झुुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों के लोगों की गरीबी और दुर्दशा

झुुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों के लोगों की गरीबी और दुर्दशा

गरीबों के लिए बनीं सरकारी कालोनियों का रहीसों को आबंटन तत्काल निरस्त होना चाहिए

डाॅ.नीतू सिंह 

देश की झुग्गी-झोपड़ी के बारे में अनेक अध्ययनकत्र्ताओं ने अपने अनुभवों पर अनेक पुस्तकें लिखीं। मैने भी फर्रूखाबाद जनपद के गाँव-नगर की झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में जाकर लोगों के बारे में अपने अनुभव में पाया। ‘कुलीन वर्ग’ को झुग्गी-झोपड़ीें वाली बस्तियों में रह रहे लोगों की दरिद्रता एवं दुर्दशा का अहसास तब होता है जब ‘मन्त्र‘ कहानी के मुख्य पात्र जैसा कोई व्यक्ति ‘प्रतिशोध’ के स्थान पर ‘मानवतापूर्ण’ व्यवहार से उन्हें झटका देता है। इससे ऐसा लगता है कि वे अपने आसपास के यथार्थ को लेकर उदासीन एवं असंवेदनशील है।

‘‘झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियों में जाकर अपने अध्ययन के दौरान मै अनेक लोगों से मिली, जो चाहते थे कि उन्हें बेहत्तर दशाओं में जीने का मौका मिले। भिखारीनुमा पहनावा और हावभाव के माध्यम से वे अपनी क्लांति का प्रदर्शन करते थे। कुछ गिड़गिड़ाते थे, कुछ धिक्कारते थे और कुछ को जैसे गुस्से का दौरा पड़ जाता था, लेकिन न तो उनके गिड़गिड़ाने, न गुस्से और न ही मुरझाए हुए रूग्ण चेहरों ने मुझे उद्वेलित किया। मेरी परेशानी का कारण तो वे लोग थे जो उनके पास से गुजरते हुए नजरें फेर लेते थे।‘‘ असली समस्या उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रूखाबाद के कुलीनों का उदासीन रवैया था, जिसने झुग्गियों और झोपडि़यों को हटाकर उनके स्थान पर साफ-सुथरे आवास उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता का हरण कर लिया है।

कोई भी व्यक्ति नगर-गाँवों की मलिन बस्तियों की दशा देखकर बेहद व्यथित हो जायेगा और झल्लाहट में उसके मुख से गुस्सा तथा हाय निकलगी। जो कि ऐसी भी हो सकती है- ‘‘अगर कोई व्यक्ति खुले आसमान के नीचे खानाबदोश जैसी जिन्दगी बसर करे तो बुरा नहीं होगा। न ही इस बात का दुःख होगा कि कोई व्यक्ति मिट्टी की झोपड़ी में रह रहा है, लेकिन झुग्गी-झोपडी वाली बस्तियों से भय जरूर खायेगा। उसको इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि ये बस्तियाँ आर्थिक तंगी से बनी या फिर अन्य कारणों से।‘‘

अध्ययनों से ज्ञात होता है कि पहली पंचवर्षीय योजना-1951-1956 में रेखांकित किया गया कि झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियाँ देश पर धब्बा हैं.......राष्ट्र की दृष्टि से मानव जीवन और सम्पदा पर पड़ने वाले विध्वंसक प्रभाव को झेलने और बस्तियांे की बढ़ती कीमत को चुकाने के बजाय इन्हें हटाने का खर्च उठा लेना बेहत्तर है। 

पंचवर्षीय योजना के प्रावधानों के 6 दशक बाद भी स्थितियाँ सुधरने की बजाय बिगड़ी ही हैं। अब करीब 35 प्रतिशत जनता झुग्गी-झोपडियों में रहती है, जहाँ की विशेषता गंदगी, धूल, बीमारियों और खतरे हैं। इन बस्तियों में बड़ी संख्या में अबांछित तत्व घुसपैठ कर चुके हैं। इनमें नशीले पदार्थों का धंधा करने वाले, तस्कर और गुंडे-माफिया शामिल हैं। इन बस्तियों में रहने वाले शरीफ लोग भी बदनाम हो जाते हैं। 

गाँव से बड़ी संख्या में लोग स्थानीय परेशानियों के कारण शहरों की ओर रूख करते हैंै। जनपद के नगर-गाँवों में पंजीकृत तथा गैरपंजीकृत झुग्गी-झोपडि़यों में लाखों लोग रह रहे हैं। गाँव-नगर की झुग्गी-झोपड़ी व्यक्तियों के दिमांग पर अमिट छाप डालती है। ये व्यक्ति को प्रभावित करतीं हैं और व्यक्ति को बुरी तरह हिलाकर रख देतीं हैं। ये व्यक्ति का दिल बाँध देतीं हैं। इनका वर्णन किया जाना संभव नहीं। फर्रूखाबाद जनपद सहित देश-प्रदेशों के नगर-गाँवों के अधिकांश स्थानों पर ऐसी बस्तियाँ पायी जातीं हैं, जो असाधारण घनत्व और बेपनाह दरिद्रता तथा प्रदूषण की मार झेल रही हैं।

देश के नगरों एवं गाँवों को स्वच्छ एवं स्वस्थ्य बनाने का सपना भारतवासियों की सहभागिता के बिना पूरा नहीं हो सकता। अतः नागरिकों को संवेदनशील, ईमानदार एवं अनुशासित होना होगा। नगर के लिए अपनी आजादी एवं स्वच्छंदता का अंश त्याग कर योगदान करना होगा।

डाॅ.नीतू सिंह ,

पोस्ट डाॅक्टोरल फेलो, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग,

दिल्ली-110001