प्रेस क्लब किसी एक की बपौती और भूमिधरी नहीं

प्रेस क्लब किसी एक की बपौती और भूमिधरी नहीं

हम दो हमारे कोई नहीं ‘समीक्षा’ को छोड़कर। आप तनिक भी तरस मत खाइए। यह परिवार नियोजनी नारा अब काफी परिवर्तित हो चुका है। पहले था- बस दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे, तदुपरान्त हम दो हमारे दो- बावजूद इसके जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण नहीं लग सका तब सरकार ने हम दो हमारे एक (लड़का हो या लड़की) नारे पर जोर दिया। 

जनाब बिडम्बना यह है कि हम दो हमारे कोई नहीं की स्थिति में हम जी रहे हैं। उधर प्रेस क्लब की लूट मचाने वाले सीना 36- 32 की बॉडी फिगर बनाए सामने से गुजरते है तब हमें रोना आता है काश! हमारे पास भी एक हजार रूपए होते तो सदस्यता मिल गई होती हम भी गर्व से कह सकते कि पत्रकार हैं। परन्तु दुर्भाग्य इसी को कहते हैं कि न नौ मन तेल होगा और न तो राधा का गौना जाएगा। जी हाँ एक हजार रूपयों की व्यवस्था नहीं हो सकी और हम सदस्यता ग्रहण नहीं कर पाए, यही वजह रही कि प्रेस क्लब के चुनाव में बहैसियत मतदाता हमारा रूतबा नहीं बढ़ा। किसी भी प्रत्याशी ने घास तक नहीं डाला। उधर वोट पड़ रहा था, इधर म नही मन हम हमारे हालात को कोसते हुए एक हजार रूपयों की व्यवस्था न हो पाने को लेकर सोचने, चिन्तन करने को मजबूर ही बने रहे। 

मैं हमारे हालात पर चिन्तित तखत पर लेटा सोच ही रहा था, एक हाथ से हैण्डफैन चलाकर गर्मी/उमस में होने वाले पसीने से राहत महसूस कर रहा था, तभी एक शिष्य अपने एक अन्य साथी के साथ मुझसे मिलने आ गया। हाल-चाल लिया, उसने मुझे देखा तो यह जानकर उसे खुशी हुई कि हममें से मैं अभी भी इस धरा पर सशरीर जीवित हूँ, और मरा नहीं हूँ। यद्यपि मेरे लोगों द्वारा मेरे बारे में यह कहा जाता है कि मैं भू-भार भूता हूँ यानि धरती का बोझ। जी हाँ ऐसा लोग ठीक ही तो कहते हैं। दमड़ी से भेंट नहीं, बकवास लम्बी-चौड़ी करता हूँ। बहरहाल जो कुछ भी हो इस बार हमारी हालत ठीक उसी तरह दिखी जैसा कि परिवार नियोजनी उपरोक्त स्लोगन (हम दो हमारे कोई नहीं)। थोड़ा सा स्पष्ट करना चाहूँगा- वह यह कि हम दो का अभिप्राय यह कि मैं और सहकर्मी महिला पत्रकार कुल मिलाकर दो लोग नन्हीं समीक्षा को छोड़कर। यह अजीब ही कहा जाएगा कि बरसों से कलम घिसते रहने का परिणाम यह रहा हमारा इस संसार में कोई नहीं वर्ना चुनाव के पहिले ही वही हमें सदस्यता ग्रहण करवा देता। आखिर उसे दो वोट तो मिलते ही- रही बात औरों से समर्थन दिए जाने की इस पर हमें कुछ भी नहीं कहना। हर व्यक्ति यह जानता है कि लोकतंत्र में चुनाव का महत्व तब और बढ़ जाता है जब मतदाताओं को मौखिक वायदे न देकर प्रत्याशियों द्वारा उनकी जेबें भारी की जाती हैं। मतलब स्पष्ट है कि वोट खरीदने वाले भारी समर्थन/प्रचार पाने के असली हकदार होते हैं। 

हम दोनों प्रतीक्षा भी कर रहे थे कि चुनाव में खड़े होने वालों द्वारा हमें सदस्य बनवा दिया जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो हम भी मतदान करने के अधिकारी हो जाएँगे। ऐसा हुआ होता तो हम भी मताधिकारी बन जाते साथ ही हमें एक हजार (दो सदस्यों की फीस) के लिए यह दिन न देखना पड़ता। यहाँ बताना भी चाहूँगा कि इन सदस्यों में फल-सब्जी विक्रेता और छाता आदि बनाने का काम करने वाले रहे। इन बेचारों को कलम पकड़ने का सऊर भी नहीं मालूम। बहरहाल ये लोग प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के चुनाव पूर्व ही सदस्य बना लिए गए, रूतबा-रूआब भी बढ़ गया। शायद इन लोगों ने सदस्यता शुल्क (पैसे) खूब जमा कराया था। 

हालाँकि हम सदस्य नहीं बने थे, फिर भी पत्रकारिता में लम्बा समय गुजार चुके थे इसलिए जी नहीं माना और चुनाव के दिन पहुँच गए मतदान स्थल यानि प्रेस क्लब भवन परिसर। धनी वर्गीय मीडिया परसन्स की तुलना में हमारी औकात कुछ भी नहीं थी फिर भी प्रेस क्लब तक हम पैदल ही पहुँचे थे। यद्यपि हमें वहाँ तक पहुँचने से रोके जाने की नाकाम कोशिश की गई थी। हमें आश्चर्य हुआ था कि जिस-जिस को हाथ पकड़ कर कलम पकड़ना सिखाया वहीं एकदम से किनारा कसे हुए दिखा। जिसे प्रेस क्लब का अर्थ नहीं मालूम वे लोग काफी सक्रिय और उत्साहित दिख रहे थे। गोया प्रेस क्लब उनकी बपौती और भूमिधरी। 

आखिर ऐसा क्यों....? इस पर ज्यादा सोचने के बजाए हमने हालात से समझौता कर लेने में ही बेहतरी समझा। हमारे यहाँ के मीडिया परसन्स के पास सुख-सुविधाओं की कमी नहीं है अपितु ये लोग सर्वाधिक धनी लोगों में एक हैं। ब्राण्डेड मीडिया से सम्बद्ध लोगों को देखा है कि वे लक्जरी गाड़ियों (ए.सी.) में बैठकर आते-जाते हैं। उनके ब्यूरों कार्यालयों के सभी कक्ष वातानुकूलित उपकरणों से सुसज्जित हैं, वह लोग प्रभावशाली, माफियाओं, माननीयों और बड़े-बड़े अफसरों से मेलजोल रखते हैं। हमारी बिसात ही नहीं कि हम उनकी तुलना कर सकें। कुछ भी हो विषयान्तर करके अपना रोना क्या रोया जाए? प्रेसक्लब का चुनाव सम्पन्न हो गया और उसके पदाधिकारियों ने शपथ भी ले लिया, लेकिन हमें भनक तक नहीं लग सकी। यह सब सोचकर कुछ भी हासिल होने वाला नहीं। सब समय-समय की बात है। ऐसा सबके साथ होता है, उनके साथ भी होगा जो आज हमारे साथ कर रहे हैं। ऊपर वाला सबको सद्बुद्धि दे यही कामना है। 

-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार