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व्यक्ति तब तक आज़ाद है जब तक वह दूसरे की आज़ादी का हनन नही करता: डाॅ0 अम्मार रिज़वी

लखनऊः यह शब्द डाॅ0 अम्मार रिज़वी, पूर्व कार्यकारी मुख्यमंत्री जी, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय, लखनऊ में आयोजित एक द्विवसीय विशेष व्याख्यान पर कहे गये जिसका शीर्षक "Role of Universities in Protecting Rule of Law & Human Rights" था। यह व्याख्यान विश्वविद्यालय परिसर में दिनांक 14 दिसम्बर, 2017 को पूर्वान्ह् 11ः00 बजे से 01ः00 बजे तक विश्वविद्यालय के शैक्षणिक भवन के दीक्षान्त हाॅल मंे आयोजित किया गया। वह कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में सभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि विद्यार्थियों में विधिसंगतता जागृत करने तथा उन्हें मानव अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय की है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का अर्थ किसी ईंट गारे की इमारत से नहीं है अपितु इसकी पहचान इसके शिक्षकों एवं विद्यार्थियों से है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस पहचान को बनाने की जिम्मेदारी सभी शिक्षकों को लेनी चाहिए। अपने सम्बोधन का अन्त उन्होंने भगवत गीता की कुछ पंक्तियों के साथ किया जिसके द्वारा उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि सभी धर्म केवल मानवता की ही प्रचार करते हैं। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एस0एस0 उपाध्याय, राज्यपाल/कुलाधिपति के विधिक सलाहकार रहे। कामेश शुक्ला, अपर विधिक सलाहकार, राज्यपाल/कुलाधिपति तथा प्रो0 शारिब रूदौलवी विशेष अतिथि के रूप में कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।

विख्यात वक्ताओं और विशिष्ट अतिथियों का स्वागत करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 माहरूख़ मिर्ज़ा ने कहा कि शिक्षकों और छात्रों के लिए शिक्षा प्रणाली के नियम और कानून को समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। साथ ही उन्होंने कहा कि इस विशेष व्याख्यान को आयोजित करने का उद्देश्य कानून, प्रशासन और मानव अधिकारों के समकालीन ज्ञान से अकादमिक संकाय को समृद्ध करना है।

अपने वक्तव्य में एस0एस0 उपाध्याय ने कई संस्कृत श्लोकों का उल्लेख किया जिसमें राजाओं और शासकों के शासनकाल में भी Rule of Law के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय समाज सदैव धर्म की राह पर चलता रहा है जिसमें धर्म का आशय सही और गलत में फर्क करना है। उन्होंने कहा कि Rule of Law से समाज में सामान्य मूल्यों की स्थापना की जा सकती है। उन्होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि वह छात्रों में आन्तरिक अनुशासन की भावना जागृत करें, जिसके बाद बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता नहीं रहेगी। श्री कामेश शुक्ला ने अपने उदबोधन में मानव अधिकार के विकास की चर्चा करते हुए बताया कि मानव अधिकार और मानविक मूल्य भारतीय संस्कृति की धरोहर है।

प्रो0 शारिब रूदौलवी ने अपने सम्बोधन में कहा कि विश्वविद्यालय छात्रों को उनके अधिकारों कर्तव्यो और देश के कानून की प्रासंगिकता के प्रति जागरूक बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जागरूक और सक्रिय छात्र ही बेहतर समाज का निर्माण कर सकता है।

कार्यक्रम का आयोजन डाॅ0 नीरज शुक्ल तथा संचालन दोआ नक़्वी ने किया। कार्यक्रम में सोमेश शुक्ला, प्रदीप कपूर, फुरक़ान बेग, डाॅ0 अवधेश त्रिपाठी, डाॅ0 अशोक दुबे, प्रो0 एम0एस0 नक़्वी, डाॅ0 अन्जुम अबरार, मुर्तज़ा हसनैन, रज़ा हसन, वक़ार रिज़वी, डाॅ0 नैय्यर जलालपुरी, डाॅ0 हारून रिज़वी, प्रो0 मनोज पाण्डेय तथा विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक उपस्थित रहे।

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