(जिगर डे के अवसर पर )

सईद लखनवी 

 

कहते हैं जिगर जिसको वो शायर था सरापा

मिन्जुम्लाए अहबाब में लगता था वो यकता 

अब तक कि सुखनवर नहीं पैदा हुआ ऐसा

मुद्दत हुई फिर भी उसे भूली नहीं दुनिया

           गोंडा में लहद उसकी ही क्या तुमको पता है

           ये जश्ने जिगर जश्ने जिगर जश्ने जिगर है 

खामोश जिगर क्या हुए खामोश है हर साज़

अब वैसा तरन्नुम न तो वैसी कोई आवाज़

पाकीज़ा वो तखय्युल किसी में न तगो तार 

इस अहद का शायर हुआ बस तालिबे एजाज़

         गुलज़ारे सुखन लगता है बेबर्गो समर है

         ये जश्ने जिगर जश्ने जिगर जश्ने जिगर है

मयखाने में कोई नहीं अब ऐसा बलानोश 

मयखाना ये कहता है कि होता नहीं मदहोश 

पैमाना ये कहता है कि वो हो गया खामोश 

ये हो नहीं सकता कि उसे कर दूं फरामोश 

       तस्वीरे जिगर दाघ्स जिगर पेशे नज़र है 

       ये जश्ने जिगर जश्ने जिगर जश्ने जिगर है

कहते हैं जिगर जिनको तरन्नुम के थे बानी

ग़ज़लों को अता कर दी तरन्नुम से जवानी

अंदाज़े जिगर लस मिली ग़ज़लों को रवानी 

यूँ ही नहीं दुनिया ये जिगर की है दीवानी 

        जिसका कि हर इक बज़्म पे अबतक के असर है

        ये जश्ने जिगर जश्ने जिगर जश्ने जिगर है

आबाद जिगर से है ये जिम्खानाए उर्दू

दिलकश है जिगर ही से ये काशानाए उर्दू 

अशआर जिगर के हैं ये पैमनाए उर्दू

दीवाने जिगर के हैं ये दीवानए उर्दू

        ये नज़्म सईद अपनी बउन्वाने जिगर है 

        ये जश्ने जिगर जश्ने जिगर जश्ने जिगर है