सुन्नी ओलेमाओं का आतंकवाद के खिलाफ खुला फतवा

सुन्नी ओलेमाओं का आतंकवाद के खिलाफ खुला फतवा

वक़्फ़ बोर्डों और हज कमेटियों से वहाबी क़ब्ज़े हटाने और अल्पसंख्यक पदों पर सूफ़ियों को ज़िम्मेदारी देने की मांग 

कार्यालय संवाददाता

नई दिल्ली। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा देखा गया कि उलामा ने पहले आम सम्मेलन में लोगों की राय ली और फिर मशविरा कर आंतकवाद के विरुद्ध क़ुरआन के निर्देशानुसार 'खुला फ़तवा' जारी किया हो। यह इतिहास आज दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में ऑल इंडिया तंज़ीम उलामा ए इस्लाम ने रचा। संगठन को देश के सैकड़ों उलामा, सज्जादानशीनो, दरगाह प्रमुख, ख़ानक़ाहों, मदरसों और इस्लामी शैक्षणिक संस्थाओं का समर्थन प्राप्त है। 

सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए आए सूफ़ी मत के लोग यह समझने का प्रयास करना चाहते हैं कि यदि इस्लाम और सूफ़ीवाद आतंकवाद को समाप्त कर शांति की स्थापना पर ज़ोर देते हैं तो यह कौन लोग हैं जो इस्लाम का नाम लेकर आम लोगों की हत्या करते हैं और आतंकवाद फ़ैलाते हैं। लोगों को क़ुरआन और पैग़म्बर मुहम्मद साहब के कथनों यानी हदीस के हवाले देकर समझाया गया कि इस्लाम के नाम पर हो रहे आतंकवाद का संबंध दरअसल ष्वहाबी विचारधाराष् से है जो कुछ कुत्सित लोगों और भ्रष्टाचारियों की हित पूर्ति के लिए खड़ी की गई है।

सम्मेलन की आवश्यकता

तंज़ीम के महासचिव मौलाना शाहबुद्दीन रजवी ने बताया कि ऑल इंडिया तंज़ीम उलामा ए इस्लाम के क़रीब 10 लाख सदस्य हैं जो पारम्परिक सूचना संसाधनों से ही जानकारी जुटाते हैं। तंज़ीम के पास पिछले कई दिनों से इस बात के लिए लोग जानकारी जुटाना चाह रहे थे कि ख़तरनाक आतंकवादी संगठन आईएसआईएसए अलक़ायदा और तालिबान कौन सी विचारधारा से परिचालित हैं कि यह सिर्फ़ ख़ूनख़राबा करते हैं। संगठन ने वैचारिक रूप से सम्मेलन कर इस बात की जागरुकता पर मानस बनाया कि लोगों को सही इस्लाम का प्रतिनिधित्व करने वाली सूफ़ी विचारधारा से अवगत करवाना आवश्यक है। इसलिए आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार वहाबी विचारधारा के बारे में भी लोगों को बताने की आवश्यकता पर बल दिया गया। बाद में यह राय बनी की आम सभा करके लोगों और सरकार को वहाबिज्म के प्रति जागरूक किया जाए।

भारत सरकार के नाम ज्ञापन

सभा के बाद भारत सरकार के नाम विस्तृत ज्ञापन दिया गया जिसमें कहा गया कि तंज़ीम उलामा ए इस्लाम भारत के सुन्नी सूफ़ी विचारधारा यानी 'सुन्नत व जमात' की  प्रतिनिधि सभा है जिसमें देश भर के दरगाहोंए ख़ानक़ाहों और सूफ़ी मस्जिदों के इमाम समाज के हितार्थ अपनी राय को प्रकट करते हैं। समाज के सम्मुख आ रही समस्याओं जैसे आतंकवादए कट्टरता, सामुदायिक और साम्प्रदायिक हिंसा और इससे निपटने के मुद्दे पर समाज के अंदर काफ़ी गहमागहमी है। ज्ञापन में कहा गया कि वैश्विक आतंकवाद से बचाने के लिए हमें तीन मुद्दों पर सक्रीय रूप से कार्य करना होगा। वक़्फ़ बोर्ड से वहाबी क़ब्ज़े हटाने होंगेए हज कमेटियों का पुनर्गठन करना होगा और भारत के स्कूल एवं मान्य विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से वहाबी सामग्री हटाकर सूफ़ी वैचारिक इस्लामी शिक्षा की तरफ़ जाना होगा। संगठन ने इस बात पर क्षोभ प्रकट किया कि जब भी मुसलमानों के कल्याण की बात आती हैए चाहे भारत सरकार हो या राज्य सरकारें, वह वहाबियों को आगे कर इतिश्री कर लेते हैं जबकि आवश्यकता इस बात की है कि चाहे अल्पसंख्यक कल्याण के लिए राजनीतिक नियुक्ति हो या प्रशासनिकए ज़रूरत इस बात की है कि सुन्नी सूफ़ी व्यक्ति को ही प्रश्रय दिया जाए। इस पहचान में तंज़ीम मदद कर सकती है।

तंज़ीम के अध्यक्ष मौलाना मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी ने कहाकि देश में वक़्फ़ नियंत्रक संस्था 'सीडब्ल्यूसी' यानी केन्द्रीय वफ़्फ़ परिषद् और इसके अधीन चलने वाली संस्था राष्ट्रीय वक़्फ़ विकास परिषद् और राज्य वक़्फ़ बोर्डों में राज्य सरकारों ने अधिकांश वहाबी लोगों को ज़िम्मेदारी दे रखी है जो ना सिर्फ़ वक़्फ़ सम्पत्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं वरन् सऊदी अरब के इशारे पर वक़्फ़ सम्पत्तियों और वक़्फ़ के अधीन मस्जिदों के इमामों के द्वारा देश में वहाबी विचारधारा के प्रसार के लिए काम कर रहे हैं। यह बहुत गंभीर मसला है और यह तब तक ठीक नहीं हो सकता जब तक कि हम केन्द्रीय वक़्फ़ परिषद्, राष्ट्रीय वक़्फ़ विकास प्राधिकरण और राज्य के वक़्फ़ बोर्डों का पुनर्गठन कर वहाँ सुन्नी सूफ़ी समुदाय के लोगों और आवश्यकतानुसार शिया प्रतिनिधियों को नियुक्त नहीं करते। क़ादरी ने माना वक़्फ़ बोर्ड भारत में वहाबी विचाराधारा को स्थापित करने वाली सबसे बड़ी सरकारी संस्था बन कर रह गई है। यदि सरकारी विभाग ही वहाबी विचारधारा को प्रश्रय देने वाले अड्डे बनकर काम करेंगे तो हम आम लोगों को वहाबी दुष्प्रचार और कट्टरता से रोकने में किस प्रकार कामयाब हो पाएंगे।   क़ादरी ने कहाकि हमें वक़्फ़ के द्वारा संचालित मस्जिदों और ख़ानक़ाहों का किस प्रकार मानवता, सूफ़ीवाद और शांति के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, इसके लिए हमें मिस्र, रूस और चेचेन्या सरकार के फॉर्मूले को समझने की आवश्यकता है।

प्रमुख लोगों के बयान

प्रोफ़ेसर डॉ. मुहम्मद अमीन मियाँ, माहरारा दरगाह शरीफ़ के प्रमुख सज्जादानशीन ने कहा कि वैचारिक रूप से शांतिप्रिय सूफ़ी समुदाय की इच्छा है कि वैश्विक आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार विचारधारा को समझ कर समाज इसके विरुद्ध जनमत का निर्माण करे।

सईद नूरीए रज़ा एकेडमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि विश्व में आतंकवाद के लिए कट्टरता ज़िम्मेदार है और कट्टरता के लिए वहाबी विचारधारा ज़िम्मेदार है। भारत सरकार यदि देश को आतंकवाद से बचाना चाहती है तो उसे वहाबी विचारधारा को असंवैधानिक मानते हुए इस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

सय्यद वाहिद हुसैन चिश्ती, सज्जादानशीन अजमेर दरगाह ने कहा कि यदि देश के सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इस्लामी अध्ययन में सूफ़ी संतों के जीवन और संदेश के बारे में नहीं बताया जाता है तो मुसलमान नौजवानों को कहाँ से प्रेरणा मिलेगी। सूफ़ी साहित्य को बढ़ाना होगा।

मुफ़्ती मुहम्मद मुकर्रम अहमद, फ़तेहपुरी मस्जिद के इमाम  ने कहा किहम सब को देश के कल्याण के लिए एकजुट होकर काम करना होगा। यदि हमें आतंकवाद से लड़ना है तो समाज के सभी तबक़ों का सहयोग लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

सुहैल मियाँ, सज्जादानशीन बिलगराम दरगाह ने कहा कि यह देखने की आवश्यकता है कि पैग़म्बर मुहम्मद साहब के जीवन से हमने क्या सीखाघ् आतंकवादियों के चरित्र से लगता है कि वह पैग़म्बर साहब और सूफ़ी संतों का सम्मान नहीं करतेए इसीलिए हद से बढ़ गए।

सय्यद मुईनुद्दीन अशरफ़ जीलानी, मख़दूम अशरफ़ दरगाहए किछौछा ने कहा कि भारत सूफ़ी संतों का देश है। यदि यहाँ लोग वहाबी विचारधारा के आधार पर नौजवानों को बरगला रहे हैं तो इस बात की फिर आवश्यकता है कि भारत के सूफ़ी संतों के संदेश को आम किया जाए।

सय्यद जावेद नक्शबंदी साहब, सज्जादानशीन, दरबारे अह्ले सुन्नत ने कहा कि जिस तरह पेट्रोडॉलर से भारत में वहाबी विचारधारा का प्रसार हो रहा है उस पर फ़ौरन रोक लगाई जानी आवश्यक है। भारत सरकार को चाहिए वक़्फ़ बोर्डों से वहाबियों को बाहर करे।

मन्नान रज़ा ख़ाँ, आस्ताना आलाहजरत रज़विया, बरेली ने कहा कि भारत को सूफ़ीवाद का संदेश बरेली शरीफ़ से मिलता है। भारत में वहाबी विचाराधारा की पहली लड़ाई आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ाँ साहब ने बरेली से शुरू की थी। आज हमें आला हज़रत के संदेश को बहुप्रसारित करने की आवश्यकता है।

सैयद फ़ुरक़ान अली चिश्ती, गद्दीनशीन, अजमेर दरगाह ने कहा कि भारत का सुल्तान अजमेर के ख़्वाजा हैं। ग़ौर करने की बात है कि ग़रीब नवाज़ के दरबार में हर धर्म के लोग आते हैं। आज हमें ग़रीब नवाज़ से आस्था के साथ साथ उनके जीवन से भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

मुफ़्ती मुहम्मद हनीफ़ रिज़वी, जामिया नूरीया, बरेली ने कहा कि जब भी मुसलमानों पर संकट आता है तो यह मानना चाहिए कि हमने पैग़म्बर मुहम्मद साहब के आदेशों की अवहेलना की होगी। आतंकवाद के रास्ते पर भटके नौजवानों ने इस्लाम का तो नहींए मुसलमानों को बहुत नुक़सान पहुँचाया है।

मौलाना सग़ीर अहमद जोखनपूरी, बरेली शरीफ़ ने कहा कि देखना होगा कि अरब में जो लोग कट्टरता को बहुत हल्की बात समझते थे आज बर्बादी के कगार पर खड़े हैं। हमने इस्लाम सूफ़ी संतों से सीखा है लेकिन भटके हुए नौजवानों को जो विचारधारा नफ़रत सिखाती हैए वह सही शिक्षा कैसे दे सकती हैघ्

उस्मान गनी बापू गुजरात ने कहा कि भारत में मुसलमानों के बीच आतंकवाद के लिए पेट्रो डॉलर की विचारधारा ही नहीं बल्कि अशिक्षाए ग़रीबी और उत्पीड़न भी जिम्मेदार है। हम मूल मुद्दों पर ध्यान दिए बिना आतंकवाद को नहीं समझ सकते।

मौलाना यासीन अख्तर मिस्बाही दिल्ली ने कहा कि भारत में मदरसों की स्थिति में सुधार के लिए हमें राष्ट्रीय मदरसा बोर्ड के मसौदे का स्वागत करना चाहिए। मदरसों का आधुनिकीकरण किए बिना हम आने वाली नस्लों के बेहतर भविष्य की नीँव नहीं रख सकते।

मुफ़्ती निज़ामुद्दीन रज़वी, जामिया अशरफिया मुबारकपुर ने कहा कि मदरसों और ख़ानक़ाहों की हिफ़ाज़त किए बिना हम अपने बच्चों को वहाबी फ़ित्ने से नहीं बचा सकते। देखा जाता है कि भटके हुए लोग हमारी मस्जिदों और ख़ानक़ाहों पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं। इन्हें स्वतंत्र करवाए जाने की आवश्यकता है। 

हाजी शाह मुहम्मदए प्रमुखए दारुल उलूम राबिया बरसियाए दिल्ली ने कहा कि भारत में राजनीतिक रूप से मुसलमान कमज़ोर है। मुसलमानों के कम से कम 80 सांसद चुनाव जीतने चाहिए लेकिन राजनीतिक बिखराव ने हमें पस्ती में डाल दिया है।

विदेशों से सीखने की नसीहत

तंजीम के प्रवक्ता इंजिनियर शुजात अली क़ादरी ने वैश्विक आतंकवाद से लड़ने में कई देशों से सबक़ सीखने की बात कही। क़ादरी ने कहाकि मिस्र में वहाबी आतंकवाद से निपटने के लिए अलअज़हर विश्वविद्यालय के मुफ्ती तैयब साहब के फ़तवे से भारत काफ़ी कुछ सीख सकता है। उन्होंने मिस्र के राष्ट्रपति फ़त्ताह अलसीसी का नाम कई बार दोहराया कि उन्होंने किस प्रकार कट्टरता पर काबू पाया। इसके अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने वहाबी विचारधारा को काफ़ी हद तक क़ाबू किया है जिसमें चेचेन्या के राष्ट्रपति रमज़ान क़ादिरोव ने शांति स्थापना में मदद की है। इसके अलावा सीरिया में बशार अलअसदए ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानीए कज़ाख़स्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेवए ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमअली रहमून, अल्बानिया के राष्ट्रपति बुजार निशानी ने अपने देश को कट्टरता से बचाने के लिए ऐतिहासिक कार्य किया है। भारत को इनसे सीखना चाहिए।

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