याकूब मेमन ने राष्‍ट्रपति  को फिर भेजी दया याचिका

याकूब मेमन ने राष्‍ट्रपति को फिर भेजी दया याचिका

नई दिल्‍ली : 1993 मुंबई विस्फोट मामले में मौत की सजा पाने वाले याकूब मेमन ने राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास दोबारा दया याचिका भेजी है। जानकारी के अनुसार, याकूब मेमन ने राष्‍ट्रपति को नई दया याचिका भेजकर एक बार फिर रहम की अपील की है। वहीं, मेमन की किस्मत पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में फैसला होगा। इस समय कोर्ट में मेमन की याचिका पर सुनवाई जारी है।

बताया जा रहा है कि मेमन ने 30 जुलाई को तय अपनी फांसी से बचने के लिए नई दया याचिका दायर की है। बता दें कि याकूब की पहली दया याचिका खारिज हो चुकी है। मेमन की ओर से भेजे गए पहली दया याचिका को राष्‍ट्रपति खारिज कर चुके हैं। 2014 में याकूब के भाई ने भी दया याचिका दी थी, जिसे राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया था।

गौर हो कि इससे पहले मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस कूरियन और जस्टिस दवे की राय अलग-अलग होने के चलते मामले को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया गया था। मंगलवार की सुनवाई के दौरान जस्टिस दवे ने कहा कि याकूब की याचिका में कोई आधार नहीं है। वहीं जस्टिस कूरियन ने फांसी पर स्टे लगाते हुए क्यूरेटिव पिटीशन को आधार बनाकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट से याकूब की क्यूरेटिव पिटीशन में गंभीर चूक हुई है और तकनीकी खामी की वजह से किसी की जिंदगी को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। याकूब ने अपनी याचिका में कहा था कि उसे फांसी नहीं दी जा सकती, क्योंकि टाडा कोर्ट का डेथ वारंट गैरकानूनी है। याकूब के मुताबिक, उसकी पुर्नविचार याचिका खारिज होने के बाद डेथ वारंट जारी कर दिया गया, जबकि उसकी क्यूरेटिव याचिका कोर्ट में पेंडिंग थी। ऐसे में डेथ वारंट जारी करना गैरकानूनी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई कर रहे एक जज ने सवाल उठाते हुए कहा था कि याकूब की क्यूरेटिव पिटिशन की सुनवाई में उन्हें शामिल क्यों नहीं किया गया। याकूब के समर्थन में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने भी याचिका दाखिल कर उसकी फांसी पर रोक लगाने की मांग की है। दरअसल, महाराष्ट्र सरकार ने याकूब का डेथ वारंट जारी कर दिया, जिसके लिए 30 जुलाई का दिन तय किया गया है।

ऐसे में क्यूरेटिव से पहले डेथ वारंट जारी करना गैर-कानूनी है, नियमों और कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसके लिए 27 मई 2015 के सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला दिया गया है। इसके लिए शबनम जजमेंट का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि डेथ वारंट सारे कानूनी उपचार पूरे होने के बाद जारी होना चाहिए।

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