खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली

खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली

खाद्य सुरक्षा का अर्थ है सभी व्यक्तियों को सभी समयों पर पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न् (भोजन) उपलब्ध कराना ताकि वे सक्रिय एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकें। इसके लिए यह आवश्यक है कि न केवल समग्र स्तरों पर खाद्यन्न्ाों की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध हो बल्कि व्यक्तियों-परिवारों के पास उपयुक्त क्रय शक्ति भी हो ताकि वे आवश्यकतानुसार खाद्यान्न् क्रय कर सकें। जहाँ तक पर्याप्त मात्रा का संबंध है, इसके दो पहलू हैंः (1) मात्रात्मक पहलू (इस रूप में अर्थव्यवस्था में खाद्य-उपलब्धि इतनी हो कि मांग की पूर्ति कर सके),ं तथा (2) गुणात्मक पहलू (इस रूप में कि जनसंख्या की पोषण आवश्यकताएं पूरी की जा सकें)। जहां तक उपयुक्त क्रय शक्ति का प्रश्न है, इसके लिए आवश्यक है कि पोषण शक्ति में वृद्धि की जा सके। खाद्य सुरक्षा की मात्रात्मक एवं गुणात्मक पहलुओं के समाधान के लिए भारत सरकार ने 3 खाद्य-आधारित सुरक्षा जाल अपनाए हैंः (1) सार्वजनिक वितरण प्रणाली, (2) समेकित बाल विकास सेवाएं, (3) दोपहर भोजन कार्यक्रम।

स्वतंत्रता के बाद के वर्षाें में खाद्यान्न्ा की अत्यधिक कमी के परिणाम स्वरूप सरकार की खाद्य नीति का उद्देश्य खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता प्राप्त करना था। तीसरी पंचवर्षीय योजना के बाद खाद्यान्नों के उत्पादन में (विशेष रूप में गेंहू में और हाल के वर्षों में चावल में) तेज वृद्धि हुई। इसे अर्थव्यवस्था खाद्यान्न्ाों की समग्र कमी की समस्या का सामना कर पाने में सफल हो सकी है तथा सूखे जैसी स्थिति का सामना करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त भंडार हैं। वस्तुतः जैसा कि, आर0 राधाकृष्ण ने कहा है, भारत 1970 के दशक में ही खाद्यान्न्ाों के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता की स्थिति जा चुका है तथा इस स्थिति को बनाए रखने में सफल रहा है। सरकार ने काफी बड़ी मात्रा में भारतीय खाद्य निगम की सहायता से खाद्यान्न्ाों के भंडार जमा किए हैं और इन भंडारों में से व्यक्तियों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्न्ाों की आपूर्ति की जाती है। हाल के कुछ वर्षों में ये भंडार न्यूनतम मानदंडों की तुलना में काफी अधिक थे जिससे अतिरिक्त भंडार की समस्या हो गई है। 1 जुलाई 2013 को सरकार के पास गेहँू के 42.2 मिलियन टन तथा चावल के 31.5 मिलियन टन तक पहुंच गए। ये स्टाक न्यूनतम मानदंडों की तुलना में बहुत अधिक हैं (न्यूनतम मानदंड के अनुसार, जुलाई-सितंबर की तिमाई में गेहँू के 20.1 मिलियन तथा चावल के 11.8 मिलियन टन भंडार की आवश्यकता थी)।

मत्रात्मक पहलू से भी अधिक गंभीर गुणात्मक पहलू हैं यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाएगी।

(1) विश्व भूखमरी सूचकांक 2013 के अनुसार, कुल 48 विकासशील देशों में भारत का 63वां स्थान था, चीन का 64वां स्थान था, पाकिस्तान का 57वां स्थान था, नेपाल का 18वां स्थान था। इस प्रकार वह भी भारत से ऊपर थे। श्रीलंका का स्थान 13वां था।

(2) वर्ष 213 में भारत का भुखमरी सूचकांक मान 21.3 था जो एक ‘अत्यन्त चिंताजनक’  स्थिति का द्योतक है। (20 से 29.9 के मध्य भूख सूचकांक का मान वाले देशों की गणना ‘अत्यन्त चिन्ताजनक’ स्थिति वाले देशों में की जाती है)।

(3) वैश्विक स्तर पर 2011-13के दौरान 89.2 करोड व्यक्ति ‘भयंकर भूख’ के शिकरा थे, जिन्हें एक स्वस्थ एवं अच्छे जीवन व्यतीत करने के लिए उपयुक्त मात्रा में भोजन उपलब्ध नहीं था। इसमें से 21.38 करोड़ अर्थात् एक चैथाई से अधिक भारत में थे। 

(4) 2010-12 की अवधि में भारत में जनसंख्या का 17517.% अल्पपोषित था अर्थात् प्रत्येक 6 में से एक व्यक्ति।

(5) 2008-12 की अवधि में 5 वर्ष से कम आयु के 40.2% बच्चे कम वजन के शिकार थे। 

(6) 2011 में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्युदर 6.1% थी। 

(7) एन.एस.एस.ओ. के 66वें दौर के अनुसार, कैलोरी के रूप में व्यक्त पोषण 1993-94 में 2133 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन था। 2009-10 में यह कम होकर ग्रामीण क्षेत्रों में 2020 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 1946 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन रह गया।

(8) तीसरा तथा अंतिम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 में किया गया। इसके अनुसार, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में से लगभग आधे बच्चे अवरूद्ध विकास के शिकार थ जिसका अर्थ यह है कि काफी समय से अल्पपोषण की स्थिति में गुजर रहे थे। 20 % बच्चे अपनी लम्बाई के मुकाबले बहुत दुबले-पतले थे। जिसका कारण अपर्याप्त भोजन हो सकता है या हाल की बीमारी। जीवन के प्रथम 6 मास से भी जब अधिकांश बच्चे स्तनपान पर निर्भर होते हैं, 20 में 30 % बच्चे अल्पपोषण के शिकार थे।

(9) रक्त की कमी या रक्तक्षीणता भारत में एक मुख्य स्वास्थ्य समस्या है, विशेष रूप में स्त्रियों और बच्चों के लिए। तीसरे एन.एफ.एच.एस. के अनुसार 6 से 59 मास के मध्य आयु के बच्चों का 70 % रक्त की कमी का शिकार था। जहाँ तक स्त्रियों का संबंध है, उनका 35% रक्तक्षीणता का शिकार था।

भारत में पिछले 2 दशकों में प्रति व्यक्ति कैलोरी उपभोग में तेज गिरावट भी दिखाई देती है। आर्थिक समृद्धि तथा पौषणिक परिणामों के मध्य संबंध के संदर्भ में भारत का अनुभव एक ‘वैश्विक पहेली’ माना जा रहा है। जहाँ विश्व का अनुभव यह रहा है कि अल्पपोषण में गिरावट सकल घरेलू उत्पाद में संवृद्धि से लगभग आधी दर पर होती है, वहां भारत में 1990 से 2005 की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद में तो 4.2 % प्रति वर्ष की संवृद्धि हुई परन्तु अल्पपोषण में गिरावट मात्र 0.63 हुई। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को सस्ती कीमत पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना है ताकि उन्हें उनकी बढ़ती हुई कीमतों के प्रभाव से बचाय जा सके तथा जनसंख्या की न्यूनतम आवश्यक उपभोग स्तर प्राप्त करने में सहायता दी जा सके। इस प्रणाली को चलाने के लिए सरकार व्यापारियों या मिलों तथा उत्पादकों से वसूली कीमतों पर वस्तुएँ खरीदती है। इस प्रकार जो खरीद की जाती है इसका वितरण उचित दर दूकानों और राशन की दूकानों के माध्यम से किया जाता है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को सस्ती कीमत पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना है ताकि उन्हें उनकी बढ़ती हुई कीमतों के प्रभाव से बचाय जा सके तथा जनसंख्या की न्यूनतम आवश्यक उपभोग स्तर प्राप्त करने में सहायता दी जा सके। इस प्रणाली को चलाने के लिए सरकार व्यापारियों या मिलों तथा उत्पादकों से वसूली कीमतों पर वस्तुएं खरीदती है। इस प्रकार जो खरीद की जाती है इसका वितरण उचित दर दूकानों और राशन की दूकानों के माध्यम से किया जाता है। कुछ वसूली प्रतिरोधक भंडारों के निर्माण के लिए रख ली जाती है। खाद्यान्न्ाों के अतिरिक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली का प्रयोग खाद्य तेलों, चीनी, कोयला, मिट्टी का तेल तथा कपडे के वितरण के लिए भी किया जाता है। इस प्रणाली में सम्पूर्ण जनसंख्या को शामिल किया गया है। अर्थात् इसे किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं रखा गया है। जिन परिवारों के पास घरेलू पता है उन सबको राशनकार्ड दिए गए हैं। उचित दर की दूकानों की संख्या 1960 के अन्त तक 0.47 लाख थी जो 1985 में 3.12 लाख और वर्तमान में 4.74 लाख है। भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लगभग 16 करोड़ परिवारों को प्रति वर्ष 30000 करोड़ रूपए मूल्य की वस्तुओं का वितरण किया जाता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के आबंटन और उठान के बढ़ते हुए अंतर का मुख्य अंतर का मुख्य कारण यह था कि इस प्रणाली से निर्गमन कीमतें हाल के वर्षों में काफी बढ़ाई गईं, जिससे इन कीमतों का बाजर कीमतों से अंतर बहुत कम रह गया। कम अंतर के कारण आम परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अनाज क्रय करने के स्थान पर बाजार से अनाज क्रय करने लगे। उदाहरण के लिए 1990 से 1994 के मध्य चावल और गेहूँ की निर्गमन कीमतों में 4 बार वृद्धि की गई। जिसके परिणामस्वरूप 1994 में कम होकर चावल की निर्गमन कीमतें, 1989 की अपेक्षा 2 गुनी से भी अधिक तथा गेहूँ की निर्गमन कीमत लगभग 2 गुनी हो गईं। जनवरी 1991 में दिल्ली में गेहूँ बाजार कीमत और निर्गमन कीमत में 47.17 % का अंतर था जो फरवरी 1994 में कम होकर मात्र 8.2 % रह गया। सरका द्वारा 1994 में निर्धारित कीमत मई 1997 तक बन रहीं। जून 1997 में सरकार ने लक्षित सार्वजनिक वितरण योजना लागू की। जिसके तहत दोहरी कीमत संरचना लागू की गई। इस प्रणाली के अंतर्गत, दरिद्रता रेखा से नीचे रहने वालों के लिए निर्गमता कीमत की आर्थिक लागत का 50% रखा गया जब कि दरिद्रता रेखा के ऊपर रहने वाले व्यक्तियों के लिए इसे आर्थिक लागत के बराबर रखा गया। चूँकि दरिद्रता रेखा से ऊपर रहने वाले व्यक्तियों के लिए निर्गमन कीमत बाजार कीमत के बहुत करीब थी। इसलिए इन परिवारों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली से खरीद बहुत कम कर दी। इससे सरकार के पास खाद्यान्न्ा भंडार और बढ़ गए। इस समस्या के निदान के लिए सरकार ने जुलाई 2001 में दरिद्रता रेखा से ऊपर रहने वाले व्यक्तियों के लिए निर्गमन कीमत को 30 % कम कर दिया अर्थात् इन व्यक्तियो के लिए निर्गमन कीमत को आर्थिक लागत का 70 % निर्धारित किया गया।

खाद्य सहायता के बढ़ते हुए भार को कम करने के उद्देश्य से तथा उसे उन लोगों तक बेहतर तरीके से पहुँचाने के लिए जिन्हें उसकी अधिक आवश्यकता है, भारत सरकार ने 1 जून, 1997 से लक्षित सार्वजनिक योजना लागू की। इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकारों से दरिद्रता रेखा से नीचे रहने वाले व्यक्तियों का पता लगाने के लिए कहा गया। इस दरिद्रता रेखा से नीचे उन परिवारों को रखने की व्यवस्था थी जिनकी आर्थिक आय 1500 रूपए से कम थी। प्रारंभ में प्रति परिवार 10 किलोग्राम खाद्यान्न्ा प्रति मास देने की व्यवस्था की गई जिसे बाद में बढ़ाकर 25 किलोग्राम कर दिया गया। 1 अपै्रल 2002 में राशन की मात्रा और बढ़ाकर 35 किलोग्राम प्रति मास प्रति व्यक्ति कर दी गई।

2 निर्गमन कीमतों के अतिरिक्त दिसम्बर-2000 में एक और निर्गमन कीमत निश्चित की गई जब सरकार ने अन्त्योदय अन्न्ा योजना लागू किया। इस योजना के तहत निर्धनतम 2.43 करोड़ परिवारों को गेहूँ 2 रूपए प्रति किलोग्राम और चावल 3 रूपए प्रति किलोग्राम की कीमत पर दिया जाता है। 

दरिद्रता रेखा से नीचे परिवारों तथा अन्त्योदय योजना के अंतर्गत शामिल कुल 6.52 को 35 किलोग्राम प्रति मास की दर से खाद्यान्न्ा दिया जाता है। दरिद्रता रेखा से ऊपर रहने वाले परिवारों को अलग-अलग राज्यों में 15 किलोग्राम प्रति मास से 35 किलोग्राम के मध्य खाद्यान्न्ा दिया जाता है। वर्ष 2012-13 में (फरवरी-13 तक) सरकार ने कुल 627.67 लाख टन खाद्यान्न्ाों का आबंटन किया। अन्त्योदय, बी.पी.एल और ए.पी.एल. परिवारों के लिए टी.पी.डी.एस.(टारगेटिड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन स्कीम) के अंतर्गत 499.42 लाख टन का अतिरिक्त आबंटन तथा कल्याणगत कार्यक्रमों (जैसे एकीकृत बाल विकास संस्थानों, दोपहर भोजन योजन, अन्न्ापूर्णा इत्यादि) के लिए 49.29 लाख टन।

लक्षित सार्वजनिक प्रणाली कई आधार पर असफल सिद्ध हुई है। यह वास्तविक दरिद्रों तक पहुँचने में तथा उन्हें उचित कीमतों पर अनाज उपलब्ध कराने में असफल रही है। पह खाद्य सहायता का भार कम नहीं कर पाई है। उसने सम्पूर्ण खाद्य आपूर्ति प्रणाली को कमजोर बनाया है तथा कई उचित दर दूकानों की लाभोत्पादकता कम करके उन्हें बंद करने को बाद्ध किया है। उसके कारण, विभिन्न्ा राज्यों के मध्य खाद्यान्न्ा आबंटन की व्यवस्था गढ़बड़ा गई है जिससे पूर्ति की आधिक्य राज्यों से पूर्ति की कमी वाले राज्यों की ओर खाद्यान्न्ा-हस्तान्तरण व्यवस्था कमजोर हुई है। इतना ही नहीं, लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कारण भ्रष्टाचार व गड़बडि़यों में वृद्धि हुई है।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने मार्च-2011 में यह सुझाव दिया है कि खाद्यान्न्ाों के स्थान पर, दरिद्रों के लिए इलेक्ट्रानिक्स खातों में प्रति मास एक निर्धारित मुद्रा राशि का अंतरण किया जाना चाहिए और उन्हें यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे मुद्रा राशि से उचित मूल्य की दूकानों से अपनी पसंद की वस्तुएं क्रय कर सकें। इस संबंध में सुझाव दिया है कि सरकार आर्थिक सहायता राशि को सीधे विशिष्ट सूचक(यूनिक आइडेंटीफिकेशन) या आधार नंबर से जुड़े स्मार्ट कार्ड में अंतरित करे और यह स्मार्ट कार्ड परिवार में 18 वर्ष की आयु से अधिक किसी महिला सदस्य के नाम हो। आर्थिक सहायता की मात्रा, खाद्यान्न्ा की न्यूनतम कीमत तथा उचित दा मूल्य की दूकान पर उस खाद्यान्न्ा की कीमत के बीच के अंतर के बराबर हो। इसका अर्थ यह होगा कि दरिद्रता रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की खाद्यान्न्ा उपलब्धि की मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत प्रति मास 280 से 300 रूपए की आर्थिक सहायता देनी होगी।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013ः-प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों को हर समय पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने हेतु खाद्यान्न्ा के सार्वजनिक वितरण के माध्यम से उपयुक्त व्यवस्था करना है क्योेंकि भूख से, कुपोषण से तथा इनसे जुड़ी समस्याओं से छुटकारा पाना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सिफारिश की है कि परिवार-अनुसार खाद्यान्न्ाों का अधिकार निर्धारित करने के स्थान पर व्यक्ति अनुसारा खाद्यान्न्ाों का अधिकार निर्धारित किया जाना चाहिए। इसके पक्ष में परिषद ने 2 तर्क दिए- (1) प्रति  व्यक्ति खाद्यान्न्ा अधिकार अधिक न्यायोचित है, जिन परिवारों में व्यक्तियों की संख्या अधिक होगी उनके खाद्यान्न्ा संबंधी अधिकार भी अधिक होंगे तथा (2) व्यक्ति को आधार बनाने पर परिवारों की सही संख्या का अनुमान लगाने की समस्या समाप्त हो जाएगी। सही अनुमान लगाना अक्सर दुरूह होता है और उसमे गड़बड़ी करने की काफी संभावना होती है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 22 सितम्बर 2011 को लोकसभा में पेश किया गया। इस विधेयक में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन 75 % ग्रामीण जनतो को एवं 50 % शहरी जनता को सस्ती कीमत पर खाद्यान्न्ा उपलब्ध करने की, तथा स्त्रियों और बच्चों की पोषण सहायता प्रदान करने व्यवस्था की गई है। विधेयक को पेश करने के बाद उसे एक विशिष्ट कमेटी को सौंपा गया ताकि उसकी विभिन्न्ा धाराओं पर पुनः विचार किया जा सके। कई सुझावों के प्रकाश में संशोधन किए गए और संशोधित राष्ट्रीय सुरक्षा विधेयक 2013 में पेश किया गया। 12 सितम्बर, 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर हस्ताक्षर किए गए और यह कानून बन गया। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैंः-

(1) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 75 % ग्रामीण तथा 50 % शहरी जनसंख्या को टी.पी.डी.एस. के माध्यम से सस्ती कीमतों खाद्यान्न्ा प्राप्त करने का कानूनी अधिकर देता है।

(2) लाभभोगी को 1 माह में 5 किग्रा चावल, गेहूँ या मोटे अनाज की पूति क्रमशः रू.3,रू.2, रू.1 प्रति किग्रा की दर पर की जाएगी। लाभार्थियों का चयन राज्य सरकारों द्वारा केंद्र सरकार के निर्धारित मानदंडों के आधार पर किया जाएगा। इस  प्रकार परिवारों के स्थान पर व्यक्ति अनुसार खाद्यान्न्ाों का अधिकार स्थापित किया जाएगा।

(3) खाद्यान्न्ाों की कीमत शुरू में 3 वर्षों तक लागू रहेगी उसके पश्चात् केंद्र  सरकार द्वारा समय-समय पर उनका निर्धारण इस प्रकार किया जाएगा कि न्यूनतम समर्थ कीमतों से अधिक न हो। 

(4) यद्यपि अधिनियम में खाद्यान्न्ा की मात्रा को पूर्व विधेयक में निर्धारित मात्रा 7 किग्रा से घटाकर 5 किग्रा कर दिया गया है तथापि अन्त्योदय, ंबी.पी.एल. अन्न्ा योजना के अंतर्गत 2.43 करोड़ निम्नतम परिवारों को दिए जाने वाले अनाज में कोई कमी नहीं की गई है। अर्थात् इन परिवारों को 35 किग्रा प्रति परिवार के हिसाब से खाद्या मिलते रहेंगे।

(5) अधिनियमों के अंतर्गत पात्र परिवारों की शिनाख्त या निर्धारण राज्य सरकारंे करेंगी और यह काम 365 दिन  के अंदर करना अनिवार्य होगा। 

(6) 6 माह से 6वर्ष के बच्चों के लिए अधिनियम में आयु अनुसार समुचित भोजन की गारंटी दी गई है जिसे स्थानीय आंगनबाड़ी के माध्यम से मुफ्त प्रदान किया जाएगा। 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को प्रतिदिन(अवकाश दिनों के अतिरिक्त) 1 बार मुफ्त दोपहर भोजन दिया जाएगा। सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त एवं स्थानीय निकायों द्वारा संचालित स्कूलों के कक्षा 8 तक के ब़च्चों के लिए यह योजना लागू होगी। 6 मास से कम आयु वाले बच्चों के लिए पूरी तरह से स्तनपान पर निर्भरता को प्रोत्साहित किया जाएगा।

(7) प्रत्येक गर्भवती महिला एवं स्तनपान कराने वाली माता को स्थानीय आंगनबाड़ी से मुफ्त भोजन दिया जाएगा (गर्भ के दौरान एवं बच्चा पैदा होने से 6 माह तक) तथा किस्त में 6000 रूपए का मातृत्व लाभ दिया जाएगा।

(8) विधेयक में राज्य खाद्य आयोग स्थापित करने की बात की गई है। प्रत्येक आयोग में 1 अध्यक्ष, 5 अन्य सदस्य एवं 1 सदस्य सचिव होगा। इनमे कम से कम 2 महिलाएं एवं 1 सदस्य अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति को होना अनिवार्य होगा। राज्य आयोग का मुख्य काम विधेयक कार्यान्वयन पर नजर रखना, राज्य सरकारों एवं संस्थानों को सलाह देना तथा विधेयक के उल्लंघन की जांच करना होगा। 

(9) अधिनियम के अधीन जिन्हें को खाद्यान्न्ा प्राप्त करने का हक दिया गया उन्हें खाद्यान्न्ा न मिलने की  स्थित में, संबंधित राज्य सरकार में खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने का हक है।

(10) विधेयक में 3 अनुसूचियां हैं (अधिसूचना द्वारा इनमें संशोधन किया जा सकता है)। अनुसूची 1 में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निर्गमन कीमतों की जानकारी दी गई है। अनुसूची 2 में दोपहर भोजन प्रणाली, घर ले जा सकने वाले राशन एवं अन्य अधिकारों के संबंध में ‘पोषण मानक’ परिभाषित किए गए हैं। यथा 6मास से 3 वर्ष तक के बच्चों के लिए घर ले जा सकने वाले राशन में कम-से-कम 500 कैलोरी तथा 12-15 ग्राम प्रोटीन मिलना चाहिए। अनुसूची 3 में ‘खाद्य सुरक्षा को और बढ़ाने’ के सुझाव हैं जिन्हें निम्न वर्गों में बांटा गया हैः (1) कृषि को पुनर्जीवन देना एवं उसे मजबूत बनाना (कृषि सुधार शोध एवं अनुसंधान, लाभकारी कीमते, इत्यादि), (2) खाद्यान्न्ाों की वसूली, भंडारण तथा चलन (विकेन्द्रित वसूली) तथा (3) अन्य सुक्षाव (पीने का जल, सफाई व स्वच्छता स्वास्थ्य रक्षा तथा वरिष्ठ नागरिकों, विकलांग एवं अकेली रहने वाली महिलाओं के लिए उपयुक्त पेंशन की व्यवस्था)।      

(डाॅ.नीतू सिंह तोमर)