आज का समय और साहित्यकारों का कर्तव्य

आज का समय और साहित्यकारों का कर्तव्य

आज के क्रम को देखते हुए इस उहापोह भरी जिन्दगी में हम सबको एक नज़र डालनी ज़रूरी लगती है। समय-समय पर हुए परिवर्तन, विज्ञान की प्रगति ने तो सोशल मीडिया से हमें जोड़ दिया है, इस बात को लेकर एक ओर दृष्टि पड़ी तो आज भी हम भू्रण हत्या, बलात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी मंहगाई की चपेट से लिप्त हैं।

हमारा ध्यान इस ओर इंगित कराना है कि यदि समाज को बदलना है तो हमें अपनी कलम उठानी पड़ेगी, जिससे कि हम समाज को अमिट मुकाम दे सकें । साहित्य ही एक ऐसा माध्यम है कि हम समाज तक अपनी बात को रख सकते हैं। कविता के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने में सफल हो सकते हैं। वर्तमान समय में हमें कुछ ऐसी विसंगतियों से जूझना पड़ रहा है जिससे हम उबर पाने में उतने सक्षम नहीं हुए। कबीर को एक समाज सुधारक कहा गया जिन्होंने सारे भेदभाव को त्याग कर अपने दोहों के माध्यम से समाज को बदला। एक किया ।

हम सभी रचनाकारों का एक कर्तव्य है कि हमें अपनी कलम से इस प्रकार की रचना करनी होगी तो समाज का उद्धार कर सकें, समस्या से उबर सकें। जिससे हम समाज को बदलें।

आज भी महिलाओं के साथ जघन्य अपराध हो रहे हैं। एक शिक्षित महिला भी घर में पति द्वारा प्रताड़ित की जाती हैै। घर के भार को संभालती हुुई वो परिवार के सारे दायित्व को बखूबी निभाती है। कहीं-कहीं तो वह आत्महत्या तक लेती है । आखिर क्या? यह प्रश्न हम सबके लिए उंगली उठाता है ।क्यो...? हम आज भी इन अपराधों के शिकार हो रहे हैं । छोटी -छोटी मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार हो जाता है और वो दम तोड़ देती है। समाचार पत्रों के हर दूसरे पन्ने पर हम नित-प्रतिदिन बलात्कार की ख़बर पढते हैं।

हमें इस बात के लिए गम्भीर होना पड़ेगा, सुधि कविता करनी होगी । आज लड़कियों की समाज में कमी होती जा रही है। भ्रूण हत्या जैसी चीजों को हम नकार नहीं सकते । हमारे हर घर में ये रोशनी होनी चाहिए। क्यो? हम अपनी बच्चियों को गर्भ में ही सुला देते हैं -

एक आह निकली

माँ मुझे बचाओ

होठों से लगाओं

खिलौनों के रंग गिनाओं

अधिकार मांगती हूं मैं

तुम्हारी अंश का टुकड़ा हूं

तो, मुझे पृथ्वी पर आने दो

मुझे औजारों में न सुलाओ

भविष्य की शिला को रखने वाली नारी आज दर-बदर लड़खड़ा क्यों रही है। सुरक्षित क्यों नहीं ? न तो स्कूल में, न ही समाज में उस स्थान पर जहां उसे उठना -बैठना व आगे बढ़ना है। बेरोजगारी की साख बढ़ती जा रही है। युवाओं का पढ़ा-लिखा तबका किसी तरह भरे फार्म से यह आशा लगाता है कि मुझे नौकरी मिलेगी और हम अपना जीवन निर्वहन करेंगे लेकिन हाथ, आज नियुक्तियां निरस्त की गयीं। जिससे ज्यादातर युवा मानसिक पीड़ा का शिकार हो जाते हैं।

लिख रही हूं इबारत, ज्ञान शरमा रहा।

बेरोजगारी का नाग, अब डसा जा रहा ।।

हमें उसी काव्य को लिखना होगा जो समाज को अग्रिम रास्ता दिखा सके । पेड न्यूज़, पेड गद्य-पद्य से बचना होगा । आजादी की अलख भी साहित्य ही लिख कर जगाई गयी थी

तो! जाग जाओ, मीत मेरे, गीत अधूरा है।

कलम से, टपके आंसू, सपना नहीं पूरा है।।

समाज में जगह -2 भ्रष्टाचार है जिसे हम मिटा पाने सक्षम नहीं हो पा रहे हैं क्या साहित्कारों की कलम भी बहक गयी है। सच्ची घटनाओं को उजागर नहीं कर पा रही , कही तो साहित्यकारों को इस बात का भय है कि उन्हें अपनी जान तक गंवानी पड़ सकती है, क्या साहित्य भी सो गया है । जो बेबाक़ कलम सत्ता के तख्ते को पलट देती थी वो आज घबरा रही है। आखिर क्यां? छोटे से लेकर बड़े सफेदपोश जघन्य अपराध करते है लेकिन वो ढील -मौल से समाज में अपराध को और बढ़ाववा मिल रहा है । मानवीयता का ह्रास हो रहा है । लोक परम्परा, लोक साहित्य का गला घुटता जा रहा है और पाश्चात्य संस्कृतियों केें कृत्रिम ढांचे में साहित्य की दीवारें खड़ी हो रही हैं जिनके काले -झरोखे नये -नये करतब दिखा रहे हैं। क्यों साहित्य मौन है? क्यो कविता बिक रही है? आखिर शब्द मौन रहकर भी सब कुछ कह डालते है, न। आखिर साहित्य क्या ? समाज का दर्पण नही रह गया है।

चंद शब्दों में अपनी बात को समेटती हूं कि हमें अपनी कर्तव्य परायणता को याद रखना होगा इन्ही शुभ कामनाओं के साथ!

अलका अस्थाना

कवि व साहित्यकार

9307197756, 8934884441