यह सारा विश्व हमारा है, पराया नहीं

यह सारा विश्व हमारा है, पराया नहीं

8 जून ‘विश्व महासागर दिवस’ पर विशेष लेख

प्रदीप कुमार सिंह

वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो शहर में हुए ‘पृथ्वी ग्रह’ नामक सम्मेलन में 172 सरकारों के जिसमें 108 राष्ट्राध्यक्षों ने भी भाग लिया था। इस सम्मेलन में ‘विश्व महासागर दिवस’ को मनाने का प्रस्ताव रखा गया था और दिसंबर, 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा द्वारा इस दिवस को 8 जून को मनाये जाने की आधिकारिक घोषणा के बाद से यह दिवस सारे विश्व में प्रत्येक वर्ष मनाया जाने लगा। ‘विश्व महासागर दिवस’ पर हर साल वैश्विक स्तर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं जिनसे महासागरों के विभिन्न पहलुओं के बारे में मानव जाति को अत्यन्त ही समाजोपयोगी जानकारियाँ मिलती हैं।

महासागर दुनियाभर के लोगों के लिए भोजन, मुख्य रूप से मछली उपलब्ध कराता है किंतु इसके साथ ही यह कस्तूरों, सागरीय स्तनधारी जीवों और सागरीय शैवाल की भी पर्याप्त आपूर्ति करता है। इनमें से कुछ को मछुआरों द्वारा पकड़ा जाता है तो कुछ की खेती पानी के भीतर की जाती है। सागर के अन्य मानव उपयोगों में व्यापार, यात्रा, खनिज दोहन, बिजली उत्पादन और नौसैनिक युद्ध शामिल हैं। वहीं आनंद के लिए की गई गतिविधियों जैसे कि तैराकी, नौकायन और स्कूबा डाइविंग के लिए भी सागर एक आधार प्रदान करता है। इसके अलावा समुद्र के भीतर शंख, मोदी, मूंगा, तेल, गैस, सीपी, शैवाल आदि हजारों ऐसी वस्तुएं पाई जाती है जिसका मानव दोहन करता है।

विश्व महासागर दिवस मनाने का प्रमुख कारण विश्व में महासागरों के महत्व और उनकी वजह से आने वाली चुनौतियों के बारे में विश्व में जागरूकता पैदा करना है। इसके अलावा महासागर से जुड़े पहलुओं जैसे -खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता, पारिस्थितिक संतुलन, सामुद्रिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग, जलवायु परिवर्तन आदि पर प्रकाश डालना है। हर साल विश्व महासागर दिवस में पूरे विश्व में महासागर से जुड़े विषयों में विभिन्न प्रकार के आयोजन किए जाते हैं, जो महासागर के सकारात्मक अैर नकारात्मक पहलुओं के प्रति जागरूकता पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, समुद्र में प्रदूषण का 80 प्रतिशत धरती पर निवास करने वाले लोगों से आता है। प्रतिवर्ष 8 मिलियन टन प्लास्टिक समुद्र में आता है जो कि भोजन के लिए कच्ची सामग्रियों, दवाओं के निर्माण, वन्य जीवन, मत्स्य पालन और पर्यटन के सर्वनाश का कारण बनता है। प्लास्टिक प्रदूषण से प्रतिवर्ष 1 मिलियन समुद्री पक्षी और 100,000 समुद्री स्तनधारियों को नुकसान पहुंचता है। प्लास्टिक प्रतिवर्ष सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र को 8 बिलियन अमेरिकी डालर का नुकसान पहुंचाता है।

विश्व महासागर दिवस समुद्र के अस्तित्व को बढ़ाने में मदद करता है और इस अद्भुत संसाधन को संरक्षित करने में मदद करने में अधिक भागीदारी को प्रेरित करता है, हम सभी इस पर निर्भर करते हैं। मुख्य क्रिया प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने और स्वस्थ महासागर के लिए समाधान को प्रोत्साहित करने पर केन्द्रित है। पृथ्वी के भूतलीय क्षेत्रफल का 70.92 प्रतिशत भू-भाग महासागरीय है। जबकि 29.08 प्रतिशत क्षेत्रफल पर महाद्वीप स्थित है। पृथ्वी पर सात महाद्वीप (1) एशिया, (2) यूरोप, (3) अफ्रीका, (4) उत्तरी अमेरिका, (5) दक्षिण अमेरिका, (6) आस्ट्रेलिया तथा (7) अन्टार्टिका एवं पांच महासागर (1) प्रशान्त महासागर (2) अटलांटिक महासागर, (3) हिन्द महासागर या इंडियन ओसियन एकमात्र महासागर है, जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है। (4) दक्षिणी महासागर तथा (5) पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में स्थित उत्तरी धु्रवीय महासागर या आर्कटिक महासागर,स्थित हैं।

पृथ्वी के समस्त जल का 88.9 प्रतिशत भाग महासागर व अन्तर्देशीय समुद्रों के रूप में विस्तृत है। शेष 11.1 प्रतिशत हिमनद, नदी, तालाब, झील एवं भूमिगत जल है। इसलिए अन्तरिक्ष से पृथ्वी बड़ी ही आकर्षक नीले तथा सफेद रंग की दिखाई देती है। पृथ्वी पर जहां जहां जमीन है वहां हमें ग्रीन कलर जो कि पेड़ पौधों के हरी लाइट की रिफ्लेक्शन की वजह से होता है। और जहां रेगिस्तान है वहां भूरे रंग और बादलों की वजह से कहीं कहीं सफेद रंग नजर आते हैं। ध्रुवों के पास बर्फ की चादर की वजह से वहां पर भी सफेद रंग ही दिखाई देता है। लेकिन कुल मिलाकर समुद्र की विशालकायता और फैलाव की वजह से पृथ्वी हमें अंतरिक्ष से नीली दिखाई देती है। इसीलिए पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहते हैं।

समुद्री प्रदूषण तब होता है जब रसायन, कण, औद्योगिक, कृषि और रिहायशी कचरा, शोर या आक्रामक जीव महासागर में प्रवेश करते हैं और हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। समुद्री प्रदूषण के ज्यादातर स्रोत थल आधारित होते हैं। समुद्री प्रदूषण का काफी लंबा इतिहास रहा है, लेकिन इससे निपटने के लिए सार्थक अंतर्राष्ट्रीय कानून बीसवीं सदी में ही बनाए गए। 1950 के दशक की शुरूआत में समुद्र के कानून को लेकर हुए संयुक्त राष्ट्र के कई सम्मेलनों में समुद्री प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की गई। ज्यादातर वैज्ञानिकों का मानना था कि महासागर इतने विशाल हैं कि उनमें विरल करने की अपार क्षमता है और इसलिए प्रदूषण हानिरहित हो जाएगा।

समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में प्रदूषण के रास्तों के वर्गीकरण और परीक्षण करने के विभिन्न तरीके हैं। आम तौर पर महासागरों में प्रदूषण के तीन रास्ते हैं। महासागरों में कचरे का सीधा छोड़ा जाना, बारिशों के कारण नदी नालों से और वातावरण में छोड़े गए प्रदूषकों से। प्रदूषक नदियों और सागरों में शहरी नालों और औद्योगिक कचरे के निस्सरण से सीधे प्रवेश करते हैं, कभी-कभी हानिकारक और जहरीले कचरे के रूप में भी। ये जहाज जलमार्गों और महासागरों को कई तरह से प्रदूषित करते हैं। तेल रिसाव के कई घातक नतीजे हो सकते हैं। यह कई सालों तक तलछट और समुद्री वातावरण में बने रहते हैं। मालवाहक जहाजों द्वारा कूड़ा-कबार का छोड़ा जाना बंदरगाहों, जलमार्गों और महासागरों को प्रदूषित कर सकता है। कई बार पोत जानबूझ कर अवैध कचरे को छोड़ते हैं बावजूद इसके कि विदेशी और घरेलू नियमों द्वारा ऐसे कार्य प्रतिबंधित हैं। अनुमान लगाया गया है कि कंटेनर ढोने वाले मालवाहक जहाज हर साल समुद्र में दस हजार से ज्यादा कंटेनर समुद्र में खो देते हैं (खासकर तूफानों के दौरान)। जहाज ध्वनि प्रदूषण भी फैलाते हैं जिससे जीव-जंतु परेशान होते हैं।

प्रदूषण के फैलने का एक और जरिया है वातावरण। धूल, कूड़ा-करकट, पालीथीन के लिफाफे हवा के साथ बहकर जमीन से समुद्र की और बढ़ते हैं। जलवायु परिवर्तन महासागरों के तापमान को बढ़ा रहा है जो वातावरण में कार्बन डायआक्साईड के स्तर को बढ़ा रहा है। कार्बन डायआक्साईड के ये बढ़ते स्तर महासागरों को अम्लीय बना रहे हैं। परिणामस्वरूप ये जलीय पारिस्थितिक तंत्र को बदल रहा है और मछलियों के वितरण को परविर्तित कर रहा है और ये मछली के कारोबार के बने रहने और उन समुदायों की जो इससे अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं उन्हें प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए स्वस्थ्य महासागरीय पारिस्थितिक तंत्र का होना जरूरी है।

ज्यादातर मानवजनित प्रदूषण समुद्र में प्रवेश करता है। मानवजनित प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की जैव-विविधता और उत्पादकता को घटा सकता है, जिससे मानव के समुद्री भोजन संसाधन कम और खत्म हो सकते हैं। प्रदूषण के इस समग्र स्तर को कम करने के दो तरीके हैं या मानव जनसंख्या घटा दी जाए, या फिर एक आम इंसान द्वारा छोड़े गए पारिस्थितिक पदचिह्नों को कम करने का रास्ता खोजा जाए। अगर ये दूसरा रास्ता नहीं अपनाया गया तो फिर पहला रास्ता चुनना पड़ सकता है, क्योंकि दुनिया के पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहे हैं। दूसरा रास्ता मनुष्यों के लिए है कि वो व्यक्तिगत तौर पर कम प्रदूषण फैलाएं। इसके लिए सामाजिक और राजनीतिक इच्छा की जरूरत है। साथ ही जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है ताकि ज्यादा लोग पर्यावरण की इज्जत करें और इसे कम हानि पहुंचाए। परिचालन स्तर पर, नियम और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकारों के हिस्सा लेने की जरूरत है।

समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करना अक्सर मुश्किल होता है क्योंकि प्रदूषण अंतर्राष्ट्रीय सरहदों को लांघता है, जिससे नियम बनाना और उन्हें लागू करना कठिन होता है। कदाचित समुद्री प्रदूषण को कम करने का सबसे महत्वपूर्ण सशक्त माध्यम शिक्षा है। ज्यादातर लोग स्रोतों और समुद्री प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों से अनजान हैं और इसलिए इस स्थिति से निपटने के लिए कम कदम ही उठाए जा सके हैं। जनता को सभी तथ्यों की जानकारी देने के लिए, गहन शोध की जरूरत है ताकि स्थिति का पूरा ब्यौरा दिया जा सके। और फिर इस जानकारी को जनता तक सशक्त माध्यम शिक्षा के द्वारा बाल एवं युवा तक पहुंचाना चाहिए।

समुद्र के भीतर अचानक जब बड़ी तेज हलचल होने लगती है तो उसमें तूफान उठता है जिससे ऐसी लंबी और बहुत ऊंची लहरों का रेला उठना शुरू हो जाता है जो जबरदस्त आवेग के साथ आगे बढ़ता है, इन्हीं लहरों के रेले को सूनामी कहते हैं। दरअसल सूनामी जापानी शब्द है जो सू और नामी से मिल कर बना है सू का अर्थ है समुद्र तट और नामी का अर्थ है लहरें। सूनामी लहरों के पीछे वैसे तो कई कारण होते हैं लेकिन सबसे ज्यादा असरदार कारण है भूकंप। इसके अलावा जमीन धंसने, ज्वालामुखी फटने, किसी तरह का विस्फोट होने और कभी-कभी उल्कापात के असर से भी सूनामी लहरें उठती हैं। सूनामी लहरें समुद्री तट पर भीषण तरीके से हमला करती हैं और जान-माल का बुरी तरह से नुकसान करती हंै।

वैश्विक स्तर की विभिन्न शोधों के अनुसार धरातल का औसत ग्लोबल तापमान 21वीं शताब्दी के दौरान और अधिक बढ़ सकता है। सारे संसार के तापमान में होने वाली इस वृद्धि से समुद्र के स्तर में वृद्धि, चरम मौसम में वृद्धि तथा वर्षा की मात्रा और रचना में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के अन्य प्रभावों में कृषि उपज में परिवर्तन, समुद्र व्यापार मार्गों में संशोधन, ग्लेशियर का पिघलना, प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा आदि शामिल हैं। धरती के गर्म होने से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होने से निचले स्तर पर बसे देशों केे डूबने का खतरा बढ़ रहा है।

महासागरों के बढ़ते प्रदुषण, सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं तथा ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ किसी राष्ट्र विशेष की समस्या न होकर मानव जाति के लिए एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बन गया है। प्राकृतिक आपदाओं तथा ग्लोबल वार्मिंग का दुष्प्रभाव धरती पर पल रहे हर जीव प्राणी को प्रभावित कर रहा है। इसलिए प्राकृतिक आपदाओं तथा ग्लोबल वार्मिंग पर अब केवल विचार-विमर्श के लिए बैैठकें आयोजित नहीं करना है वरन् अब उसके लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है, अन्यथा बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर जीवन के अस्तित्व को ही संकट में डाल देंगे। अतः जरूरी हो जाता है कि विश्व का प्रत्येक नागरिक प्राकृतिक आपदाओं तथा ग्लोबल वार्मिंग की समस्याओं के समाधान हेतु अपना यथाशक्ति अपने देश की सरकारों का ध्यान आकर्षित करें।

विश्व भर में महासागरों के प्रदुषण तथा ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एक मंच पर आकर तत्काल एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के अन्तर्गत विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के गठन पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाना चाहिए। ग्लोबल विलेज के युग में महासागर की तरह अपना हृदय विशाल करके राष्ट्रवाद का विस्तार करके उसे विश्ववाद का स्वरूप देने का यह सबसे उचित समय है। अभी नहीं तो फिर कभी नहीं।

पता- बी-901, आशीर्वाद, उद्यान-2 एल्डिको, रायबरेली रोड, लखनऊ-226025