मुसलमान होने के लिए ज़रूरी है वहदानियत को दिल से मानना

मुसलमान होने के लिए ज़रूरी है वहदानियत को दिल से मानना

मेहदी अब्बास रिज़वी

हुसैन करबोबला की ज़मीन पर आये,

बचाने दीन को, इंसानियत शराफ़त को।

आज मुहर्रम की छठवीं तारीख़ हैं। जैसे जैसे दिन गुज़र रहे हैं करबला का वह ख़ूनी मंज़र दिलो दिमाग पर छाता जा रहा है जो 61 हिजरी में इन तारीख़ों में मुसलमानों ने नबी का निवासे और उनके घर वालों पर ढाया था। वह लोग ऐसा क्यों कर रहे थे इसे आज हम को सोंचना होगा, उस तर्ज़े अमल को अपनी ज़िन्दगी से ठोकर मार कर नहीं निकालें गे तो गोया हम इंसानी तक़ाज़ों के नकारने का काम करें गे।

आज मुसलमानों के हर तबके में एक दूसरे को इस्लाम से ख़ारिज करने की होड़ लगी है। आख़िर इस्लाम से ख़ारिज करने की क्या दलील है। मुसलमान तो सिर्फ़ अपनी ज़बान से कलेमात को जारी करने और अमल से पहचाना जाता है, उसके दिल में क्या है यह तो बस वह या अल्लाह जनता है।

मुसलमान होने के लिए ज़रूरी है वहदानियत ( अल्लाह का यकता होना ) को दिल से मानना, रसूल अल्लाह मोहम्मद मुस्ताफ़ा ( स) को आख़िरी नबी मानना, क़ुरआन को अल्लाह की नाज़िल करदा किताब मानना, क़्यामत पर ईमान रखना, जन्नत और जहन्नुम पर एतक़ाद रखना। अब किसी भी फ़िरके का कोई आलिम बताये कि यह बातें कौन मुसलमान नहीं मानता। फिर किसी को इस्लाम से ख़ारिज कैसे किया जा सकता है? मगर ऐसा हो रहा है और मैं इसे ग़ैर इस्लामी मनाता हूँ। अब तो लोग अपने ही फ़िरके के लोगों को उनकी जायज़ मांगों के जुर्म में इस्लाम से निकालने का फ़तवा जारी कर देते हैं, उन्हें मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से न सिर्फ़ रोकते हैं बल्कि मार पीट कर भगा भी देते हैं। आख़िर यह अख़्तियार उन्हें किस ने दिए? जब की ग़ैर इस्लामी अमल करने वालों के खिलाफ वह कुछ नहीं कहते , अगर वह पैसे वाला हुआ तो यही लोग उसके घर का चक्कर लगाते नहीं थकते।

कल मुझे एक साहब ने कहा कि आप मुसलमानों पर बहुत लिखते हैं, इससे इस्लाम बदनाम होता है, मैं ने उनसे कहा यह तो पहले दिन से हो रहा है तो क्या करूं। जो हज़ारों से साल से लोग कर रहे हैं या आज भी कर रहे हैं क्या उससे मुस्लमान का दामन साफ़ हो रहा है। ख़मोशी जुर्म की ताईद होती है तो मैं क्यों गुनाहगार बनूँ, हां जो मैं लिख रहा हूँ उसे आप रद्द करिये जनता ख़ुद फ़ैसला कर लेगी।

मुसलमान होना जैसे नहा धो कर साफ़ कपड़े पहनना, अब चाहे तो वह पलट जाये, चाहे मुसलमान हो कर इस्लाम को नुक़सान पहुंचाए या अपनी नीयत और अमल को इंसानी जामा पिन्हा कर मोमिन हो जाये। इस्लाम अलग है ईमान अलग है, मुस्लमान कोई भी हो सकता है मोमिन के लिए शर्त है कि उसके अमल से इस्लामी किरदार दिखाई दे। इसी लिए क़ुरआन में सारी न्यमतों का हक़दार मोमिनों को बताया गया है।

इस्लाम ने हुकूमत की बात कभी नहीं की, रिसालत से वफ़ादारी की बात की, रसूल ने कोई हुकूमत नही क़ायम की थी बल्कि रिसालत के उसूल को लोगों तक पहुंचाया था, ताकि लोग बेहतर इंसान बनें, मगर मुसलमानों ने दुनियां की हिरसो हवस के चलते हुकूमत में इस्लाम तलाश करना शुरू कर दिया और फिर धीरे धीरे वह रिसालत का दामन छोड़ कर हुकूमतों का वफ़ादार बन बैठा। राजा की मनमानी को इस्लाम मानकर इस्लाम का ही क़त्ल करने लगा। हर दौर में चालाक ( बुद्धिमान नहीं ) लोग रहे हैं, इसलिए उन्होंने बिकने वाले मुल्लाओं को दरबार में बिठा कर अपनी ग़लतियों को इस्लाम का रंग देना शुरू कर दिया और आज तक यह सिलसिला जारी है।

इमाम हुसैन ने इस के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की तो सुविधा भोगी लोग सामने आ गए, अपनी बदकारियों को इस्लाम का लिबादा उढ़ा कर उसे क़त्ल कर दिया जिस के लिए रसूले ख़ुदा ने फ़रमाया," हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हूँ " यानि हुसैन मेरी रिसालत की जीती जागती तस्वीर हैं और यही मेरी रिसालत को ता क़्यामत के लिए बादशाहों के ग़ैरा इस्लामी क़ैद से बाहर करें गे, बेशक इमाम हुसैन ने ऐसा ही किया। करबला के तपते हुए मैदान से तीन दिन की भूख और प्यास में यह पैग़ाम दिया की कोई भी वक़्त पड़े मगर इंसान को ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए मगर इस्लामी अहिंसा के उसूलों के तहत।

इस्लाम के उसूल इंसानों की भलाई और मदद के लिए हैं न की किसी पर ज़ोर ज़बरदस्ती और ज़ुल्म ढाने के लिए। पर शायद मुसलमानों की अक्सरियत इसे समझ न पाई, या समझना ही नहीं चाहा इसी लिए दुनियां में आतंकवाद का काला बदल छाया हुआ है, मैं मानता हूँ कि दहशतगर्दी सिर्फ़ मुसलमानों में ही नहीं है पर मुसलमानों में अगर ज़रा सी भी है है तो क्यों? इस्लाम तो क़ुर्बानी की तालीम देता है तो फिर बेगुनाहों का खून बहाना कहाँ से सीखा। इसका जवाब हमेशा कुतर्कों से दिया जाता है जो किसी को काबिले क़ुबूल नहीं होता।

इमाम हुसैन पर दहशत गर्दी का हर हरबा अपनाया गया, कभी लालच दी गई, कभी धमकाया गया, कभी जान से मारने की धमकी आई और कभी बच्चों को मारने की धमकी आई। मगर इमाम हुसैन अपने उसूलों से नही डिगे और अपनी औरतों, बच्चों और चन्द साथियों के साथ करबला के सुनसान बियाबान खुले मैदान में आ गए कि अब जो चाहे करो मगर मैं इस्लाम और रिसालत को क़यामत तक बचाऊँ गा।

यज़ीद अपने पुरखों की इस्लाम दुश्मनी का ख़ुल प्रदर्शन कर रहा था, फ़र्क़ इतना था कि उसके पुरखे इस्लाम के ख़ुल दुश्मन थे मगर यज़ीद इस्लाम का लबादा ओढ़ कर इस्लाम के ऊसूलों को रौंद रहा था, मगर मुसलमान रसूल के दर से दूर यज़ीद के दर की हड्डी चाट रहा था। अब ऐसे लोगो पर भरोसा करना गोया या बेहतर क़ौम मानना यज़ीद को इस्लामी ख़लीफ़ा मानना कितना दुरुस्त है यह आप फ़ैसला करें। वह हराम को हलाल कर रहा था, रसूल और ख़ुदा की तौहीन कर रहा था फिर भी मुसलमान उसे जायज़ रहनुमा मान रहे थे, इस्लाम आखरी साँसें ले रहा था तो नबी के गोद के पाले और वारिसे अम्बिया इमाम हुसैन ने उसका मुकाबला इस अंदाज़ में किया कि रहती दुनियां तक फिर कोई ऐसा न कर पाए गा, और तक क़्यामत इस्लाम ज़िंदां हो गया।

बेशक रसूल की आगोशे में पले उनके निवासे इमाम हुसैन ने अपना सब कुछ लुटा कर सब कुछ बचा लिया। और सच और झूठ को परखने की कसौटी दे दी। आज भी दुनिया उसी कसौटी पर ईमानो अमल को परख रही है, ज़ालिमपरस्त कुछ भी कर ले मगर कोई भी उसे इंसानी अमल क़रार नहीं देगा।