दिल्ली:
छत्तीसगढ़ में बीजेपी की साइलेंट कैंपेन ने कमाल कर दिया है. छत्तीसगढ़ के नतीजे इसलिए भी अप्रत्याशित बताए जा रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस को यहां पर मजबूत माना जा रहा था और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के चुनावी कैंपेन के आगे बीजेपी बौनी दिख रही थी, लेकिन बीजेपी ने कमबैक किया और पांच सालों की भूपेश बघेल सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

रुझानों में 90 सीटों की विधानसभा में 50 से अधिक सीटों पर बीजेपी लगातार बढ़त बनाए हुए है. इन रुझान ने कांग्रेस पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तो सत्ता से बाहर हो ही रहे हैं, साथ ही सरकार के कई मंत्री चुनाव हार रहे हैं. इनमें ताम्रध्वज साहू, मोहन मरकाम, कवासी लखमा, मोहम्मद अकबर, अमरजीत भगत, रुद्र गुरू, अनिल भेड़िया शामिल हैं, जबकि सीएम भूपेश बघेल और डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव मामूली बढ़त बनाए हुए हैं.

छत्तीसगढ़ का चुनाव बीजेपी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था, क्योंकि यहां पर बघेल सरकार के खिलाफ कोई भी नाराजगी नहीं दिख रही थी. शुरुआत में बीजेपी के पास मुद्दों की भी कमी दिखी, लेकिन बाकी प्रदेशों की तरह ही बीजेपी ने भी अपना ट्रंप कार्ड यहां चला. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का फैसला किया गया. इसके बाद पीएम मोदी ने छत्तीसगढ़ में आक्रामक कैंपेन की शुरुआत की.

छत्तीसगढ़ के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा महादेव ऐप का, जिसको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले उठाया. पीएम मोदी ने भी कहा था कि कांग्रेस ने भगवान शिव के नाम महादेव को भी नहीं छोड़ा.उसके बाद पूरी बीजेपी इस मुद्दे को उठाने लगी. बीजेपी ने पूरा चुनाव कैंपेन महादेव ऐप पर ही रखा, जिसको लेकर सीएम भूपेश बघेल कई बार असहज भी हुए. हालांकि वह हमेशा कहते रहे कि मेरा कोई लेना-देना नहीं है. बावजूद इसके बीजेपी माहौल बनाने में कामयाब रही.

छत्तीसगढ़ की सत्ता में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस के हाथ में कई मुद्दे थे. खासतौर पर गाय, गोबर और गौमूत्र का. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गौपालकों से गोबर खरीदना शुरू किया था. बाद में गौमूत्र भी खरीदना शुरू कर दिया गया था. दावा किया जा रहा था कि गोबर और गौमूत्र को खरीदने के कारण महिलाओं को वोट कांग्रेस को जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस को 2018 में जीती हुई आधी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है.

छत्तीसगढ़ में हिंदुओं की आबादी 96 फीसदी है. यही वजह है कि भूपेश बघेल ने सॉफ्ट हिंदुत्व का रास्ता चुना हुआ था. बीजेपी ने राम मंदिर का मुद्दा उठा रही थी तो भूपेश बघेल भी राम के भरोसे पर अपनी नैया पार कराने की जुगत में थे. भूपेश बघेल ने राम के वनवास काल से जुड़े स्थलों को दुनिया के पर्यटन मैप पर लाने की महात्वाकांक्षी योजना शुरू की थी. राम के साथ भूपेश बघेल कृष्ण की भी शरण में गए थे. उन्होंने कृष्ण कुंज योजना की शुरूआत की थी.

राम और कृष्ण को लेकर भूपेश बघेल का सॉप्ट हिंदुत्व, बीजेपी के हार्ड हिंदुत्व के आगे टिक नहीं पाया. चुनाव के दौरान बीजेपी ने राम मंदिर का मुद्दा उठाया और चुनाव में जीत के बाद राम मंदिर दर्शन कराने का वादा किया था. नतीजों से साफ है कि छत्तीसगढ़ के लोगों को बीजेपी का हार्ड हिंदुत्व ज्यादा पसंद आया. भूपेश बघेल सरकार सिर्फ हिंदुत्व के मुद्दे पर फेल नहीं हुई. हिंदुत्व के अलावा ओपीएस के मुद्दे पर भी कांग्रेस को पटखनी मिली.

दरअसल, पुरानी पेंशन स्कीम को छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार गेमचेंजर मान रही थी, लेकिन नतीजों ने बता दिया कि कर्मचारियों के बीच पुरानी पेंशन स्कीम की चर्चा भी नहीं रही. सिर्फ छत्तीसगढ़ नहीं, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी जिस ओपीएस को कांग्रेस तुरुप का इक्का मान रही थी, वह फेल साबित हुआ है.

छत्तीसगढ़ के चुनाव में कांग्रेस की ओर से कई रैलियां की गई. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने बैक टू बैक कई रैली की थी. इससे उलट बीजेपी को चमत्कार की उम्मीद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अपने बूथ प्रबंधन पर थी. बीजेपी की ओर से पीएम नरेंद्र मोदी ने आक्रामक कैंपेन किया ही… साथ में कार्यकर्ताओं ने जमीन पर भूपेश बघेल सरकार के खिलाफ माहौल बनाया.

बीजेपी का पूरा फोकस शहरी इलाकों के साथ ही आदिवासी इलाकों पर था. 2018 में आदिवासियों ने कांग्रेस को एकतरफा वोट किया था, लेकिन पिछले कई साल से आदिवासियों का एक बड़ा तबका कांग्रेस सरकार से नाराज चल रहा था. बीजेपी ने इन्हीं आदिवासियों तक अपनी पहुंच बनाई और मोदी सरकार के काम को लेकर गए. साथ ही आदिवासियों को बघेल सरकार की नाकामियों को भी पहुंचाया.