सोनभद्र के दलित-आदिवासी और भूमि का प्रश्न

सोनभद्र के दलित-आदिवासी और भूमि का प्रश्न

-एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

सोनभद्र में 17 जुलाई को उभ्भी गाँव में ज़मीन के कब्ज़े को लेकर आदिवासियों के नरसंहार की घटना से सभी को सतर्क होने तथा समय से भूमि के प्रशन को हल करने की ज़रुरत और महत्त्व को सझना चाहिए. इसके लिए आदिवासी बाहुल्य जिले सोनभद्र, चंदौली तथा इलाहबाद में दलितों तथा आदिवासियों के लम्बे समय से चले आ रहे तनाव, शोषण तथा संघर्ष के इतिहास को जानना और समझना ज़रूरी है. सोनभद्र उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है. यह एक आदिवासी-दलित बाहुल्य जिला है. इस जिले की कुल आबादी 18.62 लाख है जिस में से 4.21 लाख दलित और 3.85 लाख आदिवासी हैं जोकि कुल आबादी का लगभग 44% है. यह जिला कैमूर की पहाड़ियों में बसा है. इसका 3.26 हेक्टेयर भाग जंगल और पहाड़ से आच्छादित है. इसकी सीमा बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से लगती है.इसके पड़ोसी जिलों चंदौली के चकिया, नौगढ़ क्षेत्र तथा इलाहबाद में भी आदिवासियों की काफी आबादी है. जैसाकि सर्वविदित है कि ग्रामीण परिवेश में भूमि का बहुत महत्त्व होता है. सोनभद्र जिले की कुल आबादी (18.62 लाख) का तीन चौथाई भाग (15.48 लाख) ग्रामीण क्षेत्र में रहता है. अतःइन सबके लिए भूमि का स्वामित्व अति महत्वपूर्ण है. ग्रामीण लोगों में बहुत कम परिवारों के पास पुश्तैनी ज़मीन है. अधिकतर लोग जंगल की ज़मीन पर बसे हैं परन्तु उस पर उनका मालिकाना हक़ नहीं है. इसी लिए जंगल की ज़मीन पर बसे लोगों को स्थायित्व प्रदान करने के उद्देश्य से 2006 में वनाधिकार अधिनयम बनाया गया था जिसके अनुसार जंगल में रहने वाले आदिवासियों एवं वनवासियों को उनके कब्ज़े वाली ज़मीन का मालिकाना हक़ अधिकार के रूप में दिया जाना था. इस हेतु निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक परिवार का ज़मीन का दावा तैयार करके ग्राम वनाधिकार समिति की जाँच एवं संस्तुति के बाद राजस्व विभाग को भेजा जाना था जहाँ उसका सत्यापन कर दावे को स्वीकृत किया जाना था जिससे उन्हें उक्त भूमि पर मालिकाना हक़ प्राप्त हो जाना था.

वनाधिकार अधिनयम 2008 में लागू हुआ, उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुत मज़बूत सरकार थी. उसी वर्ष इस कानून के अंतर्गत सोनभद्र जिले में वनाधिकार के 65,500 दावे तैयार हुए परन्तु 2009 में इनमे से 53,500 अर्थात 81% दावे ख़ारिज कर दिए गये. मायावती सरकार की इस कार्रवाही के खिलाफ आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने अपने संगठन आदिवासी-वनवासी महासभा के माध्यम से आवाज़ उठाई परन्तु मायावती सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. अंतत मजबूर हो कर हमे इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को सभी दावों की पुनः सुनवाई करने का आदेश अगस्त, 2013 को दिया परन्तु तब तक मायवती की सरकार जा चुकी थी और उस का स्थान अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने ले लिया था. हम लोगों ने 5 साल तक अखिलेश सरकार से इलाहबाद हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन में कार्रवाही करने का अनुरोध किया परन्तु उन्होंने हमारी एक भी नहीं सुनी और एक भी दावे का निस्तारण नहीं किया. इससे स्पष्ट है कि किस प्रकार मायावती और अखिलेश की सरकार ने सोनभद्र के दलितों और आदिवासियों को बेरहमी से भूमि के अधिकार से वंचित रखा.

आइये वनाधिकार कानून को लागू करने के बारे में अब ज़रा भाजपा की योगी सरकार की भूमिका को भी देख लिया जाए. यह सर्विदित है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 2017 विधान सभा चुनाव में अपने संकल्प पत्र में लिखा था कि यदि उसकी सरकार बनेगी तो ज़मीन के सभी अवैध कब्जे (ग्राम सभा तथा वनभूमि ) खाली कराए जायेंगे. मार्च 2017 में सरकार बनने पर जोगी सरकार ने इस पर तुरंत कार्रवाही शुरू कर दी और इसके अनुपालन में ग्राम समाज की भूमि तथा जंगल की ज़मीन से उन लोगों को बेदखल किया जाने लगा जिन का ज़मीन पर कब्ज़ा तो था परन्तु उनका पट्टा उनके नाम नहीं था. इस आदेश के अनुसार वनाधिकार के ख़ारिज हुए 53,500 दावेदारों को भी बेदखल किया जाना था. जोगी सरकार की बेदखली की इस कार्रवाही के खिलाफ हम लोगों को फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. हम लोगों ने बेदखली की कार्रवाही को रोकने तथा सभी दावों के पुनर परीक्षण का अनुरोध किया. इलाहबाद हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध पर बेदखली की कार्रवाही पर रोक लगाने, सभी दावेदारों को छुटा हुआ दावा दाखिल करने तथा पुराने दावों पर अपील करने के लिए डेढ़ महीने का समय दिया तथा सरकार को तीन महीने में सभी दावों की पुनः सुनवाई करके निस्तारण करने का आदेश दिया. अब उक्त अवधि पूर्ण हो चुकी है परन्तु योगी सरकार द्वारा इस संबंध में कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी है.

इसी बीच माह फरवरी, 2019 में वाईल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया तथा दो अन्य संस्थाओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वनाधिकार कानून की वैधता को चुनौती दी गयी तथा वनाधिकार के अंतर्गत निरस्त किये गये दावों से जुडी ज़मीन को खाली करवाने हेतु सभी राज्य सरकारों को आदेशित करने का अनुरोध किया गया. मोदी सरकार ने इसमें आदिवासियों/वनवासियों का पक्ष नहीं रखा. परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई तक ख़ारिज हुए सभी दावों की ज़मीन खाली कराने का आदेश पारित कर दिया. इससे प्रभावित होने वाले परिवारों की संख्या 20 लाख है जिसमे सोनभद्र जिले के 65,500 परिवार हैं. इस आदेश के विरुद्ध हम लोगों ने आदिवासी वनवासी महासभा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई जिसमें हम लोगों ने बेदखली पर अपने आदेश पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों का पुनर्परीक्षण करने का अनुरोध किया. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए 10 जुलाई तक बेदखली पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों की पुन: सुनवाई का आदेश दिया है जिस पर कार्रवाही की जानी थी परन्तु उत्तर प्रदेश में अब तक कोई कारवाही की गयी प्रतीत नहीं होती है.

इसी प्रकार सोनभद्र जिले में ग्राम समाज की हजारों हेक्टेयर ज़मीन उपलब्ध है जिसका भूमिहीनों को वितरण नहीं किया गया. यह काम मायावती के चार वार के मुख्यमंत्री काल में नहीं किया गया जबकि शुरू में बसपा का नारा रहा है,” जो ज़मीन सरकारी है, वो ज़मीन हमारी है.” अखिलेश सरकार ने तो जानबूझ कर दलितों को भूमि आवंटन किया ही नहीं बल्कि रेविन्यू कोड को संशोधित करके दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता ही बदल दी थी. वर्तमान में ग्राम समाज की ज़मीन पर दबंग लोगों का कब्ज़ा है. इस समय ग्राम समाज की ज़मीन पर यदि दलितों का कब्ज़ा है भी तो उसका पट्टा न होने के कारण उन्हें योगी सरकार का बेदखली का नोटिस मिल चुका है. मायावती और अखिलेश सरकार द्वारा भूमिहीन दलितों को ग्राम समाज की ज़मीन का पट्टा न दिए जाने से वे इन दोनों से बहुत नाराज़ थे जिस कारण उन्होंने इनके गतबंधन को वोट नहीं दिया.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि किस तरह पहले मायावती और फिर अखिलेश यादव की सरकार ने दलितों, आदिवासियों और वनवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत भूमि के अधिकार से वन्चित किया है और भाजपा सरकार में उन पर बेदखली की तलवार लटकी हुयी है. यह विचारणीय है कि यदि मायावती और अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में इन लोगों के दावों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करके उन्हें भूमि का अधिकार दे दिया होता तो आज उनकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती. इसी प्रकार यदि मायावती ने अपने शासन काल में भूमिहीनों को ग्रामसभा की ज़मीन, जो आज भी दबंगों के कब्जे में है, के पट्टे कर दिए होते तो उनकी आर्थिक हालत कितनी बदल चुकी होती.

अतः अब यह ज़रूरी है कि भाजपा सरकार सोनभद्र, चकिया-नौगढ़,(चंदौली), मिर्ज़ापुर तथा उत्तर प्रदेश के अन्य जिले यहाँ पर आदिवासी रहते हैं और वहां पर वनाधिकार कानून लागू होता है, में सुप्रीम के निर्देशानुसार निर्धारित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए सभी दावों का पुनरपरीक्षण करवाए तथा उन्हें भूमि का मालिकाना हक़ दे. इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश सरकार भूमि के प्रशन का सही अध्ययन, अनुसन्धान तथा ट्रस्ट, सहकारी समितियों तथा अन्य बेनामी भूमि धारकों का पता लगाने एवं ग्राम समाज तथा वन की भूमि पर अवैध कब्जों का पता लगाने हेतु भूमि आयोग का गठन करे. यह आयोग पूरे प्रदेश में ग्राम समाज, बंजर, भूदान तथा अवैध कब्जों वाली भूमि का एक निश्चित अवधि में अध्ययन करे तथा इसके भूमिहीनों को आवंटन सम्बन्धी रिपोर्ट प्रस्तुत करे.

यह भी ज्ञातव्य है कि पूर्व में पूर्वांचल खास करके चंदौली, सोनभद्र तथा इलाहाबाद जिलों में भूमि के मामले को लेकर ही तथाकथित नक्सलवाद की समस्या रही है. अब भी अगर भूमि के प्रशन को हल नहीं किया गया तो उक्त सामाजिक- आर्थिक विषमता एवं शोषण के विरुद्ध जन आन्दोलन खड़ा हो सकता है. यद्यपि हम लोगों ने बहुत सारे पुराने नक्सलियों को अपनी पार्टी, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट में शामिल करके उनको राजनीतिक गतिविधियों में लगा रखा है और उनके संघर्ष को कानून के अन्दर नई दिशा दी है परन्तु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोभाद्र, चंदौली तथा मिर्ज़ापुर की सीमा नक्सलवाद तथा माओवादी गतिविधियों से प्रभावित सीमावर्ती बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश से लगती है, का प्रभाव उत्तर प्रदेश के इन जिलों में भी पड़ सकता है. अतः उत्तर प्रदेश को उस प्रकार की अवैधानिक गतिविधियों से बचाने के लिए भूमि के प्रशन को उच्च प्राथमिकता के आधार पर ग्राम समाज तथा वनाधिकार की भूमि को भूमिहीनों तथा आदिवासियों में बाँटना देशहित तथा जनहित में ज़रूरी है.