उत्तर प्रदेश

बाराबंकी: क्या छोटे लाल बेजीपी के लिए कारगर होंगे?

फहीम सिद्दीक़ी
प्रदेश सरकार के दर्जा प्राप्त मंत्री और समाजवादी पार्टी के संस्थापक नेता छोटे लाल यादव के सियासी सफर की शुरुआत बेनी प्रसाद वर्मा ने 1991 में उन्हें जनता पार्टी से नवाबगंज विधानसभा से टिकट देकर कराइ थी। इससे पूर्व छोटे लाल यादव देवां ब्लॉक प्रमुख रह चुके थे। पेशे से वह बाराबंकी सिविल कोर्ट के वकील सय्यद मक़ासिद हुसैन रिज़वी जो खुद भी सोशलिस्ट आंदोलन से जुड़े थे के मुंशी थे। 1991 का चुनाव जीत कर छोटे लाल यादव अचानक अपनी बिरादरी यादव के सिर्फ इसलिए चहीते बन गए कि उन्होंने एक कुर्मी को हराया था। कुर्मी और यादव के बीच उस समय भी बड़ी दूरी रहती थी। फिर अगला विधानसभा चुनाव 1993 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर छोटे लाल यादव ने जीत हासिल कर जिले की सियासत में अपना क़द काफी बढ़ा लिया। मगर 1996 का विधानसभा चुनाव वह कांग्रेसी उम्मीदवार संग्राम सिंह से हार गए। 2002 का चुनाव जब आया तो नवाबगंज विधानसभा से उनका टिकट उस समय पार्टी में मुलायम सिंह के दाएं हाथ बेनी प्रसाद वर्मा ने काट कर राम सेवक यादव के भतीजे विकास यादव नाम के एक युवा को दे दिया। छोटे लाल और बेनी के बीच इस बात को लेकर अनबन हो गई। यह वह समय था जब समाजवादी पार्टी में अमर सिंह दाखिल होकर मुलायम सिंह के काफी करीब हो चुके थे और उनके बेहद करीबी अरविंद सिंह गोप जिले में उनका प्रतिनिधित्व कर रहे थे। आखिरकार अमर सिंह,अरविंद सिंह गोप और राम सागर रावत की सिफारिश पर नेता जी मुलायम सिंह यादव ने छोटे लाल को फिर टिकट दे दिया। चुनाव में मुकाबला बहुत कांटे का रहा और छोटे लाल यादव ने 27 वोटों से अपने निकटतम उम्मीदवार संग्राम सिंह से जो बीजेपी उम्मीदवार थे को हरा कर जीत गए।

जब 2012 में छोटे लाल यादव जो 2007 का चुनाव पार्टी को जिता न सके थे का टिकट काट कर बहुजन समाज पार्टी के ब्लॉक प्रमुख के पति सुरेश यादव को दे दिया गया तो छोटे लाल यादव के बेनी प्रसाद वर्मा ने न सिर्फ आंसू पोछे बल्कि उन्हें नवाबगंज से कांग्रेस का उम्मीदवार भी बनाया। मगर हार ने छोटे लाल यादव का पीछा न छोड़ा और वह थक कर घर बैठ गए। जब शिवपाल यादव के रिश्ते अखिलेश यादव से बिगड़े तो 2017 में वह प्रगतिशील समाज पार्टी में जा पहुंचे मगर दो साल के अंदर ही वह 2019 में पार्टी बदल कर फिर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और अब चुनावी मौके पर उन्होंने 10 साल में चौथी बार पार्टी बदल कर बीजेपी का दामन थाम लिया। मगर बेजीपी के लिए वह कितना फायदेमंद साबित होंगे यह देखने वाली बात होगी। हालांकि उनकी बिरादरी को यह यकीन नहीं था कि वह बीजेपी में चले जायेंगे। अब जज़्बाती क़ौम यादव बिरादरी की तरफ से इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी यह तो समय ही बताएगा।

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