पत्रकारिता के मूल चरित्र से खेलता 'इलेक्ट्रानिक मीडिया'

पत्रकारिता के मूल चरित्र से खेलता 'इलेक्ट्रानिक मीडिया'

अनुराग मिश्र

सार्वजानिक जीवन के व्यक्ति को निजी पल जीने का या निजी समारोह आयोजित करने का कोई हक नहीं है। ये इलेक्ट्रानिक मीडिया का अघोषित फरमान है। यकीन ना आये तो कल हुई भारत के स्टार बल्लेबाज सुरेश रैना की शादी की ख़बरों को उठाकर देख लें। सुरेशन रैना के घर पर खड़े द्वारपाल से लेकर खानसामा तक हर आदमी के पीछे ये मीडिया भागा सिर्फ इतने के लिए ये उनके निजी समारोह कुछ खास पलों को जनता के बीच बेचकर अपनी भूख को शांत कर सकें।

माना कि सुरेशा रैना भारत के स्टार बल्लेबाज है और उनसे जुडी हर खबर को उनके फैन्स पढना चाहते है पर फैन्स को क्या दिखाना है और क्या नहीं, ये तय करने का अधिकार किसे हैं सुरेश रैना को या इलेक्ट्रानिक मीडिया को ?

इलेक्ट्रानिक मीडिया का फर्ज सिर्फ इतना था कि वो सुरेश रैना की शादी की खबर को टेलीकास्ट करें ना की शादी के अन्दर हो रहे कार्यक्रमों और आने वाले अथितियों को। शादी के कार्यक्रमों और आने वाले अथितियों की जानकारी, जरुरत होने पर रैना स्वयं देते जैसा की उन्होंने अपनी सगाई के बाद किया था। पर इलेक्ट्रानिक मीडिया रैना के अधिकारिता बयान या फिर शादी से जुड़े अधिकृत पोस्ट का इन्तजार नहीं कर सकती थी क्योकि उसकी भूख (टीआरपी) ने उसे ऐसा करने से रोक रही थी।

टीआरपी पाने की इस नंगी होड में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने सबको नंगा कर दिया है। अमिताभ से लेकर रेखा तक, विराट से लेकर अनुष्का तक सब इलेक्ट्रानिक मीडिया लिए सिर्फ एक खबर है जिसे बेचकर ये टीआरपी की भूख को शांत करती है।

पर एक सवाल क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया की ये पत्रकारिता व्यक्ति की निजी अधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं करती है ? भारत में लोकतंत्र कायम है और लोकतंत्र में हर व्यक्ति को निजी जीवन जीने का अधिकार है। ऐसे में इस प्रकार की पत्रकारिता से इलेक्ट्रानिक मीडिया किन नये सिद्धांतों का प्रतिपादन करती चली आ रही है ये बात समझ से परये है।

रोष इस बात का है कि हर आदमी ये जानता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने अधिकारों का खुला दरुपयोग कर रही है। पर कोई कुछ नहीं बोलता। सार्वजानिक जीवन का व्यक्ति इसलिए खामोश रहता है कि क्योकि उसे डर होता है कि अगर उसने कुछ बोला तो मीडिया उसके खिलाफ नकरात्मक ख़बरों को प्लांट करना शुरू कर देगी जो उसकी सार्वजानिक छवि के लिए नुक्सानदेय होगा और आम आदमी इसलिए खामोश रहता है क्योकि उसे मनोरंजन के लिए एक मसलेदार खबर मिलती है।

पर इन सब के बीच अगर कुछ गलत हो रहा है तो वो है पत्रकारिता के मूल चरित्र के साथ खिलवाड़। पत्रकारिता का मूल चरित्र ये कहता है कि अधिकृत वर्जन को पाए बगैर कोई भी खबर लिखी नहीं जा सकती। बावजूद इसके इलेक्ट्रानिक मीडिया हर मोड़ पर इसका खुला उल्लंघन करती है।

दरसल इलेक्ट्रानिक मीडिया का सबसे बड़ा वरदान यही है कि अभी तक उसके लिए कोई भी कोई अधिकृत गाइडलाइन नहीं बनी है। प्रिन्ट मीडिया पर तो तमाम तरीके की बंदिशे है पर इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी बन्धनों के दायरे से बाहर है। आज भी इसे प्रिंट मीडिया के लिए बनाये गए नियमों से ही संचालित किया जा रहा है और शायद इसलिए ये बे-खौफ और बे-लाग होकर न केवल पत्रकारिता के मूल चरित्र का बलात्कार करती है बल्कि सार्वजानिक जीवन के व्यक्ति के निजी अधिकारों का भी मखौल उड़ाती है।

अनुराग मिश्र 

स्वतंत्र पत्रकार 

9506842142