जाॅर्ज फर्नांडीज को भूल गए समाजवादी

जाॅर्ज फर्नांडीज को भूल गए समाजवादी

प्रोफ़ेसर के के त्रिपाठी

देश के समाजवादी नेता जाॅर्ज फर्नांडीज गरीबों, मजदूरों, दलितों, वंचितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ते रहे। आपातकाल में देश की सबसे ताकतवर नेता इंदिरागांधी के खिलाफ लड़ाई लड़कर देश को आपातकाल से मुक्त कराया। दुनिया में हर तरह के अन्याय के खिलाफ संघर्ष में सबसे आगे खड़े रहे। जाॅर्ज फर्नांडीज का जन्म जून 1930 को बंगलौर में हुआ था। इनके पिता इनके पादरी बनाना चाहते थे। पिता के दबाव में कुछ दिनों तक पादरी का प्रशिक्षण लिया, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। पिता को बिना बताए घर से निकलकर छोटे अखबार को निकालना शुरू किया। उसी समय इनका सम्पर्क कुछ समाजवादियों से हुआ। ये बंगलौर छोड़कर मुम्बई आकर देश के प्रख्यात समाजवादी नेता मधुलिमये के सम्पर्क मंे आकर मुम्बई के होटलों में काम करने वाले व टैक्सी चालकों का संगठन खड़ा कर उनकी मांगो को लेकर मुम्बई की सड़कों पर संघर्ष का बिगुल फूंका। समाजवादी आंदोलन को धार देने के लिए पूरे मुम्बई के मजदूरों को इकट्ठा करके कई दिनों तक मुम्बई को बंद भी कराया, यही नहीं जब भी वह चाहते थे तो टैक्सी का चक्का जाम करा देते थे। शुरूआती दिनों में अपने को मजदूरांे की समस्याओं से जोड़कर उनके सुख-दुख में खड़े मिलते थे जिससे मजदूरों के दिलों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे। 

जाॅर्ज फर्नांडीज हमारे बीच हैं लेकिन अस्वस्थ्य हैं। उनके जीवन के संघर्षो की लम्बी फेहरिस्त है। जाॅर्ज फर्नांडीज को मधुलिमये बहुत सम्मान देते थे। जाॅर्ज साहब ने हमेशा उन्हे अपना गुरू माना। डाॅ0 राम मनोहर लोहिया जाॅर्ज फर्नांडीज को हमेशा जार्ज कहकर बुलाते थे और यही उनका संक्षिप्त नाम मशहूर हो गया। मुम्बई में संसद के चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता व भारतीय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष एस.के. पाटिल को भारी मतों से पराजित कर मुम्बई के मजदूरों के हीरों बन गए। उन्होने एक बार मुझसे जिक्र किया था कि एसके पाटिल ने हवाई जहाज में यात्रा करते हुए कहा था कि मुझको ईश्वर भी नहीं हरा सकता। इसी घटना ने जाॅर्ज को चुनाव जिताने में अहम भूमिका अदा की।

देश मंे समाजवादी आंदोलन टुकड़ों में भले बंटा पर जाॅर्ज का संघर्ष नहीं बंटा। जहां मजदूर वहां जाॅर्ज। बिहार में आंदोलन आया जाॅर्ज उसमें कूद पड़े। भारत में पहली बार तीन दिनों की मुकम्मल रेल हड़ताल उन्हीें दिनों हुई। जाॅर्ज के नेतृत्व में कर्मचारियों ने रेल पटरी तीन दिनों के लिए सूनी कर दी। आपातकाल की घोषणा हुई जाॅर्ज भूमिगत हो गए। अंडर ग्राउंड होकर आपातकाल विरोधी आंदोलन संगठित किया तथा इस लड़ाई को शिद्दत से लड़कर आपातकाल को खत्म कराया। इसी बीच मशहूर बड़ौदा डायनामाइट कांड हुआ, जाॅर्ज पकड़े गए। उनके साथ तमाम अमानवीय व्यवहार किया गया। जेल मंे रहते हुए लोकसभा का चुनाव भारी मतों से जीते और सतहत्तर मंे केन्द्रीय मंत्री बने कोकोकोला को भारत छोड़ने पर विवश किया ताकि भारतीय पेय को बाजार मिल सके और गरीबों, वंचितो व पिछड़ों को रोजगार मिल सके। वे केन्द्रीय मंत्री कई बार बने। समाजवादियों के बिखराव व आपसी टूट-फूट से दुखी होकर 1994 में समता पार्टी की स्थापना की तथा बिहार को जंगलराज से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया। जाॅर्ज साहब जिक्र किया करते थे कि बिहार के एक कद्दावर नेता ने किसी उद्योगपति को लेकर जाॅर्ज की कोठी पर आए। जाॅर्ज से उन्होंने कहा कि इनके सम्बन्ध में संसद में मामला न उठाएं। जाॅर्ज भड़ककर बोले कि मैं पूंजीपतियों के हित की बात नहीं कर सकता। कद्दावर नेता ने जाॅर्ज से कहा कि संसद नहीं पहुंचेंगे, तो जाॅर्ज का जवाब था कि जाॅर्ज तुम्हारे जैसा नेता पैदा करता है। इसी घटना ने जाॅर्ज को झकझोर दिया और उन्होंने बिहार को जंगलराज से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया। लगातार पन्द्रह वर्षो के संघर्ष के बाद बिहार को सुशासन दिलाने का काम किया बिहार की राजनीति को जंगलराज मुक्त कराने के लिए जनता दल (यू) में समता का विलय किया जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा, उन्हें हासिए पर फेंक दिया गया।

परिस्थितियों ने जाॅर्ज को अटल जी के साथ जोड़ा। केन्द्रीय सरकार के वह संकट मोचक बन गए। जाॅर्ज के ऊपर जब ताबूत घोटाले को लेकर कांग्रेस ने हमला किया तो तुरन्त मंत्री मंडल से इस्तीफा देकर स्वयं जांच की मांग की लेकिन अटल जी कुछ माह के बाद जाॅर्ज का हाथ पकड़ कर रोने लगे और कहा, मैं जानता हूं तुम एक ईमानदार नेता हो, तुम पर मुझे गर्व है। इस बात का जिक्र उन्होंने तीन कृष्ण मेनन मार्ग पर प्रो. केके त्रिपाठी से किया। जाॅर्ज साहब ने मशहूर कांग्रेसी नेता हुमायूं कबीर की बेटी लैला कबीर से शादी की, लेकिन लैला कबीर कभी लैला जाॅर्ज फर्नाडिस नहीं बन पाईं। जाॅर्ज को कभी उनमें कामरेड या साथ या सहचरी जैसा भाव नहीं लग पाया। एक बेटा होने के बाद भी दोनों के बीच सामंजस्य नहीं बन पाया। जाॅर्ज के सभी साथियों के मन की भावना रही कि यदि जाॅर्ज और लैला एक छत के नीचे रहे होते तो जाॅर्ज के जिन्दगी का एकाकीपन बहुत कम हो जाता, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पच्चीस साल लैला कबीर जाॅर्ज से अलग विदेश में रहीं। जाॅर्ज के साथियों में पुरूष और महिलाएं दोनों रहीं। जाॅर्ज ने सभी के साथ सम्मानजनक रिश्ता रखा। व्यक्तिगत जीवन में जाॅर्ज इतने सादगी से रहे कि उनका घर हमेशा उनके संघर्ष और उनकी पार्टी का केन्द्र रहा। देश के तमाम दुखी, पीडि़त व उपेक्षितों के लिए जाॅर्ज का घर दिन रात खुला रहता था। उल्लेखनीय है कि जाॅर्ज फर्नांडिस ने अपने घर का गेट भी तुड़वा दिया था क्योंकि जब मुलायम सिंह रक्षा मंत्री थे तो उनका गेट बंद करा दिया जाता था। जाॅर्ज ने विरोध में तीन कृष्ण मेनन के गेट को ही तुड़वा दिया।

देश मे हजारों उनके प्रशंसक और दोस्त रहे जो उनसे हमेशा मिलते रहते थे ऐसा नहीं जाॅर्ज को धोखे नहीं मिले राजनीति में भी मिले और पार्टी में भी मिले। कुछ तो ऐसे थे कि जाॅर्ज के पिछले लोकसभा के चुनाव में हार के बाद हासिए पर आ गए। उनके पास रहने का ठिकाना नहीं था। मुम्बई के उनके साथियों ने उनके लिए हौजरवास में एक मकान खरीदा पर मकान का टाइटिल यूनियन के नाम था, उस यूनियन ने जाॅर्ज को मकान मंे न आने देने की कोशिश की। जाॅर्ज के दोस्त उनके लिए किराए का मकान तलाश रहे थे, तभी नीतिश कुमार ने उन्हे बाहर से राज्यसभा के लिए भेज दिया।

जाॅर्ज साहब ने देश के तमाम गरीब व मजलूमों को विधानसभा तथा लोकसभा पहुचाया। मुझे याद है कि समता पार्टी की बैठक जाॅर्ज साहब ने दिल्ली मंे बुलाई तथा चुनाव को लेकर चर्चा चली, उस पर हरिकेवल जी ने कहा कि जाॅर्ज साहब मैं तो सड़क पर सब्जी की दुकान लगाता था लेकिन अपने मुझ गरीब व्यक्ति को देश की सबसे बड़ी पंचायत मंे भेजा। जाॅर्ज के साथ मेरा निकट का सम्बन्ध था। जाॅर्ज ने अम्बेडकरनगर मंे लोहिया मेला आयोजित करने का निर्णय लिया। मेरा गृह जनपद होने के कारण मैंने मेले के आयोजन का प्रचार-प्रसार युद्ध स्तर पर किया। नानाजी देशमुख मेले के मुख्य अतिथि थे। जाॅर्ज साहब का अकबरपुर स्टेशन पर स्वागत के लिए हजारेां की संख्या मंे लोग इकट्ठा थे। जाॅर्ज साहब व स्व0 दिग्विजय सिंह पूर्व रेल राज्य मंत्री रेलगाड़ी से आए और डाॅ0 लोहिया की यादों में खो गए। उन्होंने उस समय समाजवादियों के कुशलक्षेम के बारे में पूछा तथा नाराजगी व्यक्त की कि जनपद का नाम डाॅ0 राम मनोहर लोहिया क्यों नहीं रखा गया। उन्होंने कहा कि मैं मुलायम से बात करूंगा। काश आज जाॅर्ज की सेहत ठीक होती तो देश की राजनीति तस्वीर दूसरी होती।