भारत में आरक्षण की आवश्यकता और दरिद्रता

डाॅ.नीतू सिंह तोमर

स्वाधीनता से पूर्व आरक्षण जैसे प्रावधानों के कई प्रमाण मिले हैं। वर्ष 1882 में ब्रिटिश सरकार द्वारा हंटर कमीशन का गठन आरक्षण जैसे प्रावधानों हेतु किया गया था। इसी समय महात्मा ज्योतिराव फूले द्वारा पिछडे़-वंचित-असहायों को निशुःल्क अनिवार्य शिक्षा व शासन-प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व मांग की गई थी। ‘ट्रावनकोर रियासत’ में वर्ष 1891 में वंचित एवं पिछडे़ असहायों को विशेष रियायतें देने हेतु आन्दोलन प्रारम्भ हुए। कोल्हापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज ने 1901 में पिछड़े-वंचित-दमितों का आरक्षण प्रारम्भ किया। वर्ष 1943 में अनुसूचित-जातियों के लिए सार्वजनिक पदों में 8ः आरक्षण रखा गया। स्वतन्त्रता के बाद संविधान में 10 वर्षों के लिए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए क्रमशः 15ः एवं 7.5ः आरक्षण का प्रावधान किया गया और बीसवीं सदी के नौंवे दशक में पिछड़ा वर्ग के लिए 27ः होने पर आरक्षण का प्रतिशत 49.5 हो गया।

यह कैसी विडम्बना है कि, केंद्र व राज्य द्वारा संचालित योजनाएँ-बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, निरक्षरता उन्मूलन तथा दरिद्रों के कल्याणकारी लाभ पर राष्ट्रीय बजट का बड़ा हिस्सा व्यय होने के बावजूद बेरोजगारी, कुपोषण, निरक्षरता, भुखमरी में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश लोगों के रहन-सहन का स्तर निरन्तर गिरता चला जा रहा है। इससे भी अधिक दुःख की बात यह है कि धनाभाव ने न कितने ही लोगों को चिन्ता का शिकार बना दिया है, जिसका कुफल वे अपने स्वास्थ्य को खोकर या मानसिक एवं संक्रामक रोगों में ग्रस्त होकर कष्ट भोग रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन लोगों की संख्या कम नहीं है, जिनको धनाभाव के कारण न तो पेट भरने के लिए भोजन मिलता है, न तन ढ़कने के लिए वस्त्र और न रहने के लिए घर। इन बदनसीब लोगों को बड़ी संख्या में फुटपाथों एवं गन्दे नालों के किनारे अपनी जिन्दगी के दिन गिनते हुए देखा जा सकता है।

आरक्षण नीति को लेकर सम्पूर्ण भारत में असन्तोष और आन्दोलन का दौर चल रहा है। वितरणमूलक न्याय हेतु पिछड़े कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण सम्बन्धी संरक्षणमूलक संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं। संरक्षणमूलक प्रावधानों के रूप में आरक्षण की यह व्यवस्था प्रारम्भ में 10 वर्षों के लिए की गई थी, जिसे बिना पुनरावलोकन के निरन्तर आगे बढ़ाया जा रहा है। विधि के समक्ष सर्वप्रथम समता की गारण्टी दी गई है। संवैधानिक व्यवस्था नागरिकों के बीच भेदभाव करने और योग्यताओं के हनन करने का अधिकार नहीं देती। परन्तु बार-बार तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों की प्राथमिकता देते हुए सरकारों और विधायिकाओं ने सामाजिक न्याय के नाम पर संवैधानिक स्वेच्छाचार किया। बार-बार अदालतों ने आँकड़े मांगे और आरक्षण का आधार मांगा, परन्तु सरकार टालमटोल कर देती है। इन्दिरा साहिनी-1998 मामले में सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण संवैधानिक पीठ ने पदोन्न्ाति में आरक्षण असंवैधानिक बता कर सरकार से पूछा कि ‘‘आरक्षित वर्ग में वे व्यक्ति जो दो-तीन पीढ़ी से आरक्षण का लाभ ले रहे है और जो स्वयं आरक्षित वर्ग में सर्वोच्च मलाईदार वर्ग एवं पद पर हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ किस आधार पर दिया जा रहा है?’’ सरकार का उत्तर आया शून्य।

समाज की मुख्यधारा में जुड़े भौतिक सम्पदा से सम्पन्न्ा और अपने नाम के साथ सवर्ण जाति लिखने वालों, शासक-प्रशासक और मलाईदार तबके के लोगों को आरक्षित वर्ग में रखकर आरक्षण, नौकरी, अन्त्योदय, बी.पी.एल. लाभ निरन्तर दिया जा रहा है जिसके कारण अनारक्षित वर्ग के अन्तिम व्यक्ति अर्थात् वास्तविक कंगालों को तो लाभ से पूर्व की भाँति सदैव वंचित रहना पड रहा है। यह स्थिति अन्त्योदय नहीं अपितु अन्याय की द्योतक और असमानता तथा भेदभाव की प्रतीक है। पदों के आरक्षण सवर्ण जाति आरक्षण सम्बन्धी प्रावधानों का राजनीतिकरण हो जाने के कारण अन्य पिछड़े वर्गों का आरक्षण, पदोन्न्ाति में आरक्षण धर्म आधारित आरक्षण जैसे नवीन प्रारूपों ने देश में विरोध, तनाव एवं संघर्ष की स्थितियों को उत्पन्न्ा कर दिया है। संसद में लम्बित 117वें संविधान संशोधन विधेयक 2012 में देश भर में वाद-विवाद एवं संघर्ष जारी है जिसके कारण भारतीय समाज अगड़े (सवर्ण) और पिछड़े (आरक्षित) वर्गों के रूप में विभाजित हो रहा है। जिसके दुष्परिणाम जातीय-संघर्ष, जातीय तनाव, जातीय आन्दोलन, जातीय असहिष्णुता, जातीय-विषमता के रूप में हमारे समक्ष है। योग्य को योग्य पद न मिलने, भूमिका आवंटन में गुणवत्ता-योग्यता-कुशलता की उपेक्षा होने पर समाज में युवा असन्तोष, विचलन, अपराध, नक्सलवाद एवं आतंकवाद सहित दरिद्रता और भुखमरी जैसी समस्याएँ बढ़ा रही हैं।

समाज में कमजोर वर्गों को अछूत या वंचित या अस्पृश्य (दमित) कहा जाता है। ये अस्पृश्य जातियाँ औपचारिक एवं वैधानिक रूप से संविधान की अनुसूची में शामिल हो गई हैं। अतः इन्हें सामूहिक रूप से अनुसूचित जाति कहा कहा जाने लगा। वर्ष 1935 में भारत सरकार ने अस्पृश्य जातियों को कुछ विशेष सुविधाएँ देने के लिए एक अनुसूची तैयार की। इसमें लगभग 429 जातियाँ शामिल हो गईं, जिसमें 5-6 करोड़ व्यक्ति आते थे। सूची में शामिल होने के कारण ये जातियाँ अनुसूचित जाति कहलाने लगीं।

अस्पृश्ता का अर्थ उन निर्योग्यताओं से है, जो कि हरिजन जातियों पर सवर्ण जातियों ने लादी हैं। अस्पृश्य अपराध अधिनियम 1955 में कानूनन अस्पृश्यता का अर्थ लिख कर कहा गया है कि, ‘‘अस्पृश्यता के आधार पर व्यक्ति के (प) समान धर्म मानने वाले अन्य व्यक्तियों के लिए खुले पूजा के स्थान में प्रवेश से, किसी सार्वजनिक पूजा के स्थान में पूजा करने, प्रार्थना करने या धार्मिक क्रियाएँ करने से, (पप) किसी पवित्र जलाशय, कूप, झरने या जल स्रोत का उपभोग करने जैसा कि समान धर्म के अनुयायियों को उपयोग करने की अनुमति है, (पपप) होटल, दूकान, सार्वजनिक जलपान गृह, सार्वजनिक मनोरंजन स्थल अथवा सार्वजनिक आवागमन के साधन, अस्पताल, औषधालय, शैक्षिक संस्था या ट्रस्ट में पहुँचने या उपयोग से रोकना अपराध है।’’ अन्य शब्दों में अस्पृश्य वे जातियाँ हैं जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र-(प) सामाजिक, (पप) धार्मिक, (पपप) आर्थिक, (पअ) सास्कृतिक, (अ) राजनीतिक में कुछ निर्योग्यताओं से पीड़ित हैं। अछूत के छूने मात्र से अन्य जातियों के लोगों को अपवित्र माना जाता है। अछूतों को अंग्रेज बाहरी जातियाँ कहते थे। गोलमेज कान्फ्रेन्स-1931 में इन जातियों को हिन्दुओं से अलग घोषित किए जाने पर गान्धी जी ने जबरदस्त विरोध किया। वर्ष 1932 में गान्धी जी ने अन्दोलन कर पूना में आमरण अनशन किया तब पूना पैक्ट से अस्पृश्यों को हिन्दू समाज का अंग मान लिया गया। इसके बाद गान्धी जी ने इन जातियों के उद्धार का बीड़ा उठाया और सर्वप्रथम अछूत जातियों का नाम बदलकर हरिजन अर्थात् हरि के जन अर्थात् ईश्वर के व्यक्ति रखा। अस्पृश्य जाति दलित वर्ग कहलाई क्योंकि हिन्दू समाज में इनका शोषण हुआ और अब दलित शब्द को अपराध मानकर प्रतिबन्धित कर दिया गया है।

आज बेरोजगार और दरिद्र व्यक्तियों का जीवन बुरी तरह संकट ग्रसित है। भरपेट भोजन, पहनने के लिए स्वच्छ वस्त्र और रहने के लिए घर उनके सपने से भी परे हो रहे है। उनके मन मस्तिष्क पर मौत का साया मडराता दिखाई देता है। उनकी भूख की तड़फ और दर्द का विलाप धनी शासकों व प्रशासको को नाटक लगता है। उनका रक्त एवं काया व्यापारियों की आय के स्रोत हैं। लाचार का शिकार किया जाता है। शिकार अवसर पर ढ़ोल बजाकर उत्सव मनाए जाते हैं। अभिजन-व्यापारी दरिद्रों को ठीक उसी तरह शिकार बनाते हैं। जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है या सांप अपने अण्डों को स्वयं निगल जाता है।

व्यापारी, उद्योगपति, राजनेता, नौकरशाह और उनके गुर्गे उत्पादन के साधनों (मशीन, मिल, कारखाना, व्यवसायों व सरकारी नौकरी वाले) के उद्भव के साथ-साथ के दो विराट वर्गों में बंटे हुए हैं। प्रथम वर्ग अल्पसंख्यक उन लोगों का है जिनका इन उत्पादन के साधनों पर अधिकार है, अर्थात् व्यापारी, उद्योगपति, नौकरशाह, नेता। दूसरा वर्ग समाज के बहुसंख्यक श्रमिकों, बेरोजगार का है जिनके पास पूँजीं या जीविका के अन्य साधन नहीं हैं उनके लिए जीवित रहने का एक ही मार्ग खुला हुआ है और वह है कि वे अपने आपको रहीस के पास जाकर बेंच दें, अर्थात् अपने श्रम से उत्पादन कार्य में सक्रिय भाग लें और उसके बदले में कागजों पर नाम लिखें तथा वेतन के नाम पर खैरात कितना हेागा इसका निर्धारण श्रमिक नहीं, अपितु धनीवर्ग करता है। धनीवर्ग दरिद्रों की कमजोरियों को खूब जानता है और उसी के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। धनीवर्ग जानता है कि दरिद्र अपने श्रम और परिवार को भविष्य के लिए सुरक्षित करके नहीं रह सकता और न वह रातों-रात अपने को इतना संगठित या शक्तिशाली कर सकता है कि धनी लोगों से अपने श्रम का उचित वेतन का सौदा कर सके। फलस्वरूप धनी श्रमिक, बेरोजगार, दरिद्र व्यक्तियों से अत्यधिक मेहनत करवा तो लेता है और उसके बदले में नाम मात्र का वेतन खैरात के रूप में देता है, अर्थात् श्रमिक अपने श्रम से जितना मूल्य उत्पन्न्ा करता है, उसका उचित हिस्सा श्रमिक को वेतन के रूप में नहीं देता है, वरन् उसका एक बहुत छोटा भाग श्रमिक को देकर अधिकांश भाग धनी-पूँजीपति स्वयं हड़प जाता है।

मालिक, धनी, व्यापारी, अधिकारी, सरकार, नेता दरिद्रों से घृणा करते हैं। ये आलसी, अकुशल और समाज पर बोझ माने जाते हैं। इनको हर स्तर पर सताया जाता है, जलील किया जाता है एवं इनसे भेद-भाव किया जाता है। इनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं करता और ये शक्तिहीन होते हैं। इस कारण ये सदैव शक्तिशाली लोगों के आक्रमण एवं विद्वेष के निशाने बनाए जाते हैं। इन्हें निरक्षरता एवं सामाजिक पूर्वाग्रह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें सामूहिक शक्ति का अभाव होता है और जब कभी ये स्थानीय या लघु स्तर पर समाज के राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक अधिक शक्तिशाली समूहों के विरूद्ध एक होने का प्रयत्न करते हैं तो उन लोगों को लगता है, कि उनके आधिपत्य को खतरा है, इस कारण दरिद्रों को कुचल दिया जाता है। इन्हें ऋण पर ऊँची दर पर ब्याज देना पड़ता है। इन पर दोषारोपण किया जाता है। जिन कार्यालयों में ये जाते हैं, वहाँ इनकी ओर बहुत कम या बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता है। पुलिस तो सबसे पहले उन क्षेत्रों में जाती है जहाँ दरिद्र रहते हैं जैसे कि मात्र दरिद्र ही अपराध करते हैं। ये बिरले ही विश्वसनीय, भरोसे के और ईमानदार माने जाते हैं। इस प्रकार समाज के प्रत्येक स्तर पर प्रतिकूल रवैया इनकी आत्मछवि को गिराता है, इनमें हीन-भावना को जन्म देता है और अपनी सहायता के लिए साधन जुटने के प्रयत्नों पर रोक लगाता है।

दरिद्र और उनके आश्रित रोटी के लिए रोज अपना जीवन दांव पर लगाते हैं। यह कूडे़-कचडे़ के ढ़ेरों में कबाड़ बीनते हैं, तालाब-गड्डों से मेड़क-मछली ढँूढ़ते है, खेत-वन में पक्षी-खरगोश पकड़ते हैं, बिलों में सांप निकालते हैं, कोल्ड में सड़े आलू बीनते हैं, भीख माँगते हैं और रूखी-सूखी रोटी से अपना तथा आश्रितों के पेट की भूख की आग मिटाते हैं। इनके आवास गन्दगी के ढेरों, गन्दे नालों, तालाबों, गन्दगी क्षेत्र में कीडे- मकोड़ों के बीच टूटी-फूटी झोपड़ियों में हैं जहाँ जहरीले कीड़-मकोड़ों का प्रकोप है। कुत्ते, बिल्ली, बकरी, बन्दर, नांग, बिच्छू, गधे, खच्चर आदि परिवार के सदस्य के रूप इनके साथ रहकर इनकी आजीविका व सुरक्षा में साथ निभाते हैं। यह दरिद्र व उनके आश्रित शिक्षा एवं रोजगार सहित दरिद्र कल्याण योजनाओं तथा आरक्षण लाभ से जबरदस्त वंचित हैं। इनको मिलने वाले भूमि-पट्टे, आवास, राशन, नौकरी, सब्सिडी, लोन, आरक्षण सभी कुछ सक्षम एवं कर्मचारी हड़प रहे हैं। इन पर अपराधी का ठप्पा लगाकर दबंग इन्हें उत्पीडित कर बेगार कराते हैं और मादक द्रव्य, शराब आदि फर्जी मामलों फंसाकर जेल में डलवा देते हैं और स्त्रियों से शराब बिकवाते हैं। नौकरी मंे आरक्षण व्यवस्था होने के बावजूद इनकी बेरोजगारी देश-समाज के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

देश के दरिद्र व्यक्तियों की आय बहुत कम है। इतनी कम आय में औसत सदस्य संख्या 8-10 परिवार वाला व्यक्ति संतोषजनक जीवन-स्तर नहीं अपना सकता। यही कारण है उपभोग का स्तर इनमें अत्यन्त निम्न है। इनके भोजन में कभी रोटी और सब्जी तो कभी नमक रोटी, कभी सूखी रोटी और दूषित जल होता है तथा अधिकांश को भूखे पेट ही सोना पड़ता है। दरिद्रता के कारण बड़ी संख्या में दरिद्र परिवार जरूरी वस्त्रों के अभाव में जीवन-यापन कर हंै। ये एक ही वस्त्र को महीनों पहनते हैं जिससे उनका शरीर गन्दी बीमारियों से ग्रसित रहता है। कंगालों एवं उनके आश्रितों के तन पर वस्त्र नहीं होते हैं, पहने गए वस्त्र जगह-जगह कटे-फटे और गंदे होते हैं। दरिद्र व्यक्ति फटे-पुराने गंदे वस्त्रों में जिनके बच्चे निःवस्त्र रहकर और टूटी खाट या भूमि पर गुदड़ी बिछौने पर सोकर ठंडी रातें काटते हैं। लू-लपट व भीषण सर्दी से शरीर को सुरक्षित रखने के लिए उनके पास जरूरी वस्त्र नहीं होते और सर, उदर, पैर खुले रहते हैं। भीषण गर्मी-सर्दी व लू-लपट से तन सिकुड़ कर त्वचा झुर्रीदार और चेहरा काला पड़ जाता है। शरीर पर बड़े दाग-धब्बे हो जाते हैं और पैरों में विमाई और छालों के बड़े-बडे घाव हो जाते जाते हैं। कचड़ा-कबाड़ बीनने एवं सड़कों पर घूमने वाले दरिद्र बच्चे नंगे पैर एवं फटेहाल स्थिति में दिखते हैं। मकानों के नाम पर अधिकांश दरिद्र व्यक्तियों के पास झोपड़ियाँ हैं अथवा एक-एक कमरे में कई-कई व्यक्ति-परिवार रहते हैं। अब तो मकानों की समस्या यहाँ तक जटिल हो गई है कि अनेकों परिवार फुटपाथ पर अथवा सड़क के आस-पास प्लास्टिक तानकर गुजारा करते हैं। न्यून एवं अपौष्टिक भोजन, तन ढकने को अपर्याप्त कपड़ा तथा रहने के लिए मकानों का अभाव इनकी दरिद्रता का द्योतक है। दरिद्रों के आहार में फल, दूध और सब्जियों का अभाव रहता है और व्यक्ति इन अपौष्टिक आहार के कारण स्वस्थ नहीं रह सकते। व्यक्तियों की स्वास्थ्यहीनता एवं उनकी दरिद्रता दोनों ने मिलकर एक चक्रव्यूह बना लिया है। चूँकि व्यक्ति दरिद्र हैं, अतः वे अस्वथ्य रहते हैं तो और अधिक दरिद्र हो जाते हैं।

दरिद्र बस्तियों में यह स्थिति और भी भयावह है जहाँ की अशिक्षा और निरक्षता 95-100ः बनी हुई है। छात्र-छात्राओं, किशोरों, प्रशिक्षुओं एवं शिक्षा डिग्री-डिप्लोमा धारकों की शैक्षिक स्थिति में बड़ी अज्ञानता एवं निरक्षरता है। निम्न से उच्च शिक्षित बच्चों, किशोरों, छात्रों युवाओ को सूर्योदय-सूर्यास्त की दिशाओं एवं अक्षरों का ज्ञान नहीं है। अधिकांश नहीं जानते हैं कि वे किस जनपद-प्रदेश के निवासी हैं। लिखना-पढ़ना उनके वश की बात नहीं है। निरक्षरता और अज्ञानता उनके पतन की नियत बन चुकी है।

देश में शासकीय, एडिड एवं स्ववित्त पोषित विद्यालयों-विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में प्राचार्य, आचार्य, अधिकारी, कर्मचारी और बोर्ड और आयोग कार्यरत हैं। जिनके वेतन-भत्तों एवं छात्रों के लिए अनुदान, छात्रवृत्ति, शुल्क प्रतिपूर्ति, मिड-डे-मील, दूध, फल, बस्तों, डेªसों आदि पर राष्ट्रीय आय का बहुत बड़ा हिस्सा व्यय हो रहा है। इसके बावजूद इनमें गरीब छात्रों की संख्या नाम मात्र की है। क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई न होने से दरिद्र सहित कोई भी अपने प्रतिपाल्यों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने को तैयार नहीं है और धन के अभाव में दरिद्र अपने बच्चों को प्राइवेट या उच्च कालेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ा नही सकता है। देश-राज्यों में बने बड़े-बड़े लगभग सभी विद्यालय-विश्वविद्यालय दरिद्र व्यक्तियों के लिए व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं। आँगनबाड़ी केन्द्रों को मिलने वाली पंजीरी भैंसें खा रही हैं। सर्वशिक्षा अभियान के अन्तर्गत पौढ़ शिक्षा के प्रेरक निरक्षरों को न तो पढ़ाते हैं और न ही निरक्षरों को साक्षर बनाते हैं। साक्षरता परीक्षा फर्जी कराते हैं। आश्रम पद्धति विद्यालयों में अनुसूचित एवं जनजाति के दरिद्र बच्चों के स्थान पर अपात्रों को प्रवेश देने से वास्तविक निरक्षर दरिद्र वंचित हैं। कस्तूरबा विद्यालयांे में दरिद्रों की निरक्षर किशोरियों हेतु गुणवत्तायुक्त मानकीय शिक्षा एवं पंजीकरण में फर्जीबाडे़ और शिक्षण उपेक्षा बाधक हैं। मूक-बधिर केन्द्र पर कार्यरत अधिकांश शिक्षक शिक्षण कार्य में रूचि न लेकर अन्य व्यवसायों एवं राजनीति में सक्रिय हैं तथा अपंग छात्रों की शिक्षा एवं व्यवस्था रामभरोसे है। धार्मिक स्थलों एवं अल्पसंख्यकों के नाम पर संचालित स्कूलांे में धर्म एवं शिक्षा का दुरुपयोग होकर दरिद्र आश्रितों को अन्धानुकरण करने हेतु बाद्ध किया जाता है और दान-अनुदान व छात्रवृत्तियों को हड़पकर मठाधीश निजी लाभ कमाने में जुटे हैं। दरिद्र आश्रित पढ़ाने वाले शिक्षण संस्थानों के प्राचार्य, शिक्षक कक्षाओं में पढ़ाने नहीं जाते। प्राचार्यों के कालेज आने की सूचना मोबाइल पर सर्कुलेट होती है तभी स्टाफ-शिक्षक छात्र कालेज आते हैं।

संवैधानिक पदों पर आसीन और जनप्रतिनिधित्त्व करने वाले आधिकांश रहीसों का जन्म से लेकर आज तक नगर निवास करने और रोटी-चैका घरेलू सभी गतिविधियाँ नगर तक सीमित होने के बावजूद अन्य प्रदेश, क्षेत्र, जिला और गाँव के फर्जी वोटर बने हुए हैं। यह लोग धन, पद एवं वोट आधारित फर्जी प्रमाणपत्रों औरं संगठित अपराधियों के प्रभाव से ग्राम प्रधान से लेकर सदनों में जनप्रतिनिधित्त्व पदासीनता हथियाकर सरकारी विकास निधियों का धन-सम्पत्ति हड़प रहे हैं। इनमें अधिकांश ग्राम-क्षेत्र की जन-समस्याओं से बेखबर रहकर अपने ठेकों-व्यापारों में जुटे रहते हैं एवं सदन की बैठक-प्रस्ताव में जनसमस्याओं पर कोई चर्चा नहीं करते हैं।

दरिद्र व्यक्तियों की समस्याओं के निरीक्षण में प्राप्त तथ्यों पर विचार के निष्कर्षस्वरूप-नगर एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जिन्हें दरिद्र मानकर इंदिरा-लोहिया-कांशीराम-प्रधानमंत्री आवास, शौचालय, समाजवादी-विधवा वृद्धा, बिकलांग पेंशन एवं अन्त्योदय-बी.पी.एल.राशन लाभ दिया गया है/जा रहा है। इनमें सभी अन्त्योदय धारी एवं 70-85ः बी.पी.एल.औरं पेंशन धारक अपात्र हैं। इनमंे अधिकांश व्यक्ति-परिवारों के पास बड़े लेंटर्स, भूमि, नगर में हवेली, मोटरसाइकिल, कार, ट्रक, ट्रेक्टर, थ्रेसर, ट्यूबबेल, फ्रिज, कूलर, रंगीन डिस टी.वी., कम्प्यूटर, दूकान, गैस कनेक्शन, उद्योग, व्यापार, नौकरी, प्लाट्स, मिल, पैतिृक सम्पत्ति का स्वामित्त्व हैं। अधिकांश असहाय बेवा- वृद्धा-समाजवादी पेंशनर्स के पुत्र विवाहित व सम्पन्न्ा हैं। अनेक बिकलांग पेंशनर्स पूर्ण स्वस्थ्य या मामूली शारीरिक कमी (40ः से कम) एवं पर्याप्त आय के बावजूद पेंशन धारक बने हैं। और अनेक लोग अनेक पेंशन ले रहे हैं। इस प्रकार दरिद्रों के लिए बनीं कल्याण योजनाओं का लाभ दरिद्रों के स्थान पर फर्जी दरिद्र (रहीस) ले रहे हैं।

निष्कर्ष भारतीय संविधान लागू होने के बाद आरक्षण सीमा 10 वर्ष होने के उपरान्त आरक्षण समीक्षा बगैर समय वृद्धि ठीक उसी प्रकार अवैध है जिस प्रकार 21वीं सदी के शुरू में गरीबी उन्मूलन हेतु बनी योजना अन्त्योदय लाभ की वैधानिकता मात्र 11 माह होने के बावजूद धारक की धारिता 17 वर्ष बाद भी बनी है जो अन्त्योदयधारी धनी हैं। आरक्षण व विकास योजनाओं का लाभ स्वार्थी, विध्ववंशक, नाशक, ठगों, रहीसों एवं संगठित अपराधियों की काली कमाई तक सीमित हो रहे हैं। दरिद्र, असहाय, निरीह, पीड़ित, दुःखी, वृद्ध, बीमार की पुकार सुनने वाला कोई नहीं हैं और यदि कोई दरिद्रों की मद्द करने की चेष्टा भी करता है तो संगठित अपराधी उसे समूल नष्ट करने में कोई कसर बांकी नहीं रखते हैं। अस्पृश्ता-निर्योग्यता पीड़ित-गरीब पर जो भौतिक सुविधाओं से सम्पन्न्ा धन, पद और प्रतिष्ठा धारियों ने लादी है वही गरीब आरक्षण लाभ पाने का अधिकारी है।

सुझाव-भारतीय संविधान में वर्णित आरक्षण व्यवस्था का लाभ अस्पृश्यता या निर्योग्यताओं से पीड़ित दरिद्र को मिलना चाहिए न कि धन-पद-प्रतिष्ठा धारकों को। अन्त्योदय एवं आरक्षण की समीक्षा बगैर लम्बी अवधि से इसकी समय सीमा में बारम्बार वृद्धि देश एवं व्यक्ति के विकास हेतु उचित नहीं हैं। वी.आई.पी. द्वारा आरक्षण लाभ का दुरुपयोग एवं पात्रों की उपेक्षा से बेरोजगारों व दरिद्रों एवं जनसामान्य में हताशा और असन्तोष पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। आरक्षण समय-सीमा वृद्धि हेतु समीक्षा एवं सही शोध तथ्यों पर भी विचार होना चाहिए।