की कीमत और उन 14,000 सहकारिताओं को फिर से बनाने पर ध्यान केंद्रित करना है, जिन्हें खत्म कर दिया गया है। हम चाहते हैं कि किसानों को सही दाम मिलें और उपभोक्ताओं को सस्ता चावल और सब्ज़ियाँ मिलें।

हमारे विकल्प का मतलब है उन 8,000 सरकारी स्कूलों को फिर से खोलना, जिन्हें कब्रिस्तान बना दिया गया है और उन्हें एक बार फिर से बच्चों की आवाज़ों से भरना है। इसका मतलब है, मुख्यमंत्री की तस्वीरों या गेटों की पेंटिंग पर करोड़ों रूपये खर्च करने के बजाय स्वास्थ्य सुविधाएं बहाल करना। 8वें और 9वें दशक के आखिर में, हमने बच्चों की मौत की दर कम करने में नेतृत्व किया था, क्योंकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी सांस्थानिक प्रसूति होती थी। अब, फंड होने के बावजूद, प्राथमिक केंद्र खाली हैं ; पैसा सिर्फ़ कोलकाता के बड़े अस्पतालों की पेंटिंग पर खर्च किया जाता है, क्योंकि पेंटिंग और बिल्डिंग में भ्रष्टाचार करने में आसानी होती है। हमारे विकल्प में ईमानदार पंचायतें और नगर पालिकाएं, मेरिट के आधार पर नौकरियां और औद्योगिक कॉरिडोर बनाना शामिल है। वोट पाने के लिए 710 एकड़ ज़मीन पर मंदिर बनाने के बजाय, हम उद्योग-धंधे लगाएंगे, ताकि युवाओं को काम मिल सके।

न तो मोदी और न ही दीदी इन विकल्पों के बारे में बात करते हैं। वे धार्मिक बंटवारे पर ध्यान देते हैं — एक मुस्लिम को टारगेट करता है, तो दूसरा मंदिर से जवाब देता है। क्या सच में कोई व्यक्ति सिर्फ़ मंदिर या मस्जिद के लिए मतदान करता है? हमने देखा है कि धर्म के आधार पर बना पाकिस्तान एक नहीं रह सका और भाषा के आधार पर बांग्लादेश में बंट गया। हमने तय किया है कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष होगा — जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और नास्तिक सब एक साथ रहेंगे। फिर भी उनका ध्यान अब अलग-अलग जातियों, भाषाओं या धर्मों पर हमला करने पर है। प्रधानमंत्री बेरोज़गारों से कहते हैं “पकौड़े तलो,” और मुख्यमंत्री उनसे कहती हैं “चॉप्स तलो।” हमारी कार्यनीति “विकल्प” है। भाजपा और टीएमसी एक-दूसरे के पूरक हैं ; हम असली विकल्प हैं, और यही बात लोगों तक हम पहुंचा रहे हैं।

(लेखक माकपा के केंद्रीय समिति सदस्य और ‘गणशक्ति’ के संपादक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)