मौलाना एजाज़ अहमद रज़्ज़ाकी

इस संसार के हर र्धम में र्कुबानी करने का परंपरा है खुदा को मनाने और उसे खुश करने के लिये हज़रत बाबा आदम से लेकर हज़रत मोहम्मद साहब तक और वर्तमान में भी ये रिवाज़ कायम है। अल्लाह के ध्यान को अपनी ओर आर्कशित करने के लिये मुसलमान र्कुबानी करता है, र्कुबानी का चर्चा बाबा आदम के बेटे हज़रत हाबिल और काबिल का कुरान में मौजूद है, उस के बाद हर धर्म, उम्मत , और नसलों में इस का वजूद मिलता है, मुसलमानों के साथ-साथ अन्य समुदाय के लोग भी र्कुबानी का जश्न मनाते है। देवी-देवताओं की पूजा करने वाले भी उसके सामने बली देते हैं, पुराने जमाने में बसने वाले आदम खोर भी अपने देवताओं को खुश करने के लिये र्कुबानी देते आये हैं, ईसलाम धर्म में र्कुबानी हज़रत इब्राहीम की यादगार है। मुसलमानो नें जब अपने पैगंम्बर हजरत मोहम्मद साहब से पूछा की र्कुबानी क्या है, तो आप ने फरमाया कि तुम्हारे बाप हज़रत इब्राहीम की सुन्नत है। हज़रत मोंहम्मद साहब ने मदीना शरीफ में 10 वर्षो तक रहते हुये , लगातार र्कुबानी की है, और मुसलमानों को भी र्कुबानी करने का आदेश दिया है और कहा की जिलहिज्जा के महीने में र्कुबानी से बढ़ कर कोई भी कार्य खुदा के यहाॅ पसंदीदा नहीं है। और जिस जानवर की र्कुबानी किया जायेगा उस के हर बाल के बदले एक-एक नेकियाॅ मिलेगी, ये र्कुबानी हज़रत इब्राहीम की सुन्नत है। इस का मक़सद ये है की हम इसलाम को जिंदा और उसे मज़बूत करने के लिये माल व दौलत , बाल व बच्चांे की र्कुबानी देने के लिये तैयार हैं। कोई भी दौलत खुदा के राह में लुटाने से हम पीछे नहीं हटेंगें , लेकिन बदकिसमती से मुस्लिम समाज नें र्कुबानी को केवल रसम के तौर पर अपनाया मगर उसके असल जड़ को नहीं समझ पाये। खुदा पाक का पाक फरमान है की तुम्हारी र्कुबानी का गोश्त और खून खुदा को र्हगिज़ नहीं पहुचता परंतु इस से तमको परहेजगारी मिलती है। जिलहिज्जा की 10वीं तारीक को हम र्कुबानी देकर हज़रत इस्माईल की याद को जिंदा करते हुये, खुदा से वादा करते है की यदी तेरे और तेरे रसूल व उसके दीन के लिये जान भी र्कुबान करना पडे तो हम पीछे नहीं हटंेेेेगंे अगर र्कुबानी करने वाले में ये जजबा नहीं तो उसकी र्कुबानी सिवाये रसम के कुछ भी नहीं है। र्कुबानी जहाॅ एक बहुत बडी इबादत है वहीं एक खुदा से वादा भी है की हमारा मरना जीना और हमारी पूरी जिंदगी अल्लाह के लिये है। मुसलमानों की जिंदगी का यही सच्चा मकसद है। मगर आज समाज के अधिकतर लोगों नें इस र्कुबानी की रूह को भूल गये हैं, इस सुन्नत को रिवाज और नुमाइश बना लिया है। तीन-तीन , चार-चार जानवरों की र्कुबानी कर समाज में अपनी दौलत की धाक जमाते हैं उसके गोश्त को गरीबों व हकदारों में बाॅटने के बजाये केवल दोस्तो के साथ दावतों में उडाते है, या फ्रिज मे रख कर महीनों तक खाते है , इस र्कुबानी का असल मायने अपनी चाहतो अपनी तमन्नाओं और अपनी खुशनूदीयों की गरदन खुदा के लिये काट देना है यही कुबानी का मकसद है कि अपने खुदा के लिये जियो उसकी खुशी के लिये जियो जहाॅ रहो जिस हाल में रहो इसलाम के सच्चे वफादार बन कर रहो र्कुबानी का यही फलसफा है ।