दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समिति की मेहनत लायी रंग

दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समिति की मेहनत लायी रंग

धुली व कटी हुई प्लास्टिक बोतलों के कचरे के आयात पर लगे प्रतिबन्ध में निभायी थी भूमिका

लखनऊ। प्लास्टिक कचरे के बोझ को कम करने के लिए, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के द्वारा धूली तथा कटी हुई प्लास्टिक बॉटल्स के आयात पर लगाये गये प्रतिबंध में पङ्क्षडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समिति ने भी अह्ïम भूमिका निभायी है। इस प्रतिबन्ध पर खुशी व्यक्त करते हुये मंच के अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने बताया कि 28,845 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा उत्तर प्रदेश में पाकिस्तान, बांग्लादेश इत्यादि देशों से आयातित हुआ था, जोकि किसी भारतीय राज्य द्वारा किया गया अधिकतम आयात है। उत्तर प्रदेश में कानपुर आईसीडी, पकवारा-मुरादाबाद आईसीडी, मूंदड़ा-आगरा और पनकी आईसीडी द्वारा आयातित किया गया है। भारतीय रिसाइकिलर्स और कपड़ा उद्योग अनैतिक रूप से प्लास्टिक बॉटल्स के कचरे को फ्लैक्स के रूप में पाकिस्तान बंगलादेश एवं अन्य देशो से आयात कर रहे थे, क्योंकि यह रीसाइक्लिंग के लिए स्थानीय स्तर पर उत्पादित प्लास्टिक कचरे को इकठ्ठा करने की तुलना में सस्ता था। मंत्रालय के खतरनाक पदार्थ प्रबंधन विभाग ने इसी माह इस विषय में एक अधिसूचना जारी की है। श्री शुक्ला ने बताया कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पूरा देश, प्लास्टिक कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण सिस्टम को मजबूत करने के तरीकों की तलाश में है। परंतु रीसाइक्लिंग और कपड़ा उद्योग अपने लाभ के लिए अन्य देशों से प्लास्टिक कचरे का आयात कर रहे थे। इम्पोर्ट सिस्टम में एक खामी (लूपहोल) के चलते भारतीय कंपनियां पेट बोतलों के कचरे को आयत एवं पुन:चक्रित करके विभिन्न उत्पादों के निर्माण में उपयोग करते थे। वे हर साल पीईटी बोतलों को रिसाइकिल करके सैंकड़ो तरह के उत्पाद जैसे; पॉलिएस्टर कारपेट, टी-शर्ट, एथलेटिक जूते, सामान, औद्योगिक स्ट्रैपिंग, ऑटोमोटिव पाट्र्स; सामान की रैक, फ्यूज बॉक्स, बंपर और डोर पैनल आदि का निर्माण करते थे और करोंड़ो की पूंजी कमा रहे थे। हालाँकि, हम मुनाफा कमाने वाले इन उद्योगों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि वे प्रोडक्ट्स मैन्युफैक्चरिंग में स्थानीय स्तर पर उत्पादित प्लास्टिक (पेट) कचरे को इकठ्ठा करें और उसका उपयोग करें, जिससे उनका व्यापार सुचारू रहे और वे देश को प्लास्टिक कचरा मुक्त बनाने में भी मदद कर सकें। श्री शुक्ला ने यह भी बताया कि हम अपने पर्यावरण की सुरक्षा में मंत्रालय के इस निर्णय की सराहना करते हैं। प्लास्टिक कचरे के संग्रह, पृथक्करण और पुनर्चक्रण के लिए बड़ी संख्या में मानव शक्ति की जरूरत है, जो अपशिष्ट प्रबंधन और रीसाइक्लिंग उद्योग में भारत भर में लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद करेगा। पीडीयूएसएम ने पर्यावरण मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पिछले कुछ महीनों में कई बार फ्लैक्स एवं लम्प्स के आयात प्रतिबंध पर चर्चा की। भारत ने अप्रैल18 से फरवरी19 के बीच पाकिस्तान, बांग्लादेश, कोरिया गणराज्य और अमेरिका आदि जैसे देशों से 99,545एमटी प्लास्टिक के गुच्छे और 21,801 एमटी प्लास्टिक की गांठ का आयात किया था। जिसमें से 55,000़ टन संयुक्त रूप से केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश से था। पीडीयूएसएम के महासचिव आनन्द मनी ने बताया कि, 'हमारा संगठन भारत को 'प्लास्टिक अपशिष्ट मुक्त राष्ट्र (प्लास्टिक वेस्ट फ्री नेशन) बनाने की दिशा में काम कर रहा है। हम पर्यावरण मंत्रालय के साथ काम कर रहे हैं ताकि हमारे दृष्टिकोण को आगे दिशा मिले साथ ही रैगपिकर्स समुदाय का उत्थान भी हो सके। रैगपिकर्स, भारतीय अपशिष्ट संग्रह और रीसाइक्लिंग क्षेत्र के नायाब नायक हैं, उनके बिना हमारे राष्ट्र की अपशिष्ट समस्या बहुत खराब होती। रैगपिकर्स कचरे को इकठ्ठा करने, छांटने, अलग करने और फिर इसे स्क्रैप डीलर व रिसाइकिलर्स को बेच कर गुजारा करते हैं। आयात प्रतिबंध के उपरांत, हमें जरूरत के स्थानीय नगर पालिका निकायों के साथ मिलकर काम करते हुए रैगपिकर्स, रिसाइकलर्स और अपशिष्ट प्रोसेसर को कचरे के संग्रह और प्रबंधन पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग बनाने की आवश्यकता है। प्लास्टिक रीसाइक्लिंग, वैश्विक रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका मूल्य वर्तमान में 317 बिलियन डॉलर है और लाखों लोग इसमें कार्यरत हैं। भारत में प्लास्टिक रीसाइक्लिंग की सही क्षमता का एहसास नहीं है, जबकि भारतीय पुनर्चक्रण उद्योग को सुव्यवस्थित करके रोजगार और राजस्व उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त अवसर हैं।