स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत बनाने के लिए कर्तव्यों की पूर्ति और संस्कृति की रक्षा

स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत बनाने के लिए कर्तव्यों की पूर्ति और संस्कृति की रक्षा

(राष्ट्रीय युवा दिवस - स्वामी विवेकानन्द जी की जयन्ती 12 जनवरी पर विशेष)

डॉ हरनाम सिंह

विश्व का सबसे प्राचीन देश भारत जहाँ असंख्य महापुरूषों ने समय-समय पर जन्म लेकर दुनियाँ की उन्नति और सभी मनुष्यों के कल्याण हेतु कार्य किया। मानव मात्रा की सुख-शन्ति-समृद्धि के लिए जीवन भर प्रयत्न करने वाले हम सबके प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानन्द का ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ स्मरणीय है। उन्होंने एक बार कहा था कि ओ माँ जब मेरी मातृभूमि गरीबी में डूब रही हो तो मुझे नाम और यश की चिन्ता क्यों हो? हम निर्धन भारतीयों के लिए यह कितने दुःख की बात है कि जहाँ लाखों लोग मुट्ठी भर चावल के अभाव में मर रहे हों, वहाँ हम अपने सुख-साधनों के लिए लाखों रूपये खर्च कर रहे हैं। भारतीय जनता का उद्धार कौन करेगा? कौन उनके लिए अन्न जुटायेगा? मुझे राह दिखाओ माँ कि मैं कैसे उनकी सहायता करूँ? विवेकानन्द के देश में आज भी लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहें हैं। अशिक्षा-अज्ञानता से ग्रस्त लोगों की संख्या भी करोड़ों में है। दरिद्रनारायण के उन्नयन पर कोई खर्च नहीं करना चाहता लेकिन धर्मस्थल या अपनी जातीय समाज के भवन बनाने में लोगों की बड़ी दिलचस्पी देखी जा रही है। ऐसे समय में निर्धन वर्ग से नैतिकता या धर्म -कर्म की बातें करना बेमानी प्रतीत हो रहा है। विवेकानन्द ने गरीबी के मर्म को समझा था। इसलिए कहते थे ‘पहले रोटी, फिर धर्म’। जब लोग भूखों मर रहे हों तब उनमें धर्म की खोज करना मूर्खता है। भूख की ज्वाला किसी भी मतवाद से शांत नहीं हो सकती। जबतक तुम्हारे पास संवेदनशील हृदय नहीं, जबतक तुम गरीबों के लिए तड़प नहीं सकते, जब तक तुम उन्हें अपने शरीर का अंग नहीं समझते, जब तक तुम अनुभव नहीं करते कि तुम और सब, दरिद्र और धनी, संत और पापी उसी एक असीम पूर्ण के जिसे तुम ब्रह्म कहते हो, अंश है, तब तक तुम्हारी धर्म चर्चा व्यर्थ है।

हम गर्व से कहतें है की उस देश के है जहाँ स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरूष हुए। सामान्य नागरिकों में भी कर्तव्यों से अधिक अधिकारों की चिता बढ़ गयी है। सम्भलने के बजाय और बिगड़ने की ओर बढ़ने में विश्वास करने लगें है। मर्यादाओं का टूटना, संवेदनशीलता का समाप्त होना, प्रामाणिकता के प्राण निकलना, नेताओ में नैतिकता का लुप्त होना, तपस्या के बदले तिकड़म को सम्मान, युवाओं में बेरोजगारी । आखिर ये स्वामी विवेकानन्द के देश में क्या इंगित कर रहा है? हवालात के लोग जनमंदिरों में पहुँच रहे है, और देश मौनपूर्वक देख रहा है? मन में मलिनता-संवादो में अश्लीलता, हास्यों के नाम पर फुहड़ता, संबधों में साजिश, संवैधानिक संकटो का अंबार, संस्थाओं पर होते प्रहार, विश्वास का संकट और गहराती नैराश्यता, राष्ट्रीय सम्पत्तियों से दुराव, निजी संपत्तियों से भारी लगाव आदि सभी यक्ष प्रश्न बनकर खड़े हैं। कौन देगा इनका समाधान, मानो स्वामी विवेकानन्द का देश पूछ रहा है? मनुष्य आज संवेदनाहीन चारित्रिक पतन के कारण धरती के सीमित साधनों से असीमित प्रगति कर लेना चाहता है। सामान्य आदमी भी भूल रहा है कि धन तो साधन है साध्य तो मानव-मात्रा का कल्याण है।

पश्चिमी विकास-माडल ने इतने अधिक यक्ष प्रश्न पैदा कर दिये है कि इनका उत्तर मिलना असंभव सा हो गया है। सम्पूर्ण विश्व भारत की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है। भारतीय अवधारणात्मक संरचना और व्यवहारमूलक मान्यताओं द्वारा ही वैश्विक समस्याओं का समाधान संभव है। जिस भारत को विश्व ने ‘सोने की चिड़िया’ कहा था। जिस भारत ने ज्ञान-विज्ञान के द्वारा सम्पूर्ण विश्व को अवलोकित किया था। वह परिवार संस्था आज धीरे-धीरे टूट रही है। परिवार द्वारा ही व्यक्ति एक आदर्शोन्मुख जीवन जीता हुआ, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ काल में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता हुआ, राष्ट्र के लिए समर्पित नागरिक होता था। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘कृणवन्तो विश्वार्यम’ को लेकर चलने वाला भारत दिगभ्रमित सा प्रतीत हो रहा है। वर्तमान इन्टरनेट के दौर में, बदहाली में कोई कमी नहीं आई है। गरीब से गरीब के पास भी मोबाइल हो सकता है, लेकिन उसकी बदहाली का क्या ?ै। बेरोजगारी, भूख, छुआ-छूत, अशिक्षा, अंधविश्वास, सामंतिमनोवृत्ति, राष्ट्रविरोधी प्रवृत्ति आदि अनेक बुराईयों से ग्रस्त, भारतीय समाज को एक बार फिर स्वामी विवेकानन्द के विचारों से रूबरू होने का समय आ गया है। हमें अतित को निहारते हुए ही भविष्य का सफर तय करना होगा। क्योंकि उनका कहना था “मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूँ, न तो संत या दार्शनिक ही हूँ। मैं तो गरीब हूँ और गरीबों का अनन्यभक्त हूँ। मैं तो सच्चा महात्मा उसे कहूँगा जिसका हृदय गरीबों के लिए तड़पता हो।” सम्पूर्ण विश्व में हिन्दू धर्म का पुनरूद्धार तथा भारत की प्रतिष्ठा स्थापित करने एवं अपने जीवंत विचारों के लिए ही विवेकानन्द युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। युवाओं से कहते थे कि “अपने पुट्ठे मजबूत करने में जुट जाओ। वैराग्य वृत्ति वालों के लिए त्याग-तपस्या उचित है। लेकिन कर्मयोग के सेनानियों को चाहिए विकसित शरीर, लौह माँस-पेशियाँ और इस्पात के स्नायु” । तरुण मित्रों को सम्बोधित करते हुए कहा “शक्तिशाली बनों! तुम्हारे स्नायू और माँसपेशियाँ अधिक मजबूत होने पर तुम गीता अच्छी तरह समझ सकोगे। शरीर में शक्तिशाली रक्त प्रवाहित होने पर श्रीकृष्ण के तेजस्वी गुणों ओर उनकी आपार शक्ति को हृदयंगम कर पाओगे।” समाज में व्याप्त छुआ-छूत की भवना को देखकर वे आहत होकर कहते थे “मैं भारतीय हूँ और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है। भूलकर भी किसी को हीन मत मानो चाहे वह कितना भी अज्ञानी, निर्धन या अशिक्षित क्यों न हो और उसकी वृत्ति भंगी की ही क्यों न हो। क्योंकि हमारी-तुम्हारी तरह वे सब भी हाड़-माँस के पुतले हैं ओर हमारे बंधु-बांधव हैं।”

यह मान लेना कि युवाकाल मौजमस्ती का काल होता है बहुत बड़ी नादानी और मूर्खतापूर्ण सोच है। युवा पीढ़ी को गुमराह करने की साजिश है। विवेकानन्द के जीवनवृत्ति को देखें तो हम कह सकते हैं कि एक युवक अगर ठान ले तो वह अपने जीवन को नरेन्द्रनाथ से विवेकानन्द में तबदील कर सकता है। युवा पीढ़ी के नायक रूपहले पर्दे के नकली हीरो नहीं हो सकते। उसे नायक तलाश करना है तो पीछे मुड़कर देखना होगा। अतीत के पन्ने खंगालकर इतिहास से गुजरना होगा। भारत को भारत बनाने में युवा पीढ़ी का महती योगदान रहा है। विवेकानन्द के सपनों का भारत बनाने का दायित्व हम सबका है। 11 दिसम्बर, 1893 को शिकागो पार्लियामेन्ट ऑफ रिलीजियंस में भारत के विचार की रचनात्मक एवं सकारात्मक व्याख्या कर भारत के वास्तविक स्वरूप, ज्ञान और हिन्दू धर्म से सम्पूर्ण विश्व को अवगत कराया। भारत के मूल दर्शन को विज्ञान और आध्यात्म, तर्क और आस्था के तत्वों की कसौटी पर कसते हुए आधिनिकता के साथ इनका सामंजस्य स्थापित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर वेदान्त को जीवन-दर्शन के रूप में न मानकर एक धर्म के रूप में स्वीकार किया जाता है तो यह सार्वभौमिक धर्म है समग्रमानवता का धर्म। इसे हिन्दूत्व के साथ इसलिए जोड़ा जाता है, क्योंकि प्राचीन भारत के हिन्दूओं ने इस अवधारणा की संकल्पना कर एक विचार के रूप में प्रस्तुत किया है। पश्चिम जगत की यात्रा के बाद भारत में आध्यात्मिकता का संदेश फैलाया।

उनका स्पष्ट मानना था कि भारतीय विकास माडल जो भारतीय जीवन मूल्यों के प्रकाश में समाज की आवश्यकता-आकांक्षा, सामाजिक-आर्थिक परिवेश में प्राकृतिक संसाधनों, स्वयं की शक्ति-सामर्थ्य एवं कौशल-स्तर को ऊँचा उठाते हुए सार्वजनिक सुख में वृद्धि है। भारतीय अवधारणा के अनुसार मनुष्य आर्थिक से कहिं अधिक व्यापक सामाजिक कल्याण का वाहक है। मनुष्य अर्थ का दास नहीं वरन् उसका स्वामी है। भारतीय चिन्तकों ने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को पुरुषार्थ माना है। केवल अर्थ ही सब कुछ नहीं है। सर्वप्रथम धर्म है-मानव मात्रा का कल्याण। भारतीय मनोवृत्ति संघर्ष की नहीं वरन् सहयोग की होती है। हमें एक ऐसा सामाजिक, आर्थिक संरचना विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जिसमें धन और धर्म भौतिकता एवं आध्यात्मिकता, संचय एवं त्याग एवं सार्वजनिक हित आदि अनेक बातों के बीच उचित समन्वय स्थापित कर सकें। भारतीय दर्शन व्यावहारिक धरातल पर सर्वव्यापक अवधारणा है जो विश्व कल्याण के लिए है। यह नर को नारायण बनाने की ओर प्रवृत्त करता है। वर्तमान की आवश्यकता है नैतिक एवं मानवीय मुल्यों को आर्थिक क्षेत्रा में क्रियान्वित करने की जिससे नयी दृष्टि कोण एवं दिशा मिल सके।

स्वामी जी के अनुसार कर्तव्यों एवं अधिकारों के सार्वभौमिक आदर्श का पालन करना ही सच्ची नैतिकता है जो किसी समाज के स्थायीत्व और दृढ़ता के लिए आधार का काम करती है। स्वामी जी के विचार से कर्म पर मानव का अधिकार है और कर्म के द्वारा ही व्यक्ति अपने समाज को एवं सामाजिक परिवेश को बचा सकता है। जिस समाज में सभी अपने कर्तव्यों का निर्वहन सुचारू रूप से करते हैं वह समाज अपना उत्थान स्वयं ही कर लेता है । ‘उठो जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व मत रूको’ से प्रेरणा लेकर आवश्यकता है देश समाज को कमजोर करने का प्रयत्न करने वाली शक्तियों के विरूद्ध जागृत होकर राष्ट्रीय एकता, संस्कृति एवं पहचान के सशक्तिकरण व संरक्षण हेतु सभी प्रकार से प्रयत्न की। स्वयं जागे समाज को जगाये, देश-संस्कृति को बचाये ताकि आने वाली पीढ़ी को हम महान भारत समृद्ध भारत का संदेश दे सकें। वर्तमान युवा पीढ़ी पर निर्भर है कि वह कौन सा विकल्प चुनते हैं, क्योंकि हमारा आकलन इस बात से नहीं होगा कि हम क्या कहते हैं, बल्कि इस बात से होने वाला है कि हम समाज ओर देश हित में क्या करना चाहते हैं। जरूरत है कि जिस तरह बंकिम-दयानन्द- विवेकानन्द से लेकर गांधी-अम्बेडकर तक की परम्परा ने जिस क्रांति का सृजन किया था उसी तरह एक प्रबल नैतिक-बौद्धिक आन्दोलन के सृजन की प्रबल इच्छा शक्ति से युक्त, हीनता, कुंठा और पलायन के भावों से मुक्त होकर संगठित सज्जन शक्तियों के द्वारा ही भारत पुनः अपनी खोयी प्रतिष्ठा प्राप्त कर विश्वगुरू के सिंघासन पर आरूढ़ होगा। यदि विवेकानन्द पुनः इस धरा पर आये तो भी नई चुनौतियों का सामना करना होगा। तब घर के संस्कारों को बाहर दूर तक फैलाना था और आज पहले घर में घुसे कुसंस्कारों को हटाना होगा। विवेकानन्द ने एक बार कह था कि मुझे 100 युवा मिल जायें तो मैं नव-राष्ट्र निर्माण कर सकता हूँ। परन्तु तब उन्हें इतने युवा नहीं मिले, केवल एक भगिनि निवेदिता मिलीं। पर वर्तमान में पूछा जाय तो कई लाख लोग कहते मिल जायेंगे कि यदि तब हम होते तो उनका साथ देते। ऐसों के लिए यह जरूरी नहीं है कि विवेकानन्द के सपनों का भारत बनाने के लिए पुनः उनके आगमन की। आवश्यकता है उस संकल्प की और उनके दिखाये मार्ग पर चलकर अपनी कर्तव्यों की पूर्ति और संस्कृति की रक्षा की। देश का विकास तो नागरिकों, समाजसेवियों, सामाजिक संस्थाओं ओर उनके संकल्पों के साथ जन-जन के जुटने से ही संभव है। जरूरत है राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत युवाओं की टोली रात-दिन मस्ती में ध्येय-लक्ष्य को सामने रखकर जुटे रहे। कालजयी, राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवन के धनी स्वामी विवेकानन्द के भारत में सामूहिक रूप से कार्य कर उनके मूल भाव को आगे बढ़ाये तभी भारत पुनः विश्व के अग्रणी राष्ट्रों में खड़ा होगा। हमारा कर्तव्य है कि दर्शक की उत्सुकता छोड़कर निर्माता की लगन और पुरुषार्थ से इसके लिए जुट जायें तभी लोकमंगल संभव हो सकेगा और स्वामी विवेकान्द जी के जन्मदिन को युवादिवस के रूप में मनानें की संकल्पना साकार होगी ।

(लेखक दीन दयाल उपाध्याय कौशल केंद्र, सरदार भगत सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महविद्यालय रुद्रपुर, उधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड में सहायक आचर्य और कर्तव्या फाउंडेशन के महासचिव है। संपर्क सूत्र - 07379727999)