सुभाष बाबू को श्रद्दांजलि

सुभाष बाबू को श्रद्दांजलि

यह मेरा सौभाग्य ही है कि मैं भारत के महान सपूत, स्वतंत्रता संग्राम के एक अगवा ओर आजाद हिन्द फौज के महान नायक पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं खुशकिस्मत हूँ कि देश के जननायक, महान वीर और शहीद सुभाष चन्द्र बोस के एक प्रमुख सहयोगी कर्नल महबूत अहमद से मिला है। मैंने उनके मुख से अनेकों गोष्टी और सेमीनारों में नेताजी की गाथा और देश के लिऐ उनके बलिदानों की दास्तान सुनी है। सुभाष बाबू की जीवनी पर उन्होंने उर्दू और हिन्दी में एक पुस्तक भी लिखी है जिसे खुदाबख्श पुस्तकालय पटना के तत्वावधन में प्रकाशित भी किया गया है। मैं जब पटना विश्वविद्यालय का छात्रा था और खुदाबख्श  पुस्तकालय का सदस्य, तो पुस्तकालय द्वारा आयोजीत गोष्ठी में महबूब साहेब का आना जाना लगा रहता था, और शायद आप पुस्तकालय के सदस्यों में से भी थे। उस समय महबूब साहब किसी अरब देश में भारत के राजदूत रह चुके थे। पिछले दिनों जब मैं करीब करीब बीस वर्षों के पश्चात् पटना गया तो, दृश्य बदला हुआ था, न व नगरी न व ठाँव! खुदाबख्श भी....! और कर्नल साहेब का घर, उन के उत्तराध्किारियों ने किसी बिल्डर को बेच कर कहीं और जा चुके थे। नेताजी के जन्म दिन 23 जनवरी पर मैं कर्नल साहेब की यादों को अपने शब्दों में ढालने का प्रयास कर रहा हूँ। 

कुछ कर्नल महबूत के सम्बंध् में बताता चलूं, महबूब साहेब 72 वर्ष की आयु में 19 मार्च 1992 को इस दुनिया से चले गए। महबूत साहेब का जन्म 1920 में पटना में हुआ था। आप नेता जी के चन्द युवा, और बड़े ही विश्वासपात्रा साथियों और सहयोगियों में से थे। कर्नल साहेब की शिक्षा देहरादुन स्थित राॅयल इण्डियन मलेट्री काॅलेज में हुई थी, अखिल भारतीये प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात् आप की नियुक्ति सेकन्ड लेफ्टिनेन्ट के रूप में हुई थी। 1942 में महबूत ने ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़कर, अपने आपको आजाद हिन्द फौज, नेताजी और भारत माता के हवाले कर दिया था। कर्नल साहेब ने अपनी आत्मकथा में ब्रिटिश सरकार की नोकरी छोड़ने और आजाद हिन्द फौज में शामिल होने और नेता जी के साथ बीताये पलों को 1985 में पटना से निकलने वाले हिन्दी दैनिक, पाटलीपुत्र टाइम्स में छापा था, जिसे बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में अनुवाद भी किया गया और उनके द्वारा लिखे गऐ लेख को पुस्तक का आकार दिया गया था। महबूब साहेब ने अपने एक व्याख्यान में कहा था कि मेरा जन्म चैहट्टा (पटना) में हुआ था, मेरा सम्बन्ध् एक गरीब परिवार से था, पिता जी मामूली डाॅक्टर थे, 1932 में जब देहरादून पढ़ाई करने गया। उस समय मैं ग्यारह वर्ष का था, कर्नल साहेब के अनुसार देहरादुन मंे वह पहले बिहारी छात्रा थे और उनके छः महीनों के बाद कर्नल एन के सिंहा साहेब देहरादून पढ़ने आए थे। उन्होंने कहा था कि एक वर्ष पश्चात् वह स्कूल फुटबाल टीम के कैप्टन बने थे, आल इण्डिया संयुक्त सेना परीक्षा में वह दूसरे प्रयास में सफल हुऐ थे। कर्नल साहब ने कहा था, मुझे याद आता है। देश प्रेम का वह जनून, याद आता है देश पर मर मिटने का जज्बा और उन जज्बों में कैप्टन राम सिंह, शोकत मल्लिक, कर्नल हबीब, शाहनवाज खान और उन देशभक्त चेहरों में सबसे आकर्षक और सुन्दर नेता जी का। 1943 में नेता जी को देखने और उन्हें सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था। उस समय मैं ब्रिटिश इण्डियन सेना में सेकेण्ड लेफ्रटीनेंट के पद था। 1940 में मिलेट्री परीक्षा में पास होकर फौज के एक बटालियन के साथ वर्मा भेजा गया थां उस समय हिटलर की सेना यूरोप को रोनदेन के करीब थी। 1943 में मुझे सिंगापुर भेजा गया जहां पर मेरी मुलाकात नेता जी से हुई थी। कैथे भवन में आयोजित उनके भाषण को सुनकर मैंने अपने आप को नेता जी और देश के हवाले कर दिया था और मुझे आजाद हिन्द फौज में भर्ती कर लिया गया और भर्ती के एक महीने बाद मुझे सुभाष रेजिमेन्ट का ऐजूटेन्ट बनाया गया और इसके अध्ीन मेरा पहला मोर्चा था। भारत, वर्मा सीमा जहां पर हमारी पहली मुठभेड़ ब्रिटिश सेना से हुई थी और इस लड़ाई में प्राप्त जीत ने हमारे हौसलों को और बढ़ाया और नेताजी का प्रत्येक शब्द मुझे आशवाणी लगता था। इस जीत के पश्चात् 1944 ई. में इम्फाल के समीप मैटिंग पर हमारा अगला मार्च था और भारतीय जमीन पर हमने आजाद हिन्द फौज का झण्डा फहरा दिया और कर्नल शोकत मलिक की अगुवायी में मैरिंग में आजाद हिन्द सरकार का ऐलान कई दिनों तक टोकियो रेडियो और ताशकन्द रेडियो से प्रसारित होता रहा। इस जीत पर नेता जी का सम्बोध्न अविस्मरणीय रहा। इस अवसर पर नेताजी ने शोकत मलिक को विशेष प्रशस्ती पत्र भेंट दिऐ किऐ। 1944 में रंगुन पहुंचते ही नेता जी ने मुझे अपने पास बुला लिया था। एकान्त में उन्होंने मुझसे (महबूब) कहा था कि तुम आज मेरे भरोसे का नेतृत्व करोगे और आज आजाद हिन्द फौज का सारा दारोमदार तुम पर है और मैं नेता जी के भरोसों पर खड़ा उतरा और अपनी जिम्मेवारी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया। रंगुन में आजाद हिन्द फौज में भर्ती होने वालों की बड़ी संख्या थी। नेताजी के आते ही नेताजी जिन्दाबाद और जय हिन्द के नारों से वातावरण गुंज उठा था और यहीं से नेता जी ने अपना ऐतिहासिक नारा ‘‘तुम मुझे खुन दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’ दिया था। 20 से 22 घंटों तक कठिन परिश्रम और लगातार काम करने वाले नेता जी हम सबके आदर्श थे। अगस्त 1944 को जब आजाद हिन्द के कुछ सिपाही अंग्रेजी सेनाओं से लड़ते हुऐ जख्मी हुऐ थे जिनमें लाल सिंह, राम प्रसाद, मुहम्मद खान, मेजर आबिद हसन थे, नेता जी मुझे साथ लेकर उनसे मिलने माण्डले अस्पताल गऐ थे। नेता जी का दर्द जख्मी जवानों के पति मैंने देखा भी था और महसूस भी किया था।

सिंगापुर में नेताजी ने आजाद हिन्द फौज की कार्यवायी को तेज करने और जापान से हथियार खरीदने का फैसला किया था और नेताजी के सम्बोध्न का भारतीयों पर इतना प्रभाव पड़ा कि लोग अपना सब कुछ देश सेवा और नेताजी पर बलिदान करने लगे। हबीब नामक व्यक्ति ने अपना सारा धन और अपनी सारी सम्पति आजाद हिन्दी फौज के नाम कर दिया था। नेता जी ने आगे बढ़कर उनका अभिवादन तक किया था। सिंगापुर में नेताजी के जन्मदिन के अवसर पर भारतीयों ने उन्हें सोना चांदी से तौला था, एक गुजराती महिला ने नेता जी के हाथों में अपनी जीवन भर की कमाई रख दी थी। नेताजी ने कहा था बहन तुम्हारी चरणों की ध्ूल प्राप्त करने के लिए देवताओं का मन भी आज करता होगा।

नेताजी भारत की गरीबी, खस्ताहाली और अन्य खराबियों के लिये ब्रिटिश सरकार को जिम्मेवाद मानते थे। नेताजी देश में समाजवाद स्थापित करना चाहते थे। नेता जी ने मुझे बताया था, मैं प्रत्येक दिन अपने खाने में से दो रोटियां बचा लेता और स्कूल के रास्ते में बैठी एक बूढ़ी महिला को देता। एक दिन जब उसके हिस्से का रोटी लेकर गया तब वह नहीं थी। मैंने उसके हिस्से की रोटी वहीं रख दी। बाद में पता चला कि वह मर गयी है। एक खुद्दार व्यक्तित्व के स्वामी नेताजी समाज और देश की सेवा के लिऐ सदैव तत्पर रहते थे। महबूब साहेब कहते थे कि मुझे उस समय बड़ा आघात और दुख होता है जब नेता जी के विरोध्ी और आलोचक उन्हें जमर्नी और जापान का तनख्वाहदार कहते हैं। आजाद हिन्द फौज की तत्कालीन सरकार ने अपनी व्यवस्था चलाने के लिऐ जो कर्ज लिये थे। नेता जी ने उस कर्ज की किस्त जापानी बैंक के माध्यम से समय समय पर बर्लिन भेजते रहे। आजाद हिन्द फौज का मुख्यालय रंगून में स्थापित किऐ जाने के तुरन्त पश्चात् ही सेनाओं को भारत की ओर भेजने का काम शुरू हो गया था। और कई स्थानों पर झड़पें हुई और नौ महीनों के अन्दर आजाद फौज की सेनाएं भारत में घुस गई थी। यह कार्य कितना कठिन होगा उस समय आप अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं। 5 अप्रैल 1944 को नेता जी के हाथों रंगुन में आजाद हिन्द फौज के राष्ट्रीय बैंक की स्थापना हुई थी। लगातार वर्ष ने हमारे इरादे ध्वस्त कर दिये और हमारे बड़े-बड़े सैन्य अध्किारी और सेना के जवान मलेरिया से मारे गऐ।

1945 में जर्मनी के समर्पण के बाद भी जापान लड़ता रहा। वाऐस राय और कांग्रेस के मध्य वार्ता को देखते हुए नेता जी ने सिंगापुर रेडियो से काँग्रेस के नेताओं और गाँध्ी जी से अनुरोध् किया कि वह वाऐस राय की बात में नहीं आऐ। 15 अगस्त 1945 को जापान ने भी समर्पण कर डाला और 17 अगस्त तक विश्व में बदलते राजनीति परिदृश्य ने आजाद हिन्द फौज और नेताजी को एक अलग मुकाम पर ला खड़ा कर दिया था। मेरी (कर्नल महबूब) मुलाकात कर्नल हबीब से, दिल्ली के लाल किला में एक कैदी के रूप में हुई थी। मेरे पश्चात् कर्नल हबीब को लाया गया था। मैंने (महबूब) ने कर्नल हबीब से पूछा था- हबीब तुम तो नेता जी के साथ फारमौसा में थे। और तुम लोग साथ साथ डाऐरेन जाने वाले थे फिर क्या हुआ? कैसे हुआ? कर्नल हबीब के ही शब्दों में- 18 अगस्त 1945, फारमोसा के एक होटल में, मैं (हबीब) और नेता जी अलग कमरों में ठहरे हुऐ थे, प्रातः 5 बजे जब मैं उठा तो नेता जी कुछ आवश्यक कामकाज निबटा रहे थे, नेता जी अध्कि उर्जावान और सुन्दर दिखाई पड़ रहे थे उन्होंने मुझे तैयार हो जाने का आदेश दिया, जैसे उन्हें स्वतंत्रता की कुंजी मिल गई हो। नेताजी ने मुझसे कहा कि हबीब आज हम दोनों 10 बजे की उड़ान से डाऐरेन जा रहे हैं और डाएरेन पहुंच कर हमें रूसी नेताओं से वर्ता करनी है। उत्साह और आत्मविश्वास से भरे नेता जी ने कहा था कि हमने ऐसी योजना तैयार कर ली है। जिस पर उन्हें सहमत होना ही होगा। हबीब तुम यकीन करो अगर रूसी नेताओं ने सहमति दी तो 25 अगस्त तक भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत होना निश्चित है और लाल किला हमारी मुट्ठी में होगा। नेताजी ने कहा था, हबीब तुम हमारे साथ हो छः सात घंटे और इंतजार करो। ठीक 10 बजे डाऐरेन को उड़ान भरने वाली जहाज, में, हम दोनों बैठ गऐ। 20 मिनट के पश्चात् सूचित किया गया कि अब जहाज उड़ान के लिए तैयार है। नेता जी अधिक से अधिक भावुक होते जा रहे थे, कह रहे थे महबूत जिस प्रकार से जहाज उड़ने वाला है उसी प्रकार से एक सप्ताह के अन्दर अन्दर अंग्रेज हमारे देश को छोड़ कर उड़ जायेगा और तब हम भारत की ध्रती पर अपना झण्डा फहरायेंगे। जहाज रनवै पर दौड़ने लगा, मैं नेता जी के बगल में बैठा था। नेता जी किसी गहरे सोच में डूबे हुए थे। जहाज जैसे ही हवा में उड़ा जहाज ने झटका लिया और और एक जोरदार आवाज हुई और जहाज टुकड़े-टुकड़े होकर हवाई अड्डा पर बिखर गया, मैं बूरी तरह जख्मी था, मगर मुझे स्वयम से अध्कि नेता जी की चिंता थी। मैंने जहाज के टुकड़ों को जलते देखा था। नेता जी को हल्की चोट आई थी। हम दोनों को फारमोसा के एक अस्पताल में ईलाज के लिऐ ले जाया गया था। मुझे और नेता जी को अलग अलग वार्ड में रखा गया, यह था फारमोसा रेडक्रास अस्पताल। दो घंटे के पश्चात् मुझे सूचना दी गई कि नेता जी अब जीवित नहीं है। मैं (हबीब) पागलों सा व्यवहार करने लगा और मैं अस्पताल के सुरक्षा घेरे में ले लिया गया। उसके पश्चात् क्या हुआ मुझे कुछ भी नहीं पता। और मैं पांच दिनों तक बेहोश रहा, मुझे बार बार बेहोशी का इंजेक्शन दिया जाता रहा था। जब मैं होश में आया तो पता चला कि 22 अगस्त से ऐलान किया जा रहा है कि नेता जी की मृत्यु हवाई हादसे में हो गई है। मगर नेता जी, और उनके सहयोगी आज भी स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात् हमारे रोम रोम और अंग-अंग में बसते हैं। 

आजाद हिन्द फौज के गिरफ्रतार जवानों की पैरवी जवाहरलाल नेहरु, भोलाभाइ देसाई, आसिफ अली, सर तेजबहादूर सपरु और कैलाश नाथ काटजू कर रहे थे। अंग्रेजी सरकार ने जिन तीन फौजी अधिकारीयों पर मुकदमें की कार्यवायी आरम्भ की थी उनमें जेनरल शाहनवाज खान, करनल प्रेमकुमार सहगल और गुरूवख्श सिंह थे। अंग्रेजी सरकार की ओर से उनके वकील ने इन पर बार-बार आरोप लगाया था कि अंग्रेजी सेना में भर्ती के समय उन्होंने जो शपथ ली थी उसका उन्होंने उल्लंघन किया है। सरकार उसकी सजा मौत चाहती थी। इन अध्किारियों ने जज के समक्ष साफ कह दिया था कि उन्होंने नियुक्ति के समय जो कसम खाई थी वह देश के प्रति था न कि जार्ज छठे के प्रति!

मुझसे (कर्नल महबूब) सरकारी अध्किारियों ने पहले परिवार के प्रति डराया फिर जनरल शाहनवाज के द्वारा सच्चाई बताऐ जाने का झूठ बोला था। मुझे अंग्रेजी सरकार के अध्किारियों ने बहुत लालच दिया, मगर मैंने नेताजी, भारत और आजाद हिन्द से गद्दारी नहीं की। आप यातनाओं का अनुमान लगा सकते हैं। मेरी आयु उस समय मात्रा 25 वर्ष थी। हमारा केस भी उन्हीं वकीलों ने लड़ा था। नेता जी देशबन्ध्ु चितरंजन दास को अपना आदर्श मानते थे, और उसी महान देशभक्त से प्रभावित होकर नेताजी में देशभक्ति का इतना जनून और जजबा भरा था। स. श्री दास से नेता जी का मिलना एक संयोग था। 10 दिसम्बर 1921 को अंग्रेजी कानून के अवहेलना में चितरंजन दास, मौलाना आजाद, और नेता जी गिरफ्रतार किऐ गऐ थे। यह नेता जी की प्रथम जेल यात्रा थी। जेल में नेता जी ने श्री दास के कपड़े धेने से खाना पकाने और सहायक सचिव का काम किया था। नेता जी ने सिंगापुर में मुझे बताया था। नेता जी ने कहा था, जानते हो महबूब  अंग्रेजी सरकार ने मुझे दास के साथ जेल भेज कर बड़ा ही अच्छा काम किया था। मैंने जेल में रहकर नेतृत्व और राजनीति उन्हीं से सीखी जो आज मेरे लिऐ बड़े काम की चीज है। वह मेरे माँ बाप भाई सभी थे, जिसके प्रभाव से तुम जैसे योग्य युवकों को लेकर हमने अंग्रेजी सरकार की निंद उड़ा रखी है। नेता जी लंदन से लौटकर सबकुछ करने में सक्षम थे, उनका शैक्षिक रिकाॅर्ड बेहतरी था, मगर उन्होंने देश सेवा को चुना था। गोरखपुर में घटित चैरी चैरा की घटना और उसमें 19 सिपाही की हत्या और आरोपियों को फांसी पर लटकाऐ जाने की घटना ने नेता जी का रूख मोड़ दिया था। नेता जी ने चैरी चैरा की घटना पर महात्मा गाँध्ी की आलोचना करते हुए कहा कि वह राष्ट्रपिता है। मैं उनका बड़ा आदर और सम्मान करता हूँ। मगर मैं इस घटना पर उनकी निंदा का विरोध् करता हूँ। नेताजी भारत को स्वतंत्राता दिलाने के लिऐ एक सेना की भांति लड़ाई लड़ रहे थे और उनकी सेवा अस्मरणीय है। देशबन्ध्ु ने नेताजी को दैनिक बंगला ‘बंगला कथा’ का सम्पादक बनाया था। इस दैनिक का संचालन स्वराज दल के अध्ीन हो रहा था। दिसम्बर 1929 को नेताजी ने नेहरू के साथ मिलकर इन्डिपेंडेंट पार्टी की स्थापना भी की थी। 1920 में काँग्रेस ने जिस पूर्ण स्वतंत्रता की बात की थी वह नेता जी के लाहौर अध्विेशन में दिऐ गऐ भाषण का आधार था। 1928 के कोलकत्ता अध्विेशन के उपरांत देश में नवयुवकों की अगुवायी में कई संठनों की स्थापना हुई। 1940 में विधान परिषद का चुनाव नेता जी ने जेल से लड़ा और ढाका निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीत गऐ। इस जीत में नेता जी की इज्जत, शोहरत, देश और जनता प्रेम का मिश्रण था। नेता जी ने कोलकत्ता में 1940 में महाजाति सदन की स्थापना की और इस परिषद् का उद्घाटन महान कवि और विचारक गुरु रविन्द्र नाथ के हाथों हुआ। यह नेताजी के राजनीति जीवन का सबसे बुरा दिन था। जब नेताजी काँग्रेस से बाहर हो गऐ थे। स्वतंत्रता संग्राम और विश्व राजनीति के बदलते पटल के साथ-साथ विश्वयुद्ध  और अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़ के भविष्य पर नेताजी और नेहरु दो व्यक्ति ही पकड़ रखते थे। मगर दोनों में एक बात पर सहमती नहीं थी के नेहरू जर्मनी से सहानुभूति नहीं रखते हैं। 

नेताजी विदेशी सहायता से भारत को स्वतंत्रता दिलाना चाहते थे। नेता जी की सोच देश के अन्य युवा क्रान्तिकारियों और देश को स्वतंत्राता दिलाने वालों के मन में भी चल रहा था। ऐसे नवयुवक और नौजवान देशभक्तों की आस्था शान्तिपूर्ण और अहिंसक आन्दोलनों से समाप्त हो चुके थे। 16 जनवरी 1941 को भारतीये समाचार पत्रों में एक प्रमुख समाचार छपी कि ‘‘सुभाष चन्द्र बोस अपने घर से गायब।’’ प्रथम देशवासियों को इस समाचार पर यकीन नहीं आया, मगर कुछ समय तक लोगों को यह भी लगने लगा था कि नेता जी साध्ु जीवन को अपना कर हिमालय की ओर निकल गए हैं। क्योंकि नेताजी का बचपन से ध्र्म के प्रति बहुत अध्कि झुकाव था एवं आप एक धर्मिक परिवार में भी जन्मे थे। नेताजी ने मुझे बताया था (कर्नल महबूब को) कोलकत्ता कारप्रेशन का सारा काम काज पूरा करने के पश्चात् मैंने फैला  दिया कि मेरी तबियत खराब है। मैं किसी से मिलना नहीं चाहता हूं। अगर बहुत आवश्यक हो तो टेलीफोन पर बात की जा सकती है। मैंने अपने घर आनेवाले मेहमानों से भी मिलना बन्द कर दिया था और महबूब तुम्हें बताउ कि मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी से मुझे कोई नहीं पहचान सकता था। मैंने दाढ़ी बढ़ाकर सरकार को धोखा देने और सरकार को किसी इस्लामी देश में भागने का मैंने ढांेग रचा था। सिर्फ मुझसे मेरी 14 वर्षीय भतीजी ही मिल सकती थी। 14 जनवरी 1941 को मैंने अपनी भतीजी को अपने योजना की जानकारी दी और उससे वादा लिया कि वह 36 घंटों तक इस योजना के सम्बंध् में किसी को न बताऐं और मैंने अपनी बेटी को रोते-सिसकते, भारत माता को स्वतंत्रता दिलाने के लिऐ अपने सब कुछ का त्याग किया था। मुझे नेता जी उस भतीजी का नाम याद नहीं है। 14 जनवरी 1941 के मध्य रात्रि  को नेता जी ने घर छोड़ दिया था। उस समय नेता जी एक मौलवी के भेष में थे। हावड़ा रेलवे स्टेशन होते हुऐ गौमो तक उनके साथ उनका भतीजा शिशिर कुमार बोस साथ थे। अब तक नेता जी के गायब होने की खबर देश भर में फैल गई थी और चप्पे चप्पे पर अंग्रेजी पुलिस नेता जी की तलाशी में लगी थीं नेता जी गोमों से पेशावर जानेवाली रेल में सवार थे और पुलिस प्रत्येक यात्री की तलाशी ले रही थी। सघन तलशी के क्रम में सी.आई.डी के आई जी ने मेरे डब्बे की तलाशी ली थी और रेल के चलते समय मुझे सैल्यूट किया था। महबूब मैं तुम्हें बताउ मैं (नेता जी) ने उसी समय गौमो रेलवे स्टेशन पर सोच लिया था कि अब हमारा देश स्वतंत्र होकर ही रहेगा। 

नेताजी ने मुझे बताया था कि वह चमड़े की थैलियों के द्वारा काबुल में नदी पार किया था। कड़ाके के सर्दी और बर्फ में नेता जी के पास गर्म कपड़े तक नहीं थे। यह था उनका देशप्रेम। रहमत खान (भगतराम) ने पुलिस अध्किारी को दो रुपये रिश्वत देकर मुझे बचाया था और उस पुलिस अध्किारी ने मेरी घड़ी ले ली थी। काबूल में अंग्रेजी सरकार के अध्कि प्रभाव के कारण अध्कि दिनों तक काबूल में ठहरना नेता जी ने उचित नहीं समझा था। नेता जी रूस जाना चाहते थे मगर लगातार तीन दिनों तक काबूल में रूसी दुतावास से सम्पर्क करने के उपरांत भी नेता जी को रुस जाने की अनुमति नहीं मिली। नेताजी और भगत राम काबूल में असहाय थे। मगर उनकी हिम्मत और देश प्रेम उनमें ऊर्जा  भर रहा था। रहमत खान (भगत राम) ने काबूल में एक भारतीय व्यापारी उत्तमचन्द तक पहुंच गऐ, उन्हें पता चला कि व्यापारी उत्तम चन्द बड़े सम्पर्क वाले और देशभक्त है। मुझे (महबूब) को उत्तम चन्द से नेता जी के सहयोग के सम्बंध् में जानने का अवसर उस समय प्राप्त हुआ जब उत्तमचंद सिंगापुर में थे। उत्तमचन्द ने मुझे बताया था कि नेताजी से मेरी भेंट 1941 में काबूल में हुई थी। इससे पूर्व मैंने नेता जी के सम्बंध् में सुन रखा था। जानते हो महबूत, नेता जी से मेरी भेंट एक तेज झोके की भांति थी। मेरी दुकान पर भगत राम आऐ और उन्होंने बताया था कि वह भगत राम है और पंजाब के धलदेर गांव का निवासी है। उन्हीं के भाई ने पंजाब के गवर्नर को गोली मारने का प्रयास किया था, जिसका नाम हरी किशन लाल था। उन्होंने मुझे बताया कि नेता जी उनके साथ है और उन्हें रुस भेजना है। नेता जी का नाम सुनकर मैं बहुत खुश हुआ था। उन्होंने मुझे बताया था कि वह किसी ध्र्मशाला में ठहरा है और उसके पीछे एक अपफगानी जासूस लगा है। जिसे पैसे दे देकर जान अभी तक छुड़ाये हैं। मैंने भगत राम से कहा कि उसके घर महान देशभक्तों का स्वागत है। दरअसल काबूल में भगत राम ने अपना नाम रहमत खान और नेता जी का नाम जियाउद्दीन रखा हुआ था। उनके चले जाने के पश्चात् मैं ;उत्तमचन्दद्ध बड़ा भयभीत था। नेता जी की हालत और उनका पहनावा देखकर भारत का रत्न, भयभित निर्भय, इतना बड़ा देशभक्त मेरे समक्ष इस अवस्था में। मेरा दिन कटने लगा, अब नेता जी का स्थान मेरे समक्ष पहले से और बड़ा होने लगा। नेताजी ने मेरे घर पर बड़े अन्तराल के पश्चात् रेडियो सुनी और समाचार पत्रा पढ़ा था। 

नेताजी काबूल में इटली और जर्मनी के दुतावास के सम्पर्क में थे। लगातार रूस और अन्य दुतावासों से नेता जी को झूठा भरोसा मिलता रहा। 18 मार्च 1941 को नेता जी इटली दूतावास की सहायता से बर्लीन चले गऐ। नेताजी की सुरक्षा के लिऐ इटली सरकार की ओर से डाॅ. बेलर आऐ थे और पासपोर्ट पर नेता जी का नाम भूज जातिया लिखकर इटली से आया था। काबूल से सोवियत सीमा तक सड़क के रास्ते और वहां से मास्को रेल के माध्यम गऐ थे। जर्मनी की मीडिया ने नेता जी का पफोटो छापा और जर्मन भाषा में लिखा था- भारत के महान स्वतंत्राता सेनानी और भारतीये राष्ट्रीये कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जो कुछ दिनों से लापता थे 28 मार्च 1941 को बर्लीन पहुंच गऐ। नेताजी के साथ दो जर्मन अध्किारी हिटलर ने लगाऐ थे, हिटलर नहीं चाहता था कि नेता जी इटली अथवा मासको में रुके। उत्तम चन्द ने बताया था कि मई 1941 को उन्हें एक ब्रिटिश जासूस ने गिरफ्रतार करवाया। प्रथम जलालाबाद और पिफर लालकिला जेल दिल्ली में भेज दिया गया और लाल किया में मेरी मुलाकात जीवन लाल से हुई। जीवन लाल को इस आधर पर गिरफ्रतार किया गया था कि वह मुझसे मिलता रहता था। काबूल में मेरी तमाम सम्पति जब्त कर ली गई थी। महबूत साहेब कहते थे, आखिरकार नेता जी के व्यक्तित्व में इतना प्रभाव था, उनकी देशभक्ति इतनी सच्ची थी कि एक आम भारतीये और व्यापारी अपनी सारी सम्पत्ति और कारोबार लूटा कर इतना प्रसन्न मुद्रा में मुझसे एक कैदी के रूप में लालकिला में मिला। यह स्वतंत्राता यह आजादी न जाने उत्तमचन्द जैसे कितनो गुमनाम व्यक्तियों के सहयोग से हमें प्राप्त हुआ है। 

भारतीये स्वतंत्राता संग्राम का इतिहास जिन देशभक्तों और शहीदों के खुन से लिखा गया है। उसमें नेता जी का बलिदान और त्याग मुख्य अक्षरों में अंकित है। लाल किला में मेरी मुलाकात ;कहबूबद्ध कैप्टन रामसिंह के माध्यम से उत्तमचन्द से हुई थी। जब मैं नेता जी की मृत्यु हवाई दुर्घटनामें होने की बात उन्हें बताई तो उत्तम चन्द खुब रोया था। नेता जी जर्मनी में हिटलर से भेंट की थी। नेताजी ने जर्मनी में हिटलर के समक्ष यह इच्छा जताई थी कि विश्वयु( में गिरफ्रतार किऐ गऐ, भारतीयों को लेकर एक सेना का गठन करेंगे और हिटलर नेता जी के इन सुझाव पर तुरन्त राजी हो गया था। हिटलर की निगाहों ने नेता जी को पहली नजर में ही पहचान लिया था। जनवरी 1942 में नेताजी ने ‘स्वाध्ीनता लीग’ के नाम से जर्मनी में एक बटालीयन का गठन कर डाला। नेताजी इसी के आधर पर जापान और पश्चिम ऐशिया में सेना का गठन चाहते थे। वर्लीन में जापानी राजदूत को राजी करके एक सेना का गठन किया, नेता जी का स्वागत भारत से बाहर बड़े ही जोरदार तौर पर हुआ था। 8 पफरवरी 1943 को नेता जी आबीद हुसैन के साथ टोकिया आ गऐ। नेता जी की यह यात्रा बेहद कठिन थी। इस यात्रा के क्रम में नेता जी के साथ एक जापानी मेजर यामामोती भी थे। 13 जून 1943 को 56 दिनों की कठिन यात्रा के पश्चात् नेता जी टोकियो पहुंचे थे। 20 जून 1943 को टोकियो रेडियो के प्रसारण में ऐलान किया गया कि नेता जी जापान पहुँच गऐ हैं और विश्व ने सुना के नेता जी अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ने के लिऐ तैयार हैं। 

नेताजी का व्यक्तित्व का अन्दाजा तो लगाइये कि टोकियो हवाई अड्डे पर नेता जी के स्वागत के लिऐ जापान के प्रधनमंत्राी स्वयं आऐ थे। उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलापफ नेताजी और उनकी सेना को समर्थन देने का ऐलान किया था। रास बिहारी बोस उन दिनों सिंगापुर में थे, जापान के प्रधनमंत्राी तोजो के बुलाबे पर बोस 3 जून 1943 को टोकियो पहुंचे थे। वहीं पर श्री बोस की भेंट नेताजी से हुई थी। बोस ने नेताजी से आजाद हिंद फौज की अगुवायी करने का अनुरोध् किया था। नेता जी को चीन जाना था मगर उन्होंने अपनी चीन यात्रा रद्द कर दी थी। 2 जुलाई 1943 को नेता जी सिंगापुर पहुंचे जहां पर उनका जोरदार ढंग से स्वागत किया गया था। सिंगापुर के इसी अन्तरर्राष्ट्रीय सभा में नेता जी ने स्वतंत्रा भारत की सरकार के भविष्य का ऐलान किया था। नेता जी ने अपने मंत्राीमंडल के सहयोगियों के साथ शपथ लिया था। दूसरे दिन सिंगापुर में 50 हजार से अध्कि लोगों की सभा सम्पन्न हुई थी। इसी सभा से नेता जी ने इंगलैंड और अमेरिकी सरकार के विरू( यु( की घोषणा की थी। आजाद हिन्द पफौज ने यु( करने के लिए पूरी तैयारी कर ली थी। नेताजी ने यु( से पूर्व अपने सैनिकों से सम्बोध्न में कहा था- साथियों तुम्हारा नारा है। दिल्ली चलो! स्वतंत्राता प्राप्ति के इस यु( में हममें से कौन बचेगा यह किसी को भी पता नहीं है। मगर हमारा काम उस समय तक समाप्त नहीं होगा जब तक के लाल किला में हमारे सैनिक स्वतंत्रारूप से प्रेड नहीं करेंगे। 6 जुलाई 1943 को आजाद हिन्द पफौज की प्रैड में जेनरल तोजो ने पफौजियों की सलामी ली थी। नेता जी रंगुन से जमर्नी आऐ और अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों को जर्मन रेडियो से आजाद हिंद पफौज का परिचय करवाया और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और घटनाक्रम का जायजा लिया था। इसी स्थान पर योरोसलम के धर्मिक गुरु से नेता जी की भेंट हुई थी। नेताजी ने जर्मनी और रुस के मध्य समझौता करवाने और दोनों देशों के मध्य यु( रोकने की बहुत कोशिश की थी। मगर नेताजी इस प्रयास में असपफल रहे थे। नेताजी ने कई बार इटली का दौरा भी किया था और उन्होंने मोसोलीनी से भी भेंट की थी। 

9 नवम्बर 1943 को फौजी प्रशिक्षण की समाप्ति पर रंगुन को सेना का मुख्यालय बनाया गया, सुभाष ब्रिग्रेट 24 नवम्बर 1943 को रंगुन के लिऐ रवाना हुई थी। 4 जनवरी 1944 को नेता जी ने रंगुन में पफौज को तीन कमानों में विभक्त किया और कमान कर्नल लक्षण स्वरूप मिश्रा, मेजर मेहरदास सिंह और मेजर अजमेरा सिंह के हाथों में दिया गया था। इसके बाद कुछ गोरिल्ला रेजिमेन्टों में गाँध्ी, नेहरू गोरिल्ला और गुप्त दल का भी गठन किया गया था। आजाद हिन्द पफौज का गीत- सुभ सुख चैन की बरखा बरसे, भारत भाग्य है जागे! की रचना आई.एन.ए. के मुम्ताज अहमद और आबिद हसन ने लिखा था और इसकी ध्ुन कैप्टन राम सिंह ने तैयार की थी। 

खुशबू का एक नगर आबाद होना चाहिऐ!

इस नजमा ऐ जर को अब बरबाद होना चाहिऐ।।

जुल्म बच्चे जन रहा है, कुचा व बाजार में!

अदल को भी साहेब औलाद होना चाहिऐ।।

इन अंध्ेरों में भी मंजिल तक पहुँच सकते हैं हम!

जुगनूओं को रास्ता तो याद होना चाहिऐ!!

फखरे आलम

9910921624