मोदी का अहंकार उन्हें ले गया अन्धकार में

मोदी का अहंकार उन्हें ले गया अन्धकार में

आमिर अंसारी की क़लम से......

बिहार से जिस तरह का फैसला आया है उससे यह प्रतीत होता है कि मोदी के घमंड और अहंकार पर उसी बिहार ने मज़बूत हथोड़ा मार दिया है जिसने इन्द्रा के तकब्बुर को चूर चूर किया था लेकिन लोकतांत्रिक परम्पराओं के चलते यह भी बताता चलू की कल जिस शरद यादव के भाषण को अनदेखा कर मुँह मोड़ कर मोदी संसद की दीवार तकने लगे थे आज उसी शरद यादव ने  हिन्दुस्तानी सियासत का ही मुँह मोड़ दिया और मोदी को एक बार फिर गौर से संसद की तमाम दर ओ दीवार देखने पर मजबूर कर दिया चूंकि कल जब मोदी ने संसद भवन की दीवार विपक्ष से मुँह मोड़कर देखी थी तब उनका घमंड उनके सर पर चढ़ कर बोल रहा था और अब बिहार चुनावों के परिणामों के पश्चात इसलिए मोदी जी को संसद की दर ओ दीवार गौर से देखने की सलाह इस सच्चे और कड़वे नग्में के साथ दे रहा हूँ की 

"यह गलियाँ,यह चौबारा यहां आना न दोबारा 

          क्यूंकि तुम तो भये परदेसी यहां तेरा कोई नहीं "

कल जब मनमोहन सरकार के ज़ेरे साये कोयला और 2G स्पेक्ट्रम घोटाला जैसे बड़े मामले हिन्दुस्तानी सियासत में दिखाई दे रहे थे तब विपक्ष के रूप में सबसे तल्ख़ तेवर अख्तियार करते हुए तत्कालीन बी जे पी के नेता यह कहते दिखाई दिए थे कि इन तमाम घोटालों से सीधा सम्बन्ध प्रधानमंत्री का है !चूँकि प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख होता है और अगर सरकार का कोई मंत्री गलत करता है तो इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री पर जाती है !नैतिकता का पाठ देश को पढ़ाने वाली बी जे पी जब स्वयं सत्ता में आती है तो वह नैतिकता की परिभाषा में बदलाव लाते हुए कहती है कि मंत्रियों के हर मामले में प्रधानमंत्री जवाब नहीं दे सकता भला केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति दिल्ली की सड़कों पर रामज़ादे और हरामज़ादे की बहस को जन्म दे कर मुल्क के सामाजिक ढांचे को ही चकनाचूर करने का अपना मंसूबा सरे आम ऐलान करे लेकिन जब संसद के भीतर विपक्ष प्रधानमंत्री के बयान की मांग को लेकर लामबंद हो जाये तो वह प्रधानमंत्री जो अपने चुनावी भाषणों में मनमोहन सिंह की खामोशी पर तंज़ कसा करते थे खुद ही ख़ामोशी के ऐसे समुन्दर में डूब गए कि संसद की कार्यवाही दिन प्रतिदिन सिर्फ इस एक सवाल पर स्थगित होती रही लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की ज़बान में जुंबिश नहीं आयी !     

और मोदी सरकार के बुलंद इक़बाल की बात करने वाले वही भाजपाई नेता यह कहते नज़र आने लगे कि हर मामले में प्रधानमंत्री संसद में आकर भाषण नहीं दे सकते जो कल हर मंत्री की गलती का ठीकरा पूर्व प्रधानमंत्री के सिर पर फोड़ा करते थे बारहाल जब कई दिन के गतिरोध के पश्चात मोदी राजयसभा में पधारे तो इस मामले में एक लम्बी बहस हुयी सरकार के तमाम मंत्री इस बहस में व्यवधान डालते दिखे लेकिन किसी एक इंसान के लब सिले थे तो उसका नाम नरेंद्र मोदी था और मोदी ने भी सदन के भीतर अहंकार की जो तस्वीर पेश की थी उसे संसद भवन की वह दीवार कभी नहीं भूल सकती जिसे मोदी उस समय टक टकी लगाये विपक्ष की तरफ से पीठ मोड़कर देख रहे थे जब हिन्दुस्तानी सियासत का वह अनुभवी सांसद शरद यादव बोल रहे थे जिसने १९७४ में इंद्रा के अहंकार को ललकारते हुए संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था ! लेकिन समय का चक्र जो आदिकाल से अहंकारी का दमन करता चला आ रहा है उसने अपनी रफ़्तार तेज़ की और भविष्य के एक ऐसे अहंकारी के घमंड को चूर चूर कर दिया जिसके अहंकार की आग में अभी न जाने कितने दिन और महीने विराट हिन्दुस्तान को झुलसना पडेगा !  

मोदी के अहंकार पर समय का घण्टाल उन के प्रधानमंत्री बन के पहले ३ माह में ही ज़र्ब देने लगा था यह ज़र्ब थी उन तमाम राज्यों के उपचुनाव जहाँ मोदी ने तारीखी जीत दर्ज की थी वह चाहे कर्नाटक हो,बिहार  हो ,पंजाब हो,गुजरात हो,मध्य प्रदेश हो, या उत्तर प्रदेश सब जगह मोदी ने ३ माह की जीत के पश्चात हार का स्वाद भी चख लिया था लेकिन न तो मोदी सरकार के मंत्रियों,सांसदों और उनकी पार्टी के पदाधिकारियों के घमंड में और न ही मोदी के अहंकार पर ज़र्रा बराबर भी फ़र्क़ नहीं पड़ा !

इन चुनावों के पश्चात जिन-जिन रियासतों में विधान सभा चुनावों की सियासत गरमाई उनमे दिल्ली सबसे महत्वपूर्ण था चूंकि मोदी और उनकी सरकार का एक-एक मंत्री यहाँ वास करता है वहां भाजपा की हालत इतनी खराब हो गयी कि वह दिल्ली विधानसभा के नेता विरोधी दल की कुर्सी पाने के लिए भी केजरीवाल की मोहताज हो गयी ! 

दिल्ली के बाद जिन प्रदेशों में विधानसभा चुनाव हुए उनमे भाजपा को लोकसभा के मुकाबले में न सिर्फ कम वोट प्राप्त हुए बल्कि इन प्रदेशों ( महराष्ट्र और जम्मू कश्मीर ) में मोदी की भाजपा ने सरकार तो बनाई लेकिन किस अपमान के साथ बनाई है वह जगज़ाहिर है, महाराष्ट्र गठबंधन का अहम साथी शिवसेना जिस प्रकार मोदी और उनकी कार्यशैली पर प्रहार कर रहा है उसके बावजूद अहंकार में डूबे भाजपा नेता अपमान को अमृत जानकर निगलते जा रहे हैं !

अब सत्ता प्रेम में भाजपा महाराष्ट्र में रोज़ अपमान के घूँट पीकर ५६ इंच का सीना फुला कर घूम रही है इतना ही नहीं जम्मू कश्मीर में तो मोदी की भाजपा ने अपना घमंड,तकब्बुर,अहंकार और इक़बाल सब कुछ ताक़ पर रख कर विचारों और सिद्धांतों की होली जला कर उन मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ खड़े होने का फैसला कर लिया जिनके बारे में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में मोदी ने मेहबूबा मुफ्ती का नाम लेकर उनके आतंकियों द्वारा किये गए अपहरण और फिरौती में छोड़े गए आतंकियों की दास्तान को इस तरह बयान किया था कि हर राष्ट्रवादी के मन में वह ज़ख्म हरा हो गया था जो भाजपा शासनकाल में ही मुफ्ती मोहम्मद सईद ने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहते हुए दिया था !और राष्ट्रवाद के प्रमाण पत्र बांटने वाली भाजपा के छद्म राष्ट्रवाद की कलई उस समय खुल गयी जब भाजपा गठबंधन की जम्मू कश्मीर सरकार ने मसर्रत आलम के हाथ में रिहाई का परचम दे दिया !

लेकिन समय के चक्र की पड़ती इन चोटों का असर न तो मोदी के घमंड पर हुआ और न ही उनके मंत्री,सांसद और समर्थकों के अहंकार पर लेकिन समय की मार के आगे कोई नहीं टिक सकता इतने सब के बावजूद मोदी के मंत्री घमंड की उस दीवार पर चढ़े रहे जिसकी नींव बहुत खोखली होती है उसी दीवार पर चढ़कर दादरी के ज़ुल्म पर उनके स्थानीय सांसद और केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्री ने जिस असांस्कृतिक भाषा का इस्तेमाल किया उसने एक बार फिर मोदी सरकार के दामन में एक ऐसा दाग दिया जिसे धोते धोते सदियाँ गुज़र जाएगी और न सिर्फ महेश शर्मा बल्कि हरियाणा के अंदर दलित मासूम की निर्मम ह्त्या के पश्चात जो शर्मनाक बयान वी के सिंह ने दिया है उसने तो इंसानी अहसास को ही रौंद डाला 

फिर वह क़ुदरत जोश में आयी जिसने इस नीले आसमान को बिना किसी सहारे के थामे रखा है और उप्र के नगर पंचायत चुनावों ने इसी बीच दस्तक दी इस दस्तक को उप्र के विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर मुल्क के राजनैतिक समीक्षक  नज़रे गड़ाए देख रहे थे इसी बीच हिन्दुस्तानी सियासत की ३० बरसों से नब्ज़  को पकड़ने वाले नव्वाज़ मोहममद आज़म खान ने मोदी के चुनावी क्षेत्र बनारस को अपने टारगेट पर लिया और बनारस की गलियों में जाकर जब आज़म खान ने यह ऐलान किया की बनारस के घाटों के सौंदर्य करण के लिए बनारस की गलियों में इंटरलाकिंग के लिए बनारस की सीवर लाइन के लिए और बनारस की सड़कों के विस्तार के लिए मैंने करोड़ों रूपये खर्च कर दिए लेकिन अफ़सोस मुल्क का वह बादशाह जो आपके वोट पाकर आज हिन्दुस्तान के तख़्त ए ताऊस पर बैठा है उसने एक नया पैसा अपने चुनावी क्षेत्र में खर्च नहीं किया 

आज़म खान के इन जुमलों पर बनारस के घाटों से लेकर बनारस की चौपालों तक चर्चा होने लगी और बनारस के स्थानीय पंचायत चुनावों में मोदी की ऐतिहासिक हार हो गयी ४८ सीटों में से केवल ८ सीटों पर ही बनारस में मोदी की भाजपा सिमट कर रह गयी ! अभी भाजपा के बयान वीरों की ज़बाने खामोश हैं चूँकि मोदी के बनारस राजनाथ के लखनऊ सहित सम्पूर्ण उप्र में भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है !

मैं आलेख के अंत में बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि बिहार से जिस तरह का फैसला आया है उससे यह प्रतीत होता है कि मोदी के घमंड और अहंकार पर उसी बिहार ने मज़बूत हथोड़ा मार दिया है जिसने इन्द्रा के तकब्बुर को चूर चूर किया था लेकिन लोकतांत्रिक परम्पराओं के चलते यह भी बताता चलू की कल जिस शरद यादव के भाषण को अनदेखा कर मुँह मोड़ कर मोदी संसद की दीवार ताकने लगे थे आज उसी शरद यादव ने  हिन्दुस्तानी सियासत का ही मुँह मोड़ दिया और मोदी को एक बार फिर गौर से संसद की तमाम दर ओ दीवार देखने पर मजबूर कर दिया चूंकि कल जब मोदी ने संसद भवन की दीवार विपक्ष से मुँह मोड़कर देखी थी तब उनका घमंड उनके सर पर चढ़ कर बोल रहा था और अब बिहार चुनावों के परिणामों के पश्चात इसलिए मोदी जी को संसद की दर ओ दीवार गौर से देखने की सलाह इस सच्चे और कड़वे नग्में के साथ दे रहा हूँ की 

"यह गलियाँ,यह चौबारा यहां आना न दोबारा 

क्यूंकि तुम तो भये परदेसी यहां तेरा कोई नहीं "