सूखाग्रस्त बुन्देलखण्ड में पानी की बर्बादी रोकने के लिए खेलें सूखी होली: संजय सिंह

सूखाग्रस्त बुन्देलखण्ड में पानी की बर्बादी रोकने के लिए खेलें सूखी होली: संजय सिंह

भारत के कई राज्य सूखे और जल संकट के प्रभाव से जूझ रहे हैं। वर्तमान में भू-गर्भीय जल लगातार नीचे जा रहा है। जिसका प्रभाव समाज के बड़े हिस्से के ऊपर पड़ रहा है। जल संकट के सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में बुन्देलखण्ड देश का एक प्रमुख क्षेत्र हो गया है। बुन्दलेखण्ड की भौगोलिक परिस्थिति भी देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा भिन्न है। बुन्देलखण्ड का एक बहुत बड़ा भू-भाग पठारी, बीहड़ और असमतल है। ऐसे क्षेत्र में वर्षा की सामान्य स्थिति ही आवश्यक है किन्तु कई वर्षों से इस इलाके में वर्षा की उपलब्धता निरन्तर असामान्य है। बुन्देलखण्ड की औसत वर्षा 850 मिमी0 से 950 मिमी0 है। पिछले कई वर्षों में यह घटकर 450-550 मिमी0 रह गयी है। इस वर्ष तो मात्र 300 मिमी0 से भी कम वर्षा हुयी। अनियमित वर्षा के कारण इस क्षेत्र में लगातार सूखे की स्थिति भयावह होती जा रही है। बुन्देलखण्ड में 554 से अधिक छोटी और बरसाती नदियां सूख गयी हैं। 46 में से 23 विकास खण्ड जल संकट ग्रस्त हो गए हैं। जिसके पीछे प्रमुख कारण यहां वर्षा के दिनों में आयी कमी है। बुन्देलखण्ड में सामान्य परिस्थियों में 52-54 दिन बारिश होती थी। अब मात्र 21-22 दिन रह गयी है। वर्षा की प्रवृत्ति बदल गयी है। कई बार एक ही समय में अधिक वर्षा हो रही है और कई बार लम्बे समय तक बरसात नहीं हो रही है। वर्ष 2002 से 2016 तक यदि देखें तो मात्र 2 वर्ष 2008 एवं 2009 ऐसे हैं जिनमें जून में बरसात हुयी है। सामान्यतः जून में बारिश होना बुन्देलखण्ड में बन्द हो गया है। वहीं सितम्बर माह के पहले सप्ताह में ही मानसून इस इलाके से चला जा रहा है। वर्षा के अनियोजित चक्र औैर जल संरक्षण के आवश्यक उपाय न हो पाने के कारण बुन्देलखण्ड भीषण जल संकट की तरफ बढ़ रहा है। इस वर्ष 2015-16 में अक्टूबर के बाद से अब तक बुन्देलखण्ड के अधिकांश इलाकों में 4-6 मीटर जल स्तर नीचे चला गया है और जिस तेजी से जल स्तर नीचे से जा रहा है उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि मई के महीने में बुन्देलखण्ड के अधिकांश इलाकों में गम्भीर पेयजल संकट उत्पन्न होगा। वर्तमान में प्रथम सतह के अधिकांश हैण्डपम्प बन्द हो गए हैं। दूसरी सतह के हैण्डपम्पों से पानी देने में कमी आ गयी है। तीसरी सतह के ऊपर निर्भरता बढ़ रही है। तीसरी सतह का पानी अधिकांशतः ट्यूबवेलों के माध्यम से सिंचाई के लिए निकाला जा रहा है। कृषि में भू-गर्भीय जल का उपयोग जितना बढ़ेगा उतना ही पेयजल संकट बढ़ेगा। बुन्देलखण्ड में वर्तमान में 38 प्रतिशत घरों को स्वच्छ पानी नहीं मिल रहा है। महिलाओं का पानी भरने में अधिक समय लग रहा है। जिसके कारण उन पर कार्य बोझ बढ़ रहा है। 40 प्रतिशत हैण्डपम्प ने पानी देना बन्द कर दिया है। बुन्देलखण्ड को जल संकट से बचाने के लिए विश्व जल दिवस के अवसर पर हम सभी से अपील करते हैं कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में विशेषतौर से जनपद जालौन में मैंथा की खेती को इस वर्ष बढ़ावा न दिया जाए वरना आने वाले समय में जल संकट और अधिक गहरा होगा और इस वर्ष बुन्देलखण्ड के सभी गांवों और शहरों में लोग सूखी होली खेलें जिससे पानी की बर्बादी रुके। बुन्देलखण्ड में हो रहे नदियों से खनन के कारण भी यहां जल संकट गहरा हो रहा है, विशेष तौर से इस नदियों के किनारे के गांवों में पानी बहुत तेजी से नीचे जा रहा है। पानी की अनुपलब्धता का असर समाज के कमजोर और निर्धनतम लोगों के ऊपर अधिक पड़ रहा है। बुन्देलखण्ड के कई गांवों में लोग पानी की अनुपब्धता के कारण पलायन करने को बेबस हैं। जिसमें सरीला विकास खण्ड के बरगंवा, जलालपुर, धमना एवं ममना, तालबेहट वि0ख0 के मोटो, कड़ेसरा कला, चन्द्रपुर, सरखरी, विजयपुरा, झांसी के बबीना वि0ख0 में सुपवा, नयाखेरा एवं ललहरठाकुरपुरा, जालौन के गीदन की खोड़, असहना, मचकच्छा कदौरा विकास खण्ड के थुरट, भरसूड़ा, परेछा अत्यधिक प्रभावित गांव है।

बुन्देलखण्ड जैसे अभावग्रस्त इलाके में परमार्थ समाज सेवी संस्थान ने समाज के साथ मिलकर एक सैंकड़ा से अधिक गांवों को पानीदार बनाने का कार्य जल सहेलियों और पानी पंचायत के सहयोग से किया है जिसमें प्रमुख रुप से चन्देलकालीन तालाबों का पुनरुद्धार, नए तालाबों का निर्माण, जल संचयन संरचनाएं, चैकडेम, कच्चे अवरोध बांधों का निर्माण किया हैं। बुन्देलखण्ड के लोगों को पानीदार बनाने की मुहिम लगातार आगे बढ़ रही है। परमार्थ के सचिव और जल-जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय सचिव संजय सिंह का कहना है कि वर्ष 2030 तक बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए बुन्देलखण्ड के प्रत्येक गांव को पानीदार बनाने का कार्य किया जाएगा जिसमें यहां के परम्परागत जल संरक्षण के ज्ञान को विशेष महत्व दिया जाएगा। साथ ही जल संरक्षण की पुरानी संचनाओं को पुर्नजीवित करने के लिए सरकार और समाज एक साथ कार्य करें। जिसका उदाहरण ललितपुर के चन्द्रापुर, मोटो, हमीरपुर के धरऊपुर, ममना एवं जालौन के दौलतपुरा, रेवा, रगोली एवं सरसोखी गांव है।

Uttar Pradesh, India