दुःख की बात यह है कि लोकतंत्र को दिशा दिखाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग मौन है : इंद्रजीत सिंह

देश में हो रहे अन्याय के विरुद्ध अब हर नागरिक को आवाज़ उठानी होगी : डॉ. बिशंभर नाथ मिश्र

लखनऊ में जमीयत उलमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में आयोजित हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलन में देश की प्रतिष्ठित धार्मिक हस्तियों एवं बुद्धिजीवियों का संबोधन।

लखनऊ,

आज लखनऊ स्थित अटल बिहारी वाजपेयी साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में जमीयत उलमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में आयोजित हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलन को संबोधित करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश के वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि पहले केवल मुसलमान सांप्रदायिक शक्तियों के निशाने पर थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नफ़रत की राजनीति ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि अब मुसलमानों के साथ-साथ इस्लाम भी निशाने पर है। इस नफ़रत की राजनीति ने देश को ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ आगे का रास्ता स्पष्ट दिखाई नहीं देता।

उन्होंने कहा कि इस माहौल को बदलना होगा और इसके लिए समाज के हर स्तर पर गंभीर एवं व्यावहारिक प्रयास करने होंगे। आज का यह सम्मेलन जमीयत उलमा-ए-हिन्द द्वारा एक व्यापक जनआंदोलन के रूप में शुरू की गई मुहिम का पहला चरण है। उन्होंने कहा कि जब तक विभिन्न धर्मों के समान विचार रखने वाले लोगों को एक मंच पर लाकर सांप्रदायिकता और नफ़रत के विरुद्ध संगठित आवाज़ नहीं उठाई जाएगी, तब तक अपेक्षित परिवर्तन संभव नहीं होगा। यह कार्य कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।

मौलाना मदनी ने कहा कि नफ़रत की इन तेज़ आँधियों में जमीयत उलमा-ए-हिन्द मोहब्बत के चिराग़ को जलाने निकली है। इस मुहिम में आप भी शामिल हैं और देश का हर न्यायप्रिय नागरिक भी। उन्होंने कहा कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी विस्फोटक क्यों न हों, हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने चरित्र और कर्म से इस निराशा को आशा में बदलने का प्रयास करना चाहिए।

इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब अंग्रेज़ों का पूरे देश पर कब्जा स्थापित हो गया था, तब उसके विरुद्ध पहली बुलंद आवाज़ दिल्ली के एक मदरसे से उठी थी। यह आवाज़ हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी की थी। उन्होंने उस समय घोषणा की थी कि देश गुलाम हो चुका है, इसलिए अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष करना प्रत्येक मुसलमान और भारतीय नागरिक का कर्तव्य है। इस घोषणा के कारण उन पर अत्याचारों के पहाड़ तोड़े गए, उनके मदरसे को ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन अंग्रेज़ उनकी आवाज़ को दबा नहीं सके। उसी का परिणाम 1832 और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सामने आया, जिसमें हजारों उलेमा ने अपने प्राणों की कुरबानी दी। किन्तु संघर्ष में सफल नहीं हुए, लेकिन धीरे-धीरे उनकी आवाज़ में लाखों लोग शामिल होते गए और अंततः अंग्रेज़ों को भारत छोड़कर जाना पड़ा।

मौलाना मदनी ने कहा कि आज इस सम्मेलन से सांप्रदायिकता और नफ़रत के विरुद्ध जो आवाज़ उठी है, उसे भी कोई शक्ति दबा नहीं सकती और न ही कमजोर कर सकती है। एक दिन ऐसा आएगा जब इस आवाज़ में करोड़ों लोगों की आवाज़ शामिल होगी और देश से नफ़रत तथा सांप्रदायिकता का अंत होगा।

उन्होंने एक बार फिर स्पष्ट किया कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द एक धार्मिक संगठन है और उसका राजनीति से कोई संबंध नहीं है। जमीयत उलमा-ए-हिन्द अपने नेतृत्व में न चुनाव लड़ती और न किसी को लड़ाती हैं। हमारा उद्देश्य केवल देश में भाईचारे, एकता और सद्भाव का संदेश देना है। हम अपने देशवासियों को यह समझाना चाहते हैं कि नफ़रत केवल विनाश और बर्बादी लाती है, जिसका दृश्य आज पूरा देश देख रहा है।

उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच प्रेम, विश्वास और भाईचारे का पुल बनाने का कार्य किया है। हमारे बुज़ुर्गों ने जिस मार्गदर्शन के साथ इस संस्था की नींव रखी थी, आज भी हम उसी पर पूरी निष्ठा के साथ चल रहे हैं। जमीयत उलमा-ए-हिन्द का प्रत्येक कार्य धर्म से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के आधार पर होता है।

इस संदर्भ में उन्होंने केरल और पंजाब में आई बाढ़ का उल्लेख करते हुए बताया कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द और उसके कार्यकर्ताओं ने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के पीड़ितों की सहायता की। केरल में बाढ़ से नष्ट हुए अनेक मकानों का पुनर्निर्माण कराया गया और किसी व्यक्ति का धर्म नहीं देखा गया।

उन्होंने असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के दौरान लगभग 40 लाख महिलाओं की नागरिकता पर मंडरा रहे संकट का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इनमें लगभग 25 लाख गैर-मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। जमीयत उलमा-ए-हिन्द ने इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में मजबूती से लड़ा और सफलता प्राप्त की, जिसके परिणामस्वरूप 40 लाख महिलाओं की नागरिकता सुरक्षित हो सकी।

मौलाना मदनी ने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद सभी को साथ लेकर चलती है और हिंदू-मुस्लिम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती। हमारे धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हम सब एक हैं। यदि देश से नफ़रत समाप्त करनी है तो इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ना होगा।

दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लगातार हो रहे पेपर लीक ने लाखों युवाओं के भविष्य को बर्बाद कर दिया है। ऐसा नहीं होना चाहिए। अब समय आ गया है कि ऐसी कमजोर व्यवस्था को बदला जाए, जो पेपर लीक तक नहीं रोक सकती।

रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को लेकर चल रहे विवाद पर टिप्पणी करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि बिना नक्शा स्वीकृत कराए भवन का निर्माण कराना निश्चित रूप से नियमों का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि पूरी इमारत को ही मलबे में तब्दील कर दिया जाए। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय पर जुर्माना लगाया जा सकता है या कानून के अनुरूप अन्य कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यदि विश्वविद्यालय को ध्वस्त किया गया तो वहाँ पढ़ने वाले हजारों छात्रों का भविष्य अंधकार में चला जायेगा।

मौलाना मदनी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी नौबत इसलिए आई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार नफ़रत की राजनीति की जा रही है और एक विशेष समुदाय को अपराधी की तरह कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। अब स्थिति यह है कि यदि वह समुदाय कोई अच्छा कार्य भी करता है, तब भी कुछ लोगों को वह गलत ही दिखाई देता है।

सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वाराणसी के संकट मोचन हनुमान मंदिर के महंत डॉ. बिशंभर नाथ मिश्र ने कहा कि देश की आज़ादी में सभी का खून शामिल है और इस मिट्टी में सबका लहू रचा-बसा है, जिसे कभी अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आज ऐसे हालात इसलिए बने हैं क्योंकि लोगों ने सच बोलना छोड़ दिया है। हर व्यक्ति इस इंतज़ार में रहता है कि कोई दूसरा आवाज़ उठाए। इस तरह देश नहीं चल सकता। अब देश में हो रहे अन्याय के विरुद्ध सभी को खुलकर बोलना होगा। उन्होंने कहा कि मौलाना अरशद मदनी ने जो मुहिम शुरू की है, हम उसका पूर्ण समर्थन करते हैं और जहाँ भी हमारी आवश्यकता होगी, हम उनके साथ खड़े रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने कहा कि आज का यह सम्मेलन देश में एकता, सद्भाव और भाईचारे का सशक्त संदेश देता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं तथा किसी के साथ भेदभाव न करने की स्पष्ट व्यवस्था की है। उन्होंने कहा कि संविधान की ही बदौलत उन्हें सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने का अवसर मिला।

उन्होंने कहा कि देश के वर्तमान हालात देखकर उन्हें अक्सर चिंता होती थी कि हमारे देश का भविष्य क्या होगा, लेकिन आज इस सम्मेलन में सभी धर्मों के लोगों की सहभागिता देखकर उन्हें विश्वास हो गया है कि इस देश को कोई तोड़ नहीं सकता। मौलाना अरशद मदनी ने देश को जोड़ने का जो महान कार्य शुरू किया है, उसमें हम सबको उनका साथ देना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र को दिशा दिखाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग आज मौन है। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है।

इस अभियान के संयोजक एवं जमीयत उलमा-ए-हिन्द के उपाध्यक्ष मौलाना असजद मदनी ने सम्मेलन का घोषणा-पत्र पढ़कर सुनाया, जिसका उपस्थित सभी लोगों ने हाथ उठाकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश से सांप्रदायिकता, नफ़रत और आपसी दूरियों को समाप्त कर भारत की प्राचीन साझा संस्कृति, प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारे की परंपरा को पुनः सशक्त बनाना है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अभियान पूरी तरह गैर-राजनीतिक है और इसका उद्देश्य केवल विभिन्न धर्मों, समुदायों तथा सामाजिक वर्गों के बीच विश्वास, सम्मान और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना है।

उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें उलेमा, धार्मिक नेता, बुद्धिजीवी, विधि विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा, महिलाएँ तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रभावशाली लोग भाग लेंगे, ताकि देश में प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का वातावरण और अधिक मजबूत हो सके।

मौलाना असजद मदनी ने अंत में सभी उपस्थित लोगों से अपील की कि वे इस प्रेम और सद्भाव के संदेश को अपने घरों, मोहल्लों, शिक्षण संस्थानों, पूजा स्थलों और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाएँ, ताकि हमारा देश नफ़रत के बजाय प्रेम, मतभेद के बजाय परस्पर सम्मान और विभाजन के बजाय एकता के मार्ग पर आगे बढ़ सके।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिन्द प्रांतीय अध्यक्ष मौलाना अशहद रशीदी ने सम्मेलन में उपस्थित सभी समुदाय के विशिष्ट अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने कहा कि आज का यह विशाल सम्मेलन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि प्रेम, भाईचारा, राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक सम्मान का संदेश लोगों के दिलों को जोड़ने की सबसे बड़ी शक्ति है।

उन्होंने सम्मेलन में पधारे सभी सम्मानित अतिथियों, बुद्धिजीवियों, धार्मिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े गणमान्य लोगों का हृदय से स्वागत करते हुए कहा कि यह एकता किसी राजनीतिक आवश्यकता या अस्थायी स्वार्थ पर आधारित नहीं है, बल्कि भारत की साझा संस्कृति, सदियों पुराने भाईचारे और मानवता के साझा मूल्यों पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि आज विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों से जुड़े लोगों का एक ही मंच पर एकत्र होना इस बात का प्रमाण है कि प्रेम की आवाज़, नफ़रत की हर आवाज़ से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है।

सम्मेलन को बौद्ध, ईसाई तथा सिख धर्म के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भी संबोधित किया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि मौलाना अरशद मदनी द्वारा शुरू की गई यह मुहिम समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और वे सभी इस अभियान में उनके साथ हैं।