तो क्या 17 जनवरी को ज़ब्त हो जाएगी ' साइकिल'

तो क्या 17 जनवरी को ज़ब्त हो जाएगी ' साइकिल'

नई दिल्ली: समाजवादी पार्टी में सिंबल को लेकर संघर्ष जारी है. मुलायम और अखिलेश गुट अपना-अपना दावा जता रहे हैं. जानकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी में हुई दो फाड़ की पृष्ठभूमि में यदि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर पाता है कि संगठन में किस पक्ष के पास बहुमत है तो पार्टी के चुनाव चिह्न यानी साइकिल के इस्तेमाल पर उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले रोक लगाई जा सकती है.

पिछले सप्ताह पार्टी में फूट पड़ गई थी. मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के नेतृत्व में दो अलग-अलग धड़ों ने पार्टी के चुनाव चिह्न पर अपना दावा करते हुए चुनाव आयोग से संपर्क किया था.

दोनों ही पक्षों ने अपने दावे के पक्ष में कुछ दस्तावेज भी जमा कराए हैं. अखिलेश गुट ने तो 6 बक्सों में दस्तावेज़ जमा कराए हैं. आयोग ने उन्हें पार्टी के नाम और चिह्न पर दावा करने के लिए विधायकों और पदाधिकारियों के हस्ताक्षर वाले शपथपत्र मुहैया कराने का वक्त दिया है. माना जा रहा है कि जि पक्ष के पास सांसदों, विधायकों, पाषर्दों और प्रतिनिधियों का बहुमत (50 प्रतिशत जमा एक) होगा, उसे 25 साल पहले गठित इस दल का नियंत्रण हासिल करने की लड़ाई में प्रमुखता मिलेगी.

सूत्रों ने कहा कि आयोग को 17 जनवरी से पहले तय करना होगा कि सपा में किसके पास बहुमत है. 17 जनवरी को विधानसभा चुनाव के पहले चरण की अधिसूचना लागू होनी है. पहले चरण के लिए चुनाव दो फरवरी को होंगे.

अधिसूचना के साथ ही, नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. मुलायम और अखिलेश के गुट एक समय पर एक ही चुनाव चिह्न यानी साइकिल के साथ चुनाव नहीं लड़ सकते हैं इसलिए चुनाव आयोग को उस तारीख से पहले ही इस मुद्दे पर फैसला लेना होगा. एक सूत्र ने कहा, "इन दिनों में घटनाक्रम तेजी से बदलेगा.

17 जनवरी अब भी काफी दूर है. हां यदि दोनों पक्षों की ओर से समान संख्या में विधायकों और पदाधिकारियों के समर्थन का दावा किया जाता है और चुनाव आयोग अंतिम निर्णय नहीं ले पाता है तो अंतरिम आदेश जारी किया जा सकता है. चुनाव चिह्न पर रोक लगा दिया जाना भी ऐसा ही एक विकल्प है." एक अन्य सूत्र ने कहा कि यदि दोनों पक्ष मामले को जल्दी निपटाना चाहें तो चुनाव आयोग 17 जनवरी से पहले निष्कर्ष पर पहुंच सकता है.

सूत्रों के अनुसार, यदि चुनाव करीब होते हैं तो चुनाव निकाय के पास दोनों पक्षों के विधायी बहुमत की जांच का समय नहीं रहता. ऐसे में वह एक अंतरिम आदेश जारी करके दोनों पक्षों से एक नया नाम और नया चुनाव चिह्न चुनने के लिए कह सकता है. वर्ष 2011 में राज्य स्तर का मान्यता प्राप्त दल बने उत्तराखंड क्रांति दल के मामले में ऐसा ही हुआ था. दोनों ही पक्षों ने तब चुनाव चिह्न 'कुर्सी' पर दावा पेश किया था.

तब चुनाव आयोग ने त्रिवेंदर सिंह पवार के नेतृत्व वाले उत्तराखंड क्रांति दल (पी) के एक समूह को 'कप-प्लेट' का चुनाव चिह्न दिया था. दिवाकर भट्ट के नेतृत्व वाले दूसरे समूह को नया नाम जनतांत्रिक उत्तराखंड क्रांति दल दिया गया था और चुनाव चिह्न 'पतंग' दिया गया था.