बजट 2026-27 : इस तरह थैली से बाहर आती है ‘कॉर्पोरेट बिल्ली’!
(आलेख : संजय पराते)

गाय, गोबर और गौ-मूत्र पर टिकी सरकार इससे ज्यादा और कुछ नहीं कर सकती थी। पिछले वर्ष के बजट को विकास का पहिया बताया गया था, पता चला कि यह पहिया तो पूरी तरह पंक्चर था, उसके आगे बढ़ने का सवाल ही नहीं था। इस बार भी पंक्चर बनाए बिना केवल हवा भरकर पहिया चलाने की कोशिश हो रही है, जिसका हश्र भी पिछले वर्ष के बजट की तरह ही होना है। सवाल मोदी सरकार की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों का है, जिसको बदले बिना ही आम जनता की तकदीर बदलने का दावा किया जा रहा है। असलियत यही है कि हमारे देश के संसाधनों और श्रमशक्ति को कॉर्पोरेट विकास के हवन कुंड में झोंका जा रहा है।
पिछला बजट 50.65 लाख करोड़ रुपयों का था। इस बजट से आम जनता को कथित कल्याणकारी योजनाओं का लॉलीपॉप दिखाकर दावा किया गया था कि भूख, कुपोषण, बीमारी, अशिक्षा, आवासहीनता, बेरोजगारी की दलदल से आम जनता को बाहर निकालने वाला यह बजट है। इसके लिए मोदी सरकार की 18 योजनाओं को विकास का वाहक बताया गया था, जिनमें राष्ट्रीय आयुष योजना, पीएम श्री, पीएम आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन, पीएम आवास योजना – शहरी, पीएम आवास योजना – ग्रामीण, पीएम आवास योजना – शहरी 2.0, शहरी चुनौती निधि, जल जीवन मिशन, पीएम ग्राम सड़क योजना, पीएम इंटर्नशिप योजना, अनुसंधान व नवाचार तथा इंडिया एआई मिशन आदि प्रमुख योजनाएं थीं।
ऊपर उल्लेखित 12 योजनाओं में पिछले बजट में कुल 2.23 लाख करोड़ रूपये आबंटित किए गए थे, जो कुल बजट का मात्र 0.44 प्रतिशत ही था। तब भी इन योजनाओं के लिए आबंटित बजट राशि की पर्याप्तता पर सवाल उठाए गए थे। सवाल उठाने वालों को देशद्रोही और विकास विरोधी कहना सरकार की रवायत बन चुकी है। लेकिन कल जो बजट पेश किया गया गया, वह दिखाता है कि ये तमाम विकास योजनाएं धराशाई होकर जमीन सूंघ रही है, क्योंकि इस अपर्याप्त बजट आबंटन को भी पूरी तरह खर्च नहीं किया गया। आबंटित 2.23 लाख करोड़ रुपयों में से केवल 81,350 करोड़ रूपये ही खर्च किए गए, जो कुल आबंटन का मात्र 36.49 प्रतिशत और कुल बजट का मात्र 0.16 प्रतिशत ही है। साफ है कि इस देश की 140 करोड़ जनता को स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, रोजगार आदि के मामले में उसके हाल पर ही छोड़ दिया गया। लगता है कि ज़हालत और जिल्लत का कबाड़खाना बनकर ही हम विश्व गुरू का दर्जा हासिल कर सकते हैं।
पिछले 11 सालों से यही हो रहा है। बजट की राशि बढ़ती जा रही है, आम जनता के कल्याण पर होने वाले खर्चे घटते ही जा रहे हैं। इन 12 योजनाओं पर इस साल के बजट में सम्मिलित रूप से केवल 2.12 लाख करोड़ रूपये ही आबंटित किए गए हैं, जो पिछले साल आबंटित राशि से और कम है, जबकि बजट का आकार बढ़कर 53.47 लाख करोड़ रूपये से ज्यादा हो गया है। यदि 5 प्रतिशत मुद्रास्फीति को ही गणना में ले लिया जाएं, तो वास्तविक बजट आबंटन कुल बजट राशि का 0.37 प्रतिशत ही होता है। पिछला अनुभव बताता है कि भले ही इन योजनाओं के लिए 2.12 लाख रूपये आबंटित किए गए हैं, लेकिन खर्च 77000 करोड़ रूपये से ज्यादा नहीं होंगे। इसलिए यह मायने नहीं रखता कि बजट में आम जनता के कल्याण के लिए घोषित योजनाओं के लिए कितनी भारी राशि आबंटित की गई है, क्योंकि सरकार की सुविचारित नीति उसे खर्च नहीं करने की है।
पिछले 20 सालों से मनरेगा ग्रामीण भारत के लिए जीवन रेखा थी, जिसने कोरोना काल में अपनी उपादेयता को बढ़-चढ़कर साबित किया और जिसके कारण विश्वव्यापी संकट में भी कृषि विकास दर में वृद्धि दर्ज की गई। मांग-आधारित इस योजना को खत्म कर दिया गया और इसकी जगह ग्राम-जी (मोदी सरकार के शब्दों में जी-राम-जी) लाया गया है, जो एक आबंटन-आधारित योजना है। मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार देना था, जबकि ग्राम-जी का उद्देश्य विकसित (कॉर्पोरेट) भारत के लिए ग्रामीण नेटवर्क की स्थापना करना है। इसके लिए 95,692 करोड़ रूपये आबंटित किए गए हैं, जो मोटे तौर पर पिछले वर्ष मनरेगा के लिए खर्च की गई राशि के लगभग बराबर है। लेकिन यह राशि भी तब तक खर्च नहीं होगी, जब तक राज्य सरकारें इसके क्रियान्वयन के लिए 63,695 करोड़ रूपयों का अपना अंशदान नहीं देगी। राज्यों के वित्तीय स्रोतों और संसाधनों पर जिस तरह मोदी सरकार ने कब्जा किया है, उसे देखते हुए राज्यों का यह योगदान बहुत ही अनिश्चित है और इसलिए यह आबंटन भी पूरा-पूरा खर्च होने से रहा।
केंद्र प्रायोजित योजनाओं, वित्त आयोग अनुदान और अन्य हस्तांतरण के तहत राज्यों इस चालू वित्तीय वर्ष में बजट आबंटन की तुलना में 2,03,801 करोड़ रुपये कम दिए गए हैं। यह भारी भरकम कटौती है, इसके बावजूद 2026-27 के बजट में 2025-26 के बजट अनुमानों की तुलना में 59,456 करोड़ रुपये की और कटौती की गई है। राज्यों को दिए जाने वाले फंड को हड़पने के बावजूद राज्यों पर यह भार लादा जा रहा है कि वे मनरेगा जैसी केंद्रीय योजनाओं में भी अपना 40 प्रतिशत योगदान दें। साफ है कि यदि राज्य सरकारों केंद्रीय योजनाओं के लिए अपना योगदान देती हैं, तो उन्हें अपने राज्य की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भारी भरकम कटौती करनी होगी। असल में, विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अपने अपने राज्यों में चलाई जा रही सामाजिक विकास की योजनाएं ही देश के विकास की धुरी बनी हुई हैं, क्योंकि पिछले एक दशक में सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में केंद्र सरकार का प्रति व्यक्ति योगदान घटा है, जबकि राज्यों का योगदान काफी बड़ा है। इसलिए, केंद्र की मोदी सरकार का यह रवैया स्वस्थ केंद्र-राज्य संबंधों के खिलाफ तो है ही, संविधान की संघवादी भावना के भी खिलाफ है। राज्यों के अधिकारों और उसके विकास चक्र को कुचलकर भाजपा अपनी तुच्छ राजनीति तो कर सकती है, लेकिन देश के समग्र विकास को गति नहीं दे सकती।
आर्थिक सर्वेक्षण में देश की जो सुनहरी तस्वीर दिखाई गई है, वह बजट में आकर धराशाई हो जाती है, क्योंकि कॉरपोरेटों और अमीरों को करों में जो छूट दी जा रही है, उसके कारण राजस्व प्राप्तियां बढ़ नहीं रही है। चालू वित्त वर्ष में 26.74 लाख करोड़ रूपये कर राजस्व के रूप में प्राप्त होने का अनुमान है, जो बजट अनुमान से काफी कम है। वर्ष 2026-27 में भी केवल 28.67 लाख करोड़ रूपये कर राजस्व प्राप्त होने का अनुमान लगाया गया है, जो इस वर्ष के बजट अनुमान से मात्र 30,000 करोड़ रूपये ज्यादा है। इस राजस्व का भी एक बड़ा हिस्सा तेल पर लगाए जाने वाले करों से आएगा। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय आय के अनुपात में राजस्व में भारी गिरावट आ रही है, क्योंकि आम जनता को इससे और ज्यादा निचोड़ना संभव नहीं है।
राजस्व प्राप्तियों के कमजोर होने के बावजूद यदि राजकोषीय घाटे के कम रखने का लक्ष्य, जो कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी साम्राज्यवादी एजेंसियों की प्रमुख शर्त होती है, पूरा किया जा रहा है, तो यह आम जनता के कल्याणकारी योजनाओं में कमखर्ची और उसके जीवन स्तर पर हमले करके ही किया जा सकता है। पिछले सालों के बजट में भी यही किया गया था, इस साल के बजट में भी यही किया गया है। इसलिए राजकोषीय घाटा कम रहने की सराहना नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि हमारी अर्थव्यवस्था में विकास के पहिए जाम रखकर यह लक्ष्य हासिल किया जा रहा है।
पिछले साल के बजट में मध्यम वर्ग के लोगों को आय-कर में भारी छूट दी गई थी और आशा की गई थी कि इससे जो बचत होगी, उससे घरेलू अर्थव्यवस्था का विस्तार होगा और इससे रोजगार भी पैदा होंगे और करों में दी जाने वाली छूट से होने वाले नुकसान की भरपाई भी होगी। लेकिन इस बार के बजट में इसके नतीजों के बारे में घोर चुप्पी साध ली गई है, क्योंकि आशा, निराशा में बदल गई है। यदि घरेलू बाजार का विस्तार होता, तो नए उद्योग-धंधे खुलते, निवेश बढ़ता। ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि मध्य वर्ग ने अपनी बचत को विदेशी उपभोक्ता सामग्री की खरीदी में लगाया। यही असली सवाल आता है कि आप पैसे किसके हाथों में दें : 95 प्रतिशत मेहनतकश लोगों के हाथों में या 5 प्रतिशत पीये-खाएअघाये लोगों के हाथों में? घरेलू अर्थव्यवस्था का विस्तार करना है, तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ानी होगी, रिक्त पदों पर नियमित भर्ती करनी होगी, ठेका मजदूरी बंद करनी होगी, किसानों को उनकी फसल का स्वामीनाथन फार्मूले पर लाभकारी मूल्य देना होगा, खेत मजदूरों और ग्रामीणों को मनरेगा में रोजगार और ज्यादा मजदूरी देनी होगी। लेकिन बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है, क्योंकि यह सब तो कॉर्पोरेट हितों के खिलाफ जाता है।
इस बजट के बारे में सरकार, उसके अधिकारियों और प्रवक्ताओं ने जो टिप्पणियां की हैं, उसका सार यह है : अब कॉर्पोरेट ही विकास की धुरी होंगे, वही रोजगार उपलब्ध कराएंगे, वही सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करेंगे। इसलिए कारोबारी जगत की राह में खड़े अवरोधों को हटाकर उन्हें सरपट दौड़ने का रास्ता दिया जाएगा। सरकार केवल मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगी, कर्ज का बोझ और वित्तीय घाटे को कम करेगी।
आम जनता के लिए इसका अर्थ है : सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेगी और कॉरपोरेटों की लूट के लिए निजीकरण और विनिवेशीकरण के जरिए रास्ता बनाएगी। मजदूरों को गुलाम बनाने वाली श्रम संहिताओं के बाद अब कृषि कानूनों का बुलडोजर फिर से किसानों पर चलाया जाएगा। सभी कल्याणकारी खर्चों में कटौती करके कॉरपोरेटों के कर्जे माफ किए जाएंगे, उन्हें टैक्स में छूट दी जाएगी। इस बजट में घोषणा की गई है कि अगले पांच सालों में खाद्य और उर्वरक सब्सिडी खत्म की जाएगी। इन नीतियों के खिलाफ उठने वाली आवाजों को सख्ती से कुचला जाएगा और जनता को विभाजित करने के लिए सांप्रदायिकता का नंगा नाच किया जाएगा।
(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)








